क्या कड़ी कार्रवाई की परिभाषा बताएंगे सीएम योगी

Posted by KP Singh
August 14, 2017

Self-Published

 

शुक्रवार को गोरखपुर मेडिकल कालेज में 48 घंटे के अंदर 30 बच्चों की मौत हो जाने के खुलासे के बाद मची हलचल के 70 घंटे बाद योगी आदित्यनाथ अपने गृह नगर गोरखपुर में पहुंच पाए। इस बीच बच्चों की मौत का आंकड़ा बढ़ता गया और योगी आदित्यनाथ इससे विचलित हुए बिना एक अच्छे वकील की तरह इन मौतों की वजह को आक्सीजन आपूर्ति ठप हो जाने से जोड़े जाने के अभियान की काट के तथ्य जुटाने में व्यस्त बने रहे। जैसा कि वकील के साथ है, उसका मतलब न्याय के साथ खड़ा होना नहीं अपने मुवक्किल का साथ देना होता है। चाहे भले ही वह कितने भी बड़े अन्याय का कर्ता क्यों न हो, इसलिए कई बार बुद्धिविलास में प्रवीण अधिवक्ता अपने मुवक्किल को जिताने के लिए न्याय को हराने में सफल रहते हैं।

वैसे तो योगी ने जो किया सारे राजनीतिज्ञों का अपनी नाकामी के समय इसी तरह का अमल होता है। लेकिन योगी से उनके योगी होने के कारण क्षुद्र राजनीतिज्ञों के तरह आचरण की अपेक्षा नहीं थी। लेकिन लगता है कि उनमें राजनीति के खतरनाक वायरस आम राजनीतिज्ञों से कहीं ज्यादा मात्रा में प्रविष्ट हैं। अगर उनमें और आम राजनीतिज्ञों में फर्क है तो सिर्फ इतना राजनीति भी पेशेवर कुशलता का तकाजा करने वाला कर्म है और योगी के अंदर वह राजनीतिक कौशल नहीं है इसलिए उनका कपटाचार बहुत विद्रूप हो गया। बात बनने की बजाय और ज्यादा बिगड़ गई।

सबसे पहले तो बात बिगाड़ने का काम स्वास्थ्य मंत्री सिद्धार्थनाथ सिंह ने किया जिन्हें मंत्री का ओहदा अपनी खूबियों की वजह से नहीं इस वजह से मिला है कि लालबहादुर शास्त्री उनके नाना थे। जिन्होंने जवाहर लाल नेहरू के मंत्रिमंडल में रेल हादसों के बाद दो बार इस्तीफे की पेशकश की। पहली बार महबूबनगर में हुए हादसे में जवाहर लाल नेहरू उनका इस्तीफा लौटाने में सफल रहे लेकिन जब दूसरे हादसे में उन्होंने इस्तीफा सौंपा तो वे अपनी इस पेशकश पर इतने दृढ़ थे कि जवाहर लाल नेहरू को उनके सामने घुटने टेकने पड़े। लेकिन संसद में उनका इस्तीफा स्वीकार करते हुए जवाहर लाल नेहरू ने कहा था कि उनका इस्तीफा इसलिए मंजूर नहीं किया जा रहा कि रेल हादसे के पीछे कहीं से उनकी कोई कोताही है पर यह एक नजीर बने ताकि आने वाले समय में उच्च पदासीन लोग अपनी नैतिक जवाबदेही को स्वीकार करने का मौका आने पर पीछे न हटें। तो सिद्धार्थनाथ सिंह की गोरखपुर मेडिकल कालेज के अस्पताल में बड़ी तादाद में हुई बच्चों की मौत को लेकर कोई गलती थी या नहीं थी, इस सवाल से अलहदा उन्हें अपना इस्तीफा जरूर पेश करना चाहिए। उस पुण्यात्मा से अपनी पहचान जुड़ी होने के कारण जिसके वे दौहित्र हैं।

चिकित्सा शिक्षा मंत्री आशुतोष टंडन से ऐसी उम्मीद न की गई थी, न की जानी चाहिए क्योंकि वे उस पिता की संतान हैं जिसने राजनीतिक मीडियाकर परम्परा को आदरणीया बहनजी के हाथों से राखी बंधवाकर बहुत समृद्ध किया। उनके इसी गुण की वजह से मुलायम सिंह की सरकार में भी उनके रुख को देखकर उन्हीं के पार्टी के विधायकों को भौचक रह जाना पड़ा था। पर लालजी टंडन अपनी साख को निकृष्ट करते रहने के बावजूद इसलिए अक्षत थे कि बहूजी यानी उनकी पत्नी के हाथ के लड्डू पार्टी के भीष्म पितामह अटलजी को बहुत भाते थे।

70 घंटे बाद गोरखपुर पहुंचे योगी आदित्यनाथ कुछ पनीले भी हुए लेकिन दहाड़े बहुत। अगर यह पाया गया कि किसी की लापरवाही की वजह से बच्चों की मौत हुई है तो उसे बख्शा नहीं जाएगा। कड़े से कड़ा दंड दिया जाएगा। अब कड़े दंड का सबका पैमाना अलग-अलग है। नवाब वाजिद अली शाह ने अंग्रेजों से कहा था कि उसे मृत्युदंड देने के लिए शूली सजाने की जहमत उठाने की जरूरत ही नहीं है। उसके सामने से चरवाहा निकाल दो उसके पसीने की बदबू से ही वह दम तोड़ देगा। लेकिन इतना तय है कि अगर मुख्यमंत्री उनकी जगह मायावती होतीं तो अभी तक प्रमुख सचिव स्वास्थ्य नप जाता, गोरखपुर का डीएम नप जाता और मेडिकल कालेज के प्रिंसिपल आरके मिश्रा का तो वह हश्र होता कि उनके विरुद्ध आपराधिक लापरवाही से मौतें कारित करने का मुकदमा दर्ज कर उन्हें सीखचों के भीतर कर दिया जाता। बहनजी पैसे लेकर पोस्टिंग भले ही करती हों बल्कि वे तो मंत्री भी पैसे लेकर बनाती थीं, लेकिन जवाबदेही के मामले में कोई रहम नहीं करती थीं। इसलिए उन्होंने अपने चहेते अफसरों से लेकर सांसद, विधायकों और मंत्रियों तक को जेल पहुंचाने में पूरा सहयोग दिया।

गोरखपुर मेडिकल कालेज के प्राचार्य आरके मिश्रा की आपराधिक लापरवाही के प्रथम दृष्टया पर्याप्त साक्ष्य पहले ही दिन आ गये थे। आरके मिश्रा ने अब यह आरोप लगाना शुरू कर दिया है कि उन्हें बलि का बकरा बड़ों को बचाने के लिए बनाया जा रहा है, लेकिन यह बात खुलकर सामने आ ही चुकी है कि आरके मिश्रा की पत्नी कमीशन के हिसाब में कितनी खरी थीं और आक्सीजन आपूर्ति करने वाले  डीलर के पेमेंट में इसीलिए देरी हो रही थी। पर अगर उनका इशारा इस बात की ओर है कि ऐसा पद पर बने रहने के लिए वे ऊपर की डिमांड को पूरा करने के लिए करते थे तो हो सकता है कि उन्हें अखिलेश की सरकार के समय ऐसे अनुभव से गुजरना पड़ा हो।

मौजूदा सरकार में इस तरह का आरोप वे आशुतोष टंडन पर बेशक लगा सकते हैं लेकिन यह बात हम भी कहते हैं कि सीएम योगी आदित्यनाथ किसी आर्थिक बेईमानी में लिप्त नहीं हो सकते। उनके खुलासे के बाद जांच करके अगर दोषी हैं तो ऊपर वालों के खिलाफ भी कार्रवाई होनी चाहिए। लेकिन सबसे पहले उन्हें तो जेल जाना ही चाहिए था। जरूरी नहीं है कि आप मलाईदार पद लेने के लिए अपने जमीर से सौदा करें। भाड़ में गया पद लेकिन नैतिकता से और वह भी मानवीय तकाजे से जुड़ी नैतिकता हो उससे समझौता करना गवारा नहीं किया जा सकता।

योगीभक्त प्रधानाचार्य की पूर्व सीएम अखिलेश से नजदीकी बताकर बच्चों की मौत में राजनीतिक साजिश के कुलाबे जोड़़ने में लगे हुए हैं। लेकिन सभी को पता है कि अफसर कितने अवसरवादी होते हैं। वे केवल उगते सूरज को सलाम करते हैं। मिश्रा जी इतने वफादार नहीं हो सकते कि अखिलेश के पैदल हो जाने के बाद उनके कहे से मौजूदा सरकार को संकट में डालने की कोई साजिश रच सकें। वह भी तब जब केंद्र में भाजपा की ही सरकार है। यह तो तब हो सकता है जब ऐसी साजिश में केंद्र की सहमति हो। हां अगर उन्होंने कोई साजिश की है तो उसकी जड़ें गोरखपुर की पॉलीटिक्स में ही छुपी हो सकती हैं।

शायद योगी ने भी गणेश चतुर्थी का चांद बचपन में धोखे में देख लिया हो जिसकी वजह से भगवान श्रीकृष्ण की तरह उन पर भी कलंक मढ़ना हो और इस नाते प्राचार्य महोदय की मति फिर गई हो। पर यह मति अखिलेश की वजह से नहीं गोरखपुर जिले की उस नेता के प्रति सॉफ्टकॉर्नर के चलते फिरी हो सकती है जिससे बदला लेने के लिए योगी सीएम की शपथ लेते ही उतावले हो उठे थे। लेकिन उसके यहां रेड डलवाना उन्हें भारी पड़ गया था। जब उनकी पार्टी के विधायक तक उनके खिलाफ हो गये थे। पर योगी डा. मिश्रा को पहले ही दौर में जेल भेजने का काम तब कर सकते थे जब इससे यह साबित होता कि अस्पतालों में जितनी मौतें होती हैं, जितने पुल निर्माण होते ही गिरते हैं उनके पीछे आरक्षण व्यवस्था का योगदान रहता है। मिश्रा जी को जेल भेजने से इस थ्योरी को पुष्ट करने में कोई सहारा मिल नहीं सकता था इसलिए उन पर कार्रवाई करने के बाद उन्हें सूझ आई वह बैलेंस करने की थी। जिसे उन्होंने आक्सीजन सिलेंडरों की व्यवस्था कर बच्चों की जान बचाने वाले मेडिकल कालेज ने नायब प्रिंसिपल डा. कफील को भी अपदस्थ कर दिया है।

डा. मिश्रा के साथ गोरखपुर के डीएम राजीव रौतेला पर भी उनका करम बना हुआ है। योगी सरकार संकीर्णता के सबसे छोटे दायरे में सिमटती जा रही है। उसके ऊपर सांप्रदायिक दृष्टिकोण से कार्य करने का आरोप तो पहले ही दिन से लगना शुरू हो गया था। इसके बाद सरकार जातिवाद के आरोपों से भी घिर गई और अब पहाड़ी वर्सेज मैदानी का अखाड़ा भी उसके लिए उसके कर्मों से सजता जा रहा है। मथुरा जैसे संवेदनशील जिले में प्रदेश के नये आईपीएस अफसरों में टॉप फाइव में शुमार नितिन तिवारी को जब शंट करके पीएसी में भेजा गया और उनकी जगह निकम्मा द ग्रेट स्वप्निल ममगई को मथुरा का एसएसपी बनाया गया तभी इन चर्चाओं की शुरुआत होने लगी थी। इसके बाद कई उदाहरण सामने आते रहे। अब राजीव रौतेला को डीएम की पूरी जिम्मेदारी होने के बावजूद टच न करके योगी सरकार में पहाड़ी अफसरों को विशेष ट्रीटमेंट दिए जाने की धारणा को और ज्यादा बल मिला है।

योगी ने पहले तो आध्यात्मिक अवमूल्यन का अपराध किया। संन्यासी और योगी होना उस ऊंचाई का परिचायक है जहां से सांसारिक पदों पर वापसी का कोई रास्ता नहीं बचता। लेकिन मुख्यमंत्री बनकर उन्होंने योगी से भोगी का बाना ओढ़ा। उनका यह फैसला जायज हो सकता था अगर वे प्रमाणिकता के साथ शासन संचालन करते पर उन्होंने यह साख उसी समय गंवा दी जब प्रदेश में कानून व्यवस्था की हालत खराब होती जाने के जनरल पर्सेप्शन को चुनौती देने की हेकड़ी इसके बावजूद उन्होंने दिखाई कि अब उनकी सरकार के सच्चे अभिभावक की भूमिका अदा कर रहे राज्यपाल राम नाईक तक कह रहे हैं कि प्रदेश में कानून व्यवस्था को ठीक करने के लिए और प्रभावशाली तरीके से काम होना चाहिए। अध्यात्म के साथ दो ही बातें होती हैं। या तो अध्यात्म की दुनिया में व्यक्ति में वीतराग होने के कारण इतनी साधूता आ जाती है कि वह किसी प्रतिवाद और प्रतिक्रिया के चक्कर में नही पड़ता या त्याग का आडम्बर उसके अंदर जबर्दस्त मद भर देता है जिससे कदम-कदम पर उसका अहंकार झलकने लगता है। सीएम योगी की विश्वसनीयता कुछ ही महीनों में इसलिए बुरी तरह समाप्त होना शुरू हो गई है कि वे अपने किसी भी कमजोर पक्ष को स्वीकार कर सुधारने की न तो बात करना चाहते हैं न उस ओर सोचना चाहते हैं। बजाय इसके अहमन्यतापूर्ण दृष्टिकोण का परिचय देते हुए अपने को हमेशा जस्टिफाइ करने की जिद करते दिखाई देते हैं।

भाजपा के हमारे बहुत से मित्रों को योगी सरकार की इस निर्मम मीमांसा के पीछे हमारा पूर्वाग्रह और उनकी पार्टी के लिए गहरी दुर्भावना लगती है। इनमें से कुछ मित्र तो ऐसे भी हैं जो अखिलेश सरकार के समय अखिलेश, शिवपाल और मुलायम सिंह के खिलाफ हमारे लेखन पर भी कटु टिप्पणियां करते थे और अब जब सत्ता बदलने के साथ उनकी योनी बदल गई है तो योगी सरकार के खिलाफ कुछ कहे जाने पर भी वे उसी तरह आपा खोने को तैयार रहते हैं। लेकिन हम जैसे आम लोग न किसी पार्टी के पक्षधर हैं न आलोचक, लेकिन भाजपा से पीड़ा ज्यादा है तो उसकी वजह यह है कि सभी पार्टियों को आजमाया जा चुका था। उन्होंने जिस चरित्र का परिचय दिया था उससे उनसे कोई उम्मीद नहीं रह गई थी। लेकिन विचारधारा से असहमति होने के बावजूद आचरण के मामले में भाजपा के लोगों की पवित्रता पर हम जैसे लोगों को बहुत भरोसा था क्योंकि इस भरोसे के टूटने के बाद फिर रोशनी की कोई किरण हाल-फिलहाल देखा जाना नामुमकिन हो जाएगा और अंधेरे के महासमुद्र में अपनी सारी आशाएं गर्क करना हमारी नियति बन जाएगा। दुर्भाग्य से ऐसा ही कुछ हो रहा है। अटलजी बहुत सदाचार का पाखंड नहीं करते थे। वे मसीहा और फरिश्ता के रूप में अपने को पेश करने की कोशिश भी नहीं करते थे। वे भगवान श्रीकृष्ण के नक्शेकदमों पर चलते थे। अपना ही मूर्तिभंजन करने में न हिचकना लेकिन उन्होंने भाजपा की नीतिवान पार्टी के रूप में छवि को प्रमाणिकता प्रदान की थी, जो आज दरक रही है।

योगी ने गोरखपुर की अपनी प्रेस कांफ्रेंस में कहा कि उन्होंने प्राइवेट प्रेक्टिस करने वाले सरकारी डाक्टरों को जेल भेजने की घोषणा पहले ही दिन कर दी थी। इसका उल्लेख वे यह जताने के लिए कर रहे थे कि लोगों के जीवन से जुड़ी व्यवस्था को उनकी सरकार में सर्वोच्च प्राथमिकता पर रखा गया था लेकिन जैसा कि उनके वर्ग की कमजोरी है वह वायवीय दुनिया में जीती है। अपने प्रवचन को जमीन उतारने की प्रक्रियाएं निर्धारित करने की सूझ ही उसके दिमाग में नहीं आती। इसीलिए भरत मिलाप की कथा सबसे ज्यादा मार्मिक ढंग से प्रस्तुतिकरण करने वाले कथावाचक के श्रोता सबसे ज्यादा अपने भाइयों के साथ बेईमानी करते हैं। कभी कथावाचकों को यह कचोट नहीं हुई कि उनके उपदेशों का प्रभाव क्यों नहीं हो रहा। इससे ज्यादा बड़ी सफेद झूठ कोई बात नहीं हो सकती कि योगी से डरकर उनकी सरकार आने के बाद डाक्टरों ने प्राइवेट प्रेक्टिस बंद कर दी है। या बाहर की दवाएं लिखना बंद कर दिया है। अगर वे प्रवचन के साथ-साथ इसे सुनिश्चित करने का भी इरादा रखते तो अभिसूचना तंत्र को लगाकर प्राइवेट प्रेक्टिस के माध्यम से सबसे ज्यादा कमाई करने वाले कुछ डाक्टरों को पूरी तैयारी के साथ जेल भिजवाने का काम करते। तब जरूर उनका असर हो सकता था। लेकिन दुर्भाग्य यह है कि असरानी की तरह अंग्रेजों के जमाने के कड़े जेलर का रोल अदा कर रही भाजपा की सरकारों ने अमल में अपनी छवि को हास्यास्पद बना लिया है।

योगी ने सरकार संभालने पर जनता की सबसे दुखती रग पर हाथ रखते हुए कहा था कि सपा के जमाने में जायदादों पर जो कब्जे हुए हैं उन्हें फटाफट खाली कराकर माफियाओं को जेल भेजा जाएगा लेकिन लोग अपने को ठगा महसूस कर रहे हैं। जिन्होंने अरबों रुपये की लोगों की जमीनें कब्जिया लीं वे सभी सुरक्षित हैं। भू-माफियाओं की लिस्ट में केवल छुटभैयों के नाम हैं, क्या योगी को यह पता नहीं है कि उनके मंत्री सपा के समय के माफिया नेताओं के सबसे ज्यादा करीबी हैं और उनकी पार्टी के ऊपर के लोगों को चंदा दिलाकर उन्हें अभयदान की घोषणा करा चुके हैं। अगर शिवपाल सिंह पर कार्रवाई करने की बजाय यह सरकार उनसे गुरुमंत्र सीखने की कोशिश करती है तो क्या कहा जाएगा। इससे बड़ा छल कोई दूसरा हो सकता है।

हाल में अखबारों में खबर छपी थी कि सहकारिता के मामले में शिवपाल सिंह से सरकार ने लंबा परामर्श किया है। वाह भाई वाह लेकिन रामायण का एक क्षेपक प्रसंग याद आ गया। रावण जब मृत्युशैया पर पड़ा था तब भगवान श्रीराम ने भाई लक्ष्मण को उसके पास भेजा था कि वे धर्म और नीति के बारे में उससे कोई शिक्षा लेकर आयें। जब लक्ष्मण यह पूछने के लिए रावण के सिरहाने खड़े हो गये और उसने उन्हें ज्ञान देने से मना कर दिया तो उनके बैरंग लौटने पर राम ने समझाया कि भाई रावण महापंडित है। उसके पायताने खड़े होकर पूछो तब ज्ञान मिलेगा। गोस्वामी तुलसीदास जी की रामचरित मानस में इस प्रसंग का कोई उल्लेख नहीं है। लेकिन प्रमाणिक प्रसंगों की बजाय क्षेपक प्रसंग लगता है कि भाजपा में कुछ लोगों को ज्यादा सम्मोहित करते हैं। इसलिए शिवपाल से ज्ञान लेने की सूझ पार्टी के एक वर्ग में आयी होगी पर यह अनर्थकारी है। इसलिए भाजपा को ज्यादा झकझोरने की जरूरत है ताकि उम्मीद की यह किरण डिरेल न हो पाए और अपने को कामयाब करे। अभी इस पार्टी में अपने-पराये की बात बहुत है। इस बीच सार्वजनिक जीवन में मूल्यों का बहुत क्षरण हुआ है। नेतागीरी दुरुपयोग करने वाली चीज बन गई है और भाजपा भी इस मामले में अछूती नहीं रह पाई है। इसलिए भाजपा के हरावल दस्ते में वे लोग जगह बनाए हुए हैं जो कि नियमों-कानूनों को तोड़ने की सुविधा सत्ता से हासिल करना चाहते हैं। इसलिए भाजपा को अपने पराये के बोध से हटकर गलत तत्वों के खिलाफ कार्रवाई करनी पड़ेगी। उसके सामने एक बड़ी चुनौती है क्योंकि पूरी व्यवस्था सड़ चुकी है। बिना बेरहम और निर्मोही बने और न्यायिक दृष्टिकोण का परिचय दिए इसमें सुधार संभव नहीं है।

भाजपा तो अभी तक ऐसा भी कुछ नहीं कर पाई जिससे दिखाई दे कि संस्कृति के क्षेत्र में भी कुछ बदलाव हुआ है। हिंदुत्व का महिमामंडन शुरू हुआ है। अभी तो भाजपा दूसरे संप्रदायों को हीनताबोध कराने मात्र में अपने कर्तव्य की इतिश्री समझ रही है। लेकिन हिंदू एक प्रतिक्रिया का धर्म नहीं है। हिंदू एक विधायी जीवनशैली है। योगी को याद दिलाना होगा कि आपने कुर्सी संभालने के बाद अभिजात्य संस्कृति को बढ़ावा देेने वाले कान्वेंट स्कूलों के खिलाफ कड़े तेवर दिखाए थे लेकिन उनका फलना-फूलना कहीं से बंद हुआ जबकि हिंदुत्व के संरक्षण के लिए ऐसा होना बहुत जरूरी है। कान्वेंट स्कूल बेहतर लिखाई-पढ़ाई के लिए कम और विदेशी संस्कृति को बढ़ावा देने के लिए ज्यादा जाने जाते हैं। इनमें सिखाया जाता है कि जो लोग हाथों के इस्तेमाल से खाना खाते हैं वे असभ्य हैं। साथ ही डाइनिंग टेबल पर जूते पहनकर खाना मैनर में आता है जबकि पालथी मारकर पटा पर बैठकर खाना फूहड़पन है।

इन पंक्तियों का लेखक एक कान्वेंट स्कूल के कार्यक्रम में मुख्य अतिथि बनकर गया था। उसके संचालक ने स्कूल का अवलोकन कराते हुए बताया कि उसके स्कूल में स्वीमिंग पूल भी है। इन पंक्तियों के लेखक ने मन ही मन अपना माथा पीट लिया। एक दिन पहले ही वह जल संरक्षण की एक गोष्ठी में पानी के उपयोग में किफायत की बातें बताकर आया था और यहां उस कल्चर को बल प्रदान करने के लिए आ गया था जो कहता है कि अगर आपके पास पैसा है तो निजी स्वीमिंग पूल बनवाकर पानी की बर्बादी करो ताकि उनकी महिमा के लिए अभिशाप बनी गरीब आबादी पानी न खरीद पाने की वजह से प्यासी मर जाये। निजी कान्वेंट स्कूलों में ऐसी पीढ़ी तैयार हो रही है जो घरेलू स्वीमिंग पूल केे रास्ते पर चलकर जल संरक्षण की कवायद का भट्टा बैठाएगी। आने वाले दिनों में नवरात्र शुरू होंगे जिनमें कन्या भोज कराया जाएगा फिर भी हमें याद नहीं आएगा कि विवाहघरों में आने वाले शराबियों के सामने वेटर की भूमिका में कन्याओं को परोसने की गलती हम न करें।

इस बीच नये-नये होटल, रेस्टोरेंट खोले जा रहे हैं। पूरे देश भर में बात चीन के खिलाफ हो रही है लेकिन इन रेस्टोरेंट के माध्यम से गुणगान महेरी, लप्सी और गोरस आदि का होने की बजाय चाऊमीन का किया जा रहा है। क्यों नहीं कान्वेंट स्कूलों, ऐसे रेस्टोरेंटों पर इतने टैक्स लगाने की सोची जा रही कि इनके संचालकों को इन आडंबरों को बंद करने के लिए मजबूर होना पड़े। क्या यह काम होने के लिए हम भाजपा की बजाय किसी दूसरी पार्टी पर विश्वास कर सकते हैं और एक पते की बात भाजपा के लोगों को बतानी है कि अगर आपने हिंदुत्व का आभास कराने का यह मजबूत रास्ता पकड़ा तो इसमें मुसलमानों का सहयोग भी आपको मिल सकता है क्योंकि मजहब बदलने के बावजूद हिंदुस्तानी मुसलमान भी भारत की परंपरागत जीवनशैली में ही रचे-बसे हुए हैं। जो भारत उप महाद्वीप में इस्लाम की अलग तरह की प्रथाओं और रीतियों से उजागर होता है।

 

 

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