एक तरफ कुआं और दूज़ी तरफ खाई..

Posted by Neeti Kushwaha
August 21, 2017

Self-Published

एक तरफ कुआं और दूज़ी तरफ खाई..

भेद रूपी जहरीली आबो-हवा भी हमने ही है बनायी..

जो गर होता इंसानियत का मंजर..

तो क्या बंद कमरा और क्या खुली रोशनायी..

चाहते बहुत कुछ है हम ज़िन्दगी से..

पर उसकी लुकाछिपी देख छुइमूई सा घबरा जाते..

ना जाने कहाँ गया वो अपना निश्छल बचपन…

जिसमे बेपरवाही से हर पल को है हम जीते..

इधर से गया बचपन उधर से आया अल्हड़पन…

धीरे-धीरे से दस्तक देती है रूसवाईयां…

सच से.. इंसानियत से.. अपनेपन और..  मोहब्बत से..

और फिर.. फिर क्या.. वहीं..

एक तरफ कुआं और दूज़ी तरफ खाई…

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