एक पैग़ाम जंग-ए-आज़ादी के मुस्लिम शूरवीरों के नाम

Posted by Afaq Ahmad
August 15, 2017

Self-Published

भारत को ब्रितानी हुकूमत के चंगुल से आज़ाद कराने मुसलमानों का एक अहम किरदार रहा है। दरअसल अंग्रेज़ों ने मुसलमानों से ही छीन-झपटकर सत्ता की चाभी हथियाई थी इसलिए उस वक़्त के मुसलमान ही सबसे ज़्यादा अंग्रेज़ों के जुल्म और अदावत क़् शिकार हुए!

ये एक सच है कि देश के स्वतंत्रता संग्राम में दूसरे मज़हब के लोगों के हिस्सा लेने से पूरी एक सदी पहले ही मुसलमान अंग्रेज़ों को नाको चने चबवा चुके थे।

अंग्रेज़ों के ख़िलाफ़ सबसे पहले मोर्चा खोला था शेर-ए-बंगाल सिराजुद्दौला ने 1756-57 में…सिराजुद्दौला अपनी आख़िरी सांस तक अंग्रेज़ों से लड़ते-लड़ते शहीद हुए थे। इसके बाद मीर क़ासिम ने बक्सर की लड़ाई में, हैदर अली और टीपू सुल्तान ने मैसूर की लड़ाइयों में अंग्रेज़ों के दाँत खट्टे किये थे।

इस तरह जंग-ए-आज़ादी का आग़ाज़ 1757 की प्लासी की लड़ाई से हुआ…इसके बाद 1857 में हुए ग़दर हिंदुस्तान की आज़ादी में मील का पत्थर साबित हुआ। 10 मई 1857 को मेरठ पुलिस छावनी से ग़दर की शुरूआत हुई थी जा 11 मई की सुब्ह् हज़ारों इंक़लाबी मेरठ से दिल्ली पहुंचकर बहादुर शाह ज़फ़र को अपना रहनुमा चुन लिया।

4 जून को लखनऊ में, 5 जून को कानपुर में और 1 अप्रैल 1857 में झांसी में ग़दर छिड़ गया। दिल्ली में बहादुर शाह ज़फ़र क़ायद चुने गए थे पर फ़ौज की रहनुमाई जनरल बख़्त ख़ान के हाथों में थी

एक पैग़ाम जंग-ए-आज़ादी के मुस्लिम शूरवीरों के नाम:

भारत को ब्रितानी हुकूमत के चंगुल से आज़ाद कराने में मुसलमानों का एक अहम किरदार रहा है। दरअसल अंग्रेज़ों ने मुसलमानों से ही छीन-झपटकर सत्ता की चाभी हथियाई थी इसलिए उस वक़्त के मुसलमान ही सबसे ज़्यादा अंग्रेज़ों के जुल्म और अदावत के शिकार हुए!

ये एक सच है कि देश के स्वतंत्रता संग्राम में दूसरे मज़हब के लोगों के हिस्सा लेने से पूरी एक सदी पहले ही मुसलमान अंग्रेज़ों को नाकों चने चबवा चुके थे।

अंग्रेज़ों के ख़िलाफ़ सबसे पहले मोर्चा खोला था शेर-ए-बंगाल सिराजुद्दौला ने 1756-57 में…सिराजुद्दौला अपनी आख़िरी सांस तक अंग्रेज़ों से लड़ते-लड़ते शहीद हुए थे। इसके बाद मीर क़ासिम ने बक्सर की लड़ाई में, हैदर अली और टीपू सुल्तान ने मैसूर की लड़ाइयों में अंग्रेज़ों के दाँत खट्टे किये थे।

इस तरह जंग-ए-आज़ादी का आग़ाज़ 1757 की प्लासी की लड़ाई से हुआ…इसके बाद 1857 में मचा ग़दर हिंदुस्तान की आज़ादी में मील का पत्थर साबित हुआ। 10 मई 1857 को मेरठ पुलिस छावनी से ग़दर की शुरूआत हुई थी जब 11 मई की सुबह हज़ारों इंक़लाबियों ने मेरठ से दिल्ली पहुंचकर बहादुर शाह ज़फ़र को अपना रहनुमा चुन लिया।

4 जून को लखनऊ में, 5 जून को कानपुर में और 1 अप्रैल 1857 में झांसी में ग़दर छिड़ गया। दिल्ली में बहादुर शाह ज़फ़र क़ायद चुने गए थे पर फ़ौज की रहनुमाई जनरल बख़्त ख़ान के हाथों में थी।

बहादुर शाह की बेगम ज़ीनत महल का भी नुमाया रोल था। लखनऊ में हज़रत महल और उनके बेटे क़ादिर ने रहनुमाई की। फ़तेहपुर में अज़ीमुल्लाह ने, रूहेलखंड में ख़ान बहादुर ख़ान ने, फ़ैज़ाबाद में मौलवी अहमदुल्लाह ने और इलाहाबाद में लियाक़त अली ने इस इंक़लाबी जंग में बढ़-चढ़ कर हिस्सा लिया और अंग्रेज़ों के ख़िलाफ़ लड़ाइयां लड़ीं। हालांकि, 1857 का ग़दर नाकाम रहा और ये आम जनमानस तक नहीं पहुँच पाया मगर इसने भारतीयों के दिलों में ब्रितानी हुकूमत के ख़िलाफ़ आगे बिगुल बजाने में आग में घी का काम किया और अंग्रेज़ों को हिंदुस्तान से निकाल बाहर करने के लिए एक ज़मीन तैयार कर दी।

1857 की ग़दर में यूँ तो हिन्दू-मुसलमान दोनों ही अंग्रेज़ों की चालबाज़ी, मक्कारी और ज़ुल्म-ओ-तशद्दुद का शिकार हुए थे लेकिन मुसलमानों ने इस जंग में चूँकि अहम किरदार अदा किया और मुग़ल बादशाह इस आज़ादी के आंदोलन की सरपरस्ती कर रहे थे इसलिए अंग्रेज़ों की नज़र में सबसे बड़े दुश्मन मुसलमान और सिर्फ़ मुसलमान ही थे लिहाज़ा अंग्रेज़ों ने इनसे दिल खोलकर इन्तेक़ाम लिया—मुसलमानों की तमाम जागीरें और जायदादें ज़ब्त कर ली गईं। इनके लिए मुलाज़मतो के दरवाज़े बंद कर दिए गए। सरकारी कॉलेज और स्कूलों में मुसलमान बच्चों का दाख़िला ममनू यानि प्रतिबंधित कर दिया गया। बहादुर शाह ज़फर को बंधक बनाकर बर्मा भेज दिया गया जहां वो जां बहेक़ हुए।

हिंदुस्तान की जंग-ए-आज़ादी में उल्मा-ए-इस्लाम ने भी हिस्सा लिया और अंग्रेज़ों के ख़िलाफ़ जिहाद छेड़ा। इनमें हज़रत शाह वलीउल्लाह, हज़रत शाह अब्दुल अज़ीज़, हज़रत मौलाना सैय्यद अहमद शहीद बरेलवी, हाजी शरीयतुल्लाह, दूधो मियां, करम शाह और उनके फ़रज़ंद के नाम क़ाबिल-ए-ज़िक्र हैं जिन्होंने अंग्रेज़ों के ख़िलाफ़ महाज़ खोला और लड़ाईयां लड़ीं।

1905 में जब लॉर्ड कर्ज़न ने बंगाल को दो हिस्सों में बांटने की साज़िश रची तो ‘बायकॉट’ और ‘स्वदेसी आंदोलन’ शुरू हुआ। इस तहरीक में मुसलमानों ने बढ़-चढ़ कर हिस्सा लिया। शोहरत याफ़्ता बैरिस्टर अबुर्रसूल, नामी-गिरामी सियासी रहनुमा लियाक़त हुसैन और ताजिर ग़ज़नवी के अलावा तमाम गुमनाम मुसलमानों ने इसमें हिस्सा लिया। बाद में ‘एहरार आंदोलन’ शुरू किया–इसमें मौलाना मोहम्मद अली जौहर, हकीम अजमल ख़ाँ, हसन इमाम, मौलाना ज़फ़र अली ख़ाँ और मौलाना मज़हरुल हक़ के नाम क़ाबिल-ए-ज़िक्र हैं। ये अंजुमन ‘अलीगढ़ स्कूल’ और बड़े नवाबों और ज़मींदारों की अंग्रेज़-परस्ती को नापसंद करती थी। इस तरह वतन-परस्ती के ख़्यालात ‘देवबंद स्कूल’ के तहत मुस्लिम उल्मा के ज़रिए भी परवान चढ़ रहे थे। इनमें सबसे बड़े क़ौम-परस्त नौजवान मौलाना अबुल कलाम आज़ाद थे जिन्होंने कम उम्री में ही ‘अल हिलाल’ अख़बार और मोहम्मद अली जौहर ने अंग्रेज़ी में ‘कॉमरेड’ और उर्दू में ‘हमदर्द’ निकाला। इस तरह मौलाना मोहम्मद अली जौहर और मौलाना आज़ाद ने मुसलमानों के बीच ये बात फैलायी की इस्लाम और वतनपरस्ती में कोई टकराव नहीं है।

1913 में अमरीका और कनाडा में रहने वाले हिंदुस्तानी सियासतदानों ने ‘ग़दर पार्टी’ क़ायम की और इस पार्टी में भी कई मुस्लिम रहनुमा शामिल थे जिनमें रहमत अली शाह और मोहम्मद बरकतुल्लाह के नाम ख़ास तौर पर लिए जा सकते हैं। इस पार्टी से ही मुतास्सिर होकर सिंगापुर में वाक़ए पांचवीं लाइट इन्फेंट्री के 700 सिपाहियों ने जुमेदार चिश्ती ख़ाँ और सूबेदार डंडे ख़ाँ की हिमायत में बग़ावत कर दी जिसे अंग्रेज़ों ने काफ़ी मशक़्क़त के बाद कुचल डाला। इस दौरान बालासोर में जीतन मुखर्जी ने जो इंक़लाबी पार्टी बनाई उसमें भी कई मुस्लिम इंक़लाबी थे जिनमें अब्दुर्रहमान, मौलाना उबैदुल्लाह सिंधी के नाम आते हैं।

पहली जंग-ए-अज़ीम (World War 1914 से 1918) के दरमियान मुसलमानों ने हिंदुस्तान की आज़ादी के लिए और भी बढ़-चढ़ कर हिस्सा लिया। 1916 की लखनऊ कांग्रेस का इजलास दो मायनों में काफ़ी कारगर साबित हुआ–एक तो इस इजलास में कांग्रेस के ‘नरम दल’ और ‘गरम दल’ एक प्लेटफ़ॉर्म पर आ गए और दूसरी तरफ़ इससे भी ज़्यादा अहम बात कांग्रेस और मुस्लिम लीग में आपसी समझौता हो गया। इससे स्वतंत्रता-संग्राम के दौरान हिंदू-मुस्लिम इत्तेहाद और मुस्तहकम हो गया। अब दोनों क़ौमों ने मिलकर अंग्रेज़ों का मुक़ाबला करना शुरू कर दिया। पहली जंग-ए-अज़ीम और हिंदुस्तानियों की इंक़लाबी कोशिशों से अंग्रेज़ी हुकूमत बौखला-सी गयी। मौलाना आज़ाद के ‘अल हिलाल’ और मोहम्मद अली के ‘कॉमरेड’ को बंद कर दिया गया। इसकेे साथ ही अली बिरादरान-मोहम्मद अली और शौक़त अली, हसरत मोहानी और अबुल कलाम आज़ाद को नज़रबंद कर दिया गया। सही मानों में ‘लखनऊ-पैक्ट’ हिन्दू-मुस्लिम इत्तेहाद का एक आला नमूना था।

1917 में भारत की जंग-ए-आज़ादी में एक नया मोड़ तब आया जब कांग्रेस में महात्मा गाँधी दाख़िल हुए और अपना पहला सियासी कारनामा चंपारण में नील की खेती करने वाले किसानों के लिए आंदोलन चलाकर किया। फिर तो कांग्रेस की बागडोर उन्हीं के हाथों में चली गयी। उन्होंने अहमदाबाद के मिल मज़दूरों के लिए भी अनशन किया।

1918 में ब्रितानी हुकूमत ने ‘रूल्ट एक्ट’ पास किया जिसे ‘काला क़ानून’ के नाम से जाना जाता है। इसके मुताबिक़ अंग्रेज़ हुकूमत बग़ैर मुक़दमा चलाये किसी आदमी को गिरफ़्तार कर जेल में डाल सकती थी। इस क़ानून के ख़िलाफ़ अखिल भारत में यलग़ार आ गया लेकिन पंजाब में ये आंदोलन काफ़ी ताक़तवर था। यहां इसके ख़िलाफ़ आवाज़ उठाने वालों में एक मुस्लिम रहनुमा सैफ़ुद्दीन किचलू भी थे जिनकी गिरफ़्तारी डॉक्टर सत्यपाल के साथ हुई थी। इस गिरफ़्तारी के ख़िलाफ़ अमृतसर में जलियांवाला बाग़ में आज़ादी के मतवालों ने एक सभा बुलायी जहां जनरल डायर ने हज़ारों बेगुनाहों पर गोलियां चलवाकर मौत के घाट उतार दिया।

पहले विश्व युद्ध में इत्तेहादी मुल्कों की जीत हुई थी और तुर्क सल्तनत ने चूंकि जर्मनी का साथ दिया था लिहाज़ा ब्रिटिश साम्राज्य ने फैली हुई तुर्की हुकूमत को तोड़ डाला और उसे आपस में बांटने का चक्रव्यूह रचा। इसके साथ ही ख़िलाफ़त को ख़त्म कर दिया गया। इस पर भारत के मुसलमान उठ खड़े हुए और जल्द ही अली बिरादरान, मौलाना आज़ाद, हकीम अजमल ख़ां और हसरत मोहानी के ज़ेरे-क़यादत एक ख़िलाफ़त कमेटी बनी और मुल्कगीर पैमाने पर आंदोलन चलाया गया। नवंबर 1919 में दिल्ली में ‘ऑल इण्डिया ख़िलाफ़त कांग्रेस’ की बुनियाद रखी गयी जिसने तुर्की के ख़लीफ़ा की फिर से बहाली की मांग रखी। इसकी ताईद गाँधी जी और बाल गंगाधर तिलक ने भी की। उधर ‘रूल्ट एक्ट’ और ‘जलियांवाला बाग़ सानहे’ से बिफर कर गांधी जी ने भी 1920 में ब्रितानी सरकार के ख़िलाफ़ तुर्क मवालात की तहरीक शुरू की जिसमें स्कूल, कॉलेज, सरकारी दफ़्तरों और ब्रिटिश सामानों का बहिष्कार किया गया। इस तहरीक में भी मुसलमानों ने महात्मा गांधी का साथ दिया बल्कि यूँ कहा जाए कि उन दिनों मुसलमान बुरी तरह अंग्रेज़ों के ख़िलाफ़ मुश्तअल थे। फिर साइमन कमीशन के ख़िलाफ़ गाँधी जी ने सिविल नाफ़रमानी की तहरीक चलाई इससे सारे मुल्क में अंग्रेज़ी क़ानून और अहकामात की पुरअमन तरीक़े से धज्जियां उड़ा दी गईं। इस पर अंग्रेज़ों ने महात्मा गाँधी के साथ कई इंक़लाबी रहनुमाओं को गिरफ़्तार किया इनमें मौलाना आज़ाद और डॉक्टर मुख़्तार अंसारी भी शामिल थे लेकिन जल्द ही अंग्रेज़ों की फूट डालो और राज करो की पॉलिसी काम कर गयी और हिन्दू-मुस्लिम इत्तेहाद में दरार पड़ने लगी।

1929 के कांग्रेस के लाहौर इजलास में मुकम्मल आज़ादी का ऐलान किया गया और 26 जनवरी 1930 में ‘मुकम्मल आज़ादी’ का दिन मनाया गया। गाँधी जी के ज़रिए चलायी गयी ‘सिविल नाफ़रमानी तहरीक’ बढ़ते-बढ़ते मुल्क के शुमाली मग़रबी इलाक़ों तक पहुंच गई जहां इसने जांबांज़ और बहादुर पठानों को इस जंग में हाथ बंटाने के लिए राग़िब किया। सरहदी गाँधी के नाम से मशहूर ख़ान अब्दुल ग़फ़्फ़ार ख़ान की हिमायत में पठानों ने ‘ख़ुदाई ख़िदमतगारों’ की एक पार्टी की बुनियाद डाली।

हिंदुस्तान की जंग-ए-आज़ादी की आख़िरी मगर सबसे मो’तबर तहरीक 1942 का ‘भारत छोड़ो आंदोलन’ थी जिसमें गाँधी जी ने ‘करो या मरो’ और ‘अंग्रेज़ों भारत छोड़ो’ का नारा दिया। ये तहरीक पूरे भारत में फ़ौरन फैल गयी। इसमें सभी मज़हब के लोगों ने हिस्सा लिया—मुस्लिम रहनुमाओं ने भी बढ़-चढ़ कर हिस्सा लिया जिसमें कांग्रेस और कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी के रहनुमा भी क़ैद कर लिए गए जिनमें मौलाना आज़ाद, यूसुफ़ मेहर अली, अरुणा आसफ़ अली और दीगर मुस्लिम रहनुमा भी गिरफ़्तार कर लिए गए।

1943 में रास बिहारी बोस की ज़ेर-ए-क़यादत टोक्यो में मशरिक़-ए-बईद के हिंदुस्तानियों की एक कॉन्फ़्रेंस मुनअक़्क़द की गई जिसके मुताबिक़ आज़ाद हिंद फ़ौज के नाम से एक अंजुमन क़ायम हुई जिसमें ‘फ़ॉरवर्ड ब्लॉक’ के बानी सुभाष चंद्र बोस शामिल हो गए। बोस की क़यादत में आज़ाद हिंद फ़ौज ने हुकूमत-ए-ब्रितानिया से सीधे टक्कर लेने का ऐलान कर दिया और बर्मा के इलाक़ों पर हमले भी किये लेकिन 1945 के बर्मा की जंग में आज़ाद हिंद फ़ौज को शिकस्त का सामना करना पड़ा और इसके लीडरों को गिरफ़्तार कर लिया गया। बोस तो संदिग्ध तौर पर हवाई हादसे का शिकार हो गए मगर कई लीडरों को हिंदुस्तान लाया गया और उन पर मुक़दमे चलाये गये। इनमें से एक कप्तान शाहनवाज़ भी थे। इनके अलावा फ़ौज में बहुत से मुसलमान सिपाही भी थे जिन्होंने अंग्रेज़ों के ख़िलाफ़ जंग लड़ी।

इस तरह 1947 में भारत आज़ाद तो हुआ मगर शातिर अंग्रेज़ इसे दो हिस्सों में तक़सीम कर चले गए। हालांकि महात्मा गाँधी और मौलाना आज़ाद तक़सीम मुल्क के ख़िलाफ़ आवाज़ उठाते रहे…पर कुछ ना हो सका।

मुसलमानों ने जिन इंक़लाबी अंजुमनों के बैनर तले आज़ादी की लड़ाईयां लड़ीं उनमें मुस्लिम लीग, ख़ुदाई ख़िदमतगार, वतन पार्टी, ऑल इण्डिया मोमिन कॉन्फ़्रेंस, एहरार पार्टी, जमीयते उल्मा-ए-हिंद, ऑल इण्डिया शिया पॉलिटिकल कॉन्फ़्रेंस, आज़ाद मुस्लिम कॉन्फ़्रेंस और कांग्रेस के नाम सरे फ़ेहरिस्त हैं।

हिंदुस्तान की जंग-ए-आज़ादी में मुसलमान शायरों, अदीबों, सहाफ़ियों और ड्रामा नवीसों की ख़िदमात को भी फ़रामोश नहीं किया जा सकता। किसी भी तहरीक की कामयाबी के पीछे वहां के मुफ़क्किरों, दानिशवरों और फ़िलासफ़रों का अहम रोल रहता है! मुसलमान शो’,रा, सहाफ़ी और अदबा ने अपनी शायरी, मज़ामीन और तहरीरों के ज़रिए हिंदुस्तान की आज़ादी के लिए ज़मीन तैयार की और इंक़लाबियों के लहू को गरमाया।

हिंदुस्तान की जंग-ए-आज़ादी में शरीक होने वाले मुसलमान शायर व अदीब को हम दो खांचों में बांट सकते हैं-एक तो उन शो’रा का तबक़ा जिन्होंने अमली तौर पर जंग-ए-आज़ादी में हिस्सा भी लिया और दूसरे तबक़े ने हुब्बुलवतनी के जज़्बे से सरशार होकर केवल अश’आर लिखे।

जिन शो’रा ने अश’आर लिखने के साथ बाज़ाब्ता तौर पर जंग-ए-आज़ादी में शिरकत भी की, गिरफ़्तार हुए और जेलों में डाल दिये गए उनमें मौलाना हसरत मोहानी, जिगर मुरादाबादी, अख़्तर शीरानी, अहमक़ फफूँदवी, सरवर जहांबादी, मोहम्मद अली जौहर, जमील मज़हरी, मख़दूम महीउद्दीन, अली जव्वाद ज़ैदी, ज़फ़र अली ख़ां, मौलाना सैय्यद बाक़िर देहलवी, हकीम अजमल ख़ाँ, मौलाना अबुल कलाम आज़ाद, साबिर मोहानी और अली सरदार जाफ़री के नाम सरे फ़ेहरिस्त है। इसके अलावा ऐसे भी शो’रा थे जिन्होंने जंग-ए-आज़ादी में अमली तौर पर तो हिस्सा नहीं लिया मगर आज़ादी की तहरीक को अपनी शायरी से गरमाते रहे—इनमें अल्लामा इक़बाल, रविश सिद्दीक़ी, एहसान दानिश, हफ़ीज़ जालंधरी, साग़र निज़ामी, ग़ुलाम रब्बानी ताबां, जोश मलीहाबादी, असरारुलहक़ मजाज़, सलाम मछली शहरी, फ़ैज़ अहमद फ़ैज़, कैफ़ी आज़मी, ख़लीलुर्रहमान आज़मी और मोईन हसन जज़्बी वग़ैरह के नाम शामिल हैं।

इन शो’रा के अलावा मुस्लिम अदबियों, सहाफ़ियों और ड्रामा नवीसों ने भी जंग-ए-आज़ादी में अपनी जोशीली तहरीरों के ज़रिए शमूलियत बख़्शी। इन्होंने अंग्रेज़ी हुकूमत के ख़िलाफ़ उर्दू और अंग्रेज़ी में अख़बार, पर्चे और रिसाले निकाले इनमें ‘दरिया नूर’, ‘अवध पंच’, ‘तारीख़-ए-बग़ावत-ए-हिन्द’, ‘शोला तूर’, ‘पीस अख़बार’, ‘इंस्टिट्यूट गज़ट’, तहज़ीब-उल-अख़लाक़’, ‘उर्दू-ए-मुअल्ला’, ‘ज़मींदार’, ‘अल हिलाल’, ‘हमदर्द’, ‘क़ौमी आवाज़’, ‘सदा-ए-आम’ वग़ैरह क़ाबिल-ए-ज़िक्र हैं। इनमें हसरत मोहानी का ‘उर्दू-ए-मुअल्ला’, ज़फ़र अली ख़ां का ‘ज़मींदार’, मोहम्मद अली जौहर का ‘हमदर्द’ और ‘कॉमरेड’ और मौलाना अबुल कलाम आजाद के ‘अल हिलाल’ को काफ़ी अहमियत हासिल थी। इन अख़बारों और रिसालों का अहम मक़सद मुसलमानों में सियासी आज़ादी का जोश व एहसास पैदा करना और उन्हें कांग्रेसी ‘क़ौमी तहरीक’ के ज़रिए हुकूमत अख़्तियारी की हुसूल के लिए आमादा करने और अंग्रेज़ों की हुकूमत को भारत से उखाड़ फेंकना था।

ड्रामा निगारों में उमराव अली लखनवी (अल्बर्ट बिल), असग़र निज़ामी (क़ौमी दिलेर), मोहम्मद दीन तासीर (लैला-ए-वतन), अतहर देहलवी (बेदारी) और सरदार जाफ़री (ये किसका ख़ून है) वग़ैरह के नाम लिए जा सकते हैं। अदीबों में डिप्टी नज़ीर अहमद, सज्जाद ज़हीर, अज़ीज़ अहमद, इस्मत चुग़ताई, सआदत हसन मंटो, अहमद अली, ख़्वाजा अहमद अब्बास और इब्राहीम जलेस वग़ैरह के नाम लिए जा सकते हैं। इन शो’रा, अदबा और ड्रामा निगारों ने हिंदुस्तान की जंग-ए-आज़ादी के लिए राहें हमवार कीं और आज़ादी के मक़ासिद को आम लोगों तक पहुंचाया। इस तरह हिंदुस्तान की जंग-ए-आज़ादी में मुसलमानों की ख़िदमात और क़ुर्बानियां हमें हर क़दम पर देखने को मिलती हैं…

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