क्या हमारी बेचैनियाँ शिफ्ट हुई है?

Posted by Rajiv Choudhary
August 31, 2017

Self-Published

 पिछले कुछ दिनों में बाबाओं को लेकर बहुत कुछ लिखा-पढ़ा-सुना होगा आपने. आखिर स्थिति ऐसी क्यों होती जा रही है. समाज में जो बैचेनियाँ हैं क्या वह शिफ्ट हुई है? ज़िंदगी में हर इंसान के पास कोई ऐसा दोस्त होना चाहिए जिसे आप खुलकर हर बात कह सुन सकें. आज के वक्त में अगर आपके पास ऐसा कोई साथी है, तो यकीन मानिए आप खुशनसीब हैं.
आज इमोशंस इमोजी बन गए है, हर तरफ से संवाद खत्म हुआ है, हमारा शब्दकोश भी, आज हम कहते-सुनते नहीं हैं। रिएक्ट करते है, जायज़ है बैचेनियां बढ़ी ही है कम नहीं हुई हैं।
आज जब किसी दोस्त के साथ किसी सोशल माध्यम में बात करता हूं तो बात पाँच लाइन से आगे नहीं जाती और संवाद ‘हम्ममम’ या ‘इमोजी’ पे खत्म हो जाता है। क्या हमारे पास वाकई कुछ कहने लायक नहीं है? या सामने वाले के पास कहने के लिए बहुत कुछ है। सुनने वाला कोई नहीं, मानो ना कही गई वह सारी बाते उस ‘हम्ममम’ में सिमट गई हो।शायद आपके साथ भी ऐसा कुछ हुआ हो।
जब भी कोई ऐसी स्थिति बनती है तो पता नहीं क्यों मैं उस ‘हम्ममम’ को समझने की कोशिश करने लगता हूं। क्या मैं सामने वाले की बात को समझने के लायक हूं? क्या सामने वाला मुझे इस लायक समझता है कि वह मुझसे खुलकर कुछ कह सके? और मैं बिना जजमेंटल हुए उसकी असुरक्षा, अकेलेपन, सुख-दुःख, हार-जीत, खुशी, आंसू के साथ उसके हर बैचेनियों को समझ पा रहा हूं?
हमने मिलकर जो समाज बनाया है ना वहां इसकी कोई अहमियत नहीं। हम एक आत्ममुग्ध समाज में जी रहे हैं। जहाँ ‘मैं’ प्रमुख है, ‘हम’ नहीं। पिछले कुछेक सालों से दिल्ली में रहते हुए यही लगा कि 8 बाई 10 के कमरे में हमसब मुर्दे रहते हैं।शायद हम बहुत पहले ही मर चुके हों। सड़क पर, बसों में, मेट्रो में. हर जगह. मुर्दे-ही-मुर्दे. हर कोई मानो भाग रहा हो, किसी को पता नहीं जाना कहा है. शायद दूसरे शहरों का भी यही हाल हो.
पिछले दिनों की बात है. रात के साढ़े दस बजे के आसपास का समय रहा होगा. बचपन के एक दोस्त का बंगाल से फोन आता है. कमरे पर डिनर ही कर रहा था उस वक्त. लड़खड़ाई आवाज में कहता है कहाँ हो? मैंने कहा दिल्ली. फिर कहाँ जहाँ हो. जो भी साधन मिलें चले आओ. मैंने पूछा क्या हुआ, बताओ न खुल के. मुश्किल से इतना बता पाया पिताजी नहीं रहे. लंबी चुप्पी. उस वक्त मैं दूर से क्या कुछ कर सकता था. जैसे-तैसे ढ़ाढस बढ़ाया. रात गए मुहल्ले के आस-पास के लोगों को फोन लगाया. कुछ ने फोन उठाया. ज्यादातर ने नहीं.
बात इतनी भर नहीं है. अब जब उस वाकये को याद करता हूँ तो पाता हूँ उस घड़ी में हमारे आस-पास के लोगों का रवैया क्या रहा. बाद में पता चला दोस्त ने उस घड़ी में एक-आध लोगों के मदद से जैसे-तैसे अपने पिता को लेकर अस्पताल पहुँचा था. पिताजी नहीं बचे. मैं उसके बाद के उसके अकेलेपन को समझने की कोशिश करता हूँ. आपातकाल के उस घड़ी में उसने जानते हुए भी दिल्ली में मुझे फोन लगाया था. मुझसे पहले भी उसने किसी को फोन लगाया होगा. पुकारा होगा. क्या एक भी आदमी नहीं था. जिसे पुकारा जा सके? मदद माँगा जा सके?
बाद में पता चला उसके घर के आस-पास के लोग इतना हो-हल्ला होने के बाद भी दरवाजा नहीं खोले. पिछले नवंबर में उसके पिताजी रिटायर हुए थे. हर चीज की सुख-सुविधा से लैज. पूरी जिंदगी उस आदमी ने खुद को बेहतर बनाने में लगाया होगा. लेकिन अंतिम समय में क्या स्थिति रही. पूरी जिंदगी का निचोड़ क्या निकला. आजकल जब हम हर तिकड़म करके संसाधन जमाने और जुटाने में लगे है. उसका अंजाम क्या यही होना है?
हमें कहाँ कुछ फर्क पड़ता है जब संदेह के आधार पर अखलाक जैसों को भीड़ मार देती है. गौ-प्रेम के नाम पर सरेआम गुंडागर्दी पर भी हम चुप रहते हैं. लव-जिहाद के नाम पर जो टारगेट होते रहे. एंटी रोमियो स्कॉर्ट की चासनी अलग से. हम कहाँ विचलित हुए जब ऑक्सीजन के आभाव में मासूमों की जान गई, रेल बे-पटरी हुई. लोग मरें. स्टूडेंट्स पर लाठी बरसाये जाने से लेकर विभिन्न मुद्दों पर हो रहे प्रदर्शनों पर. उन्हें जेल भेजने. सवाल पूछने पर देशद्रोही साबित करने पर. रोहित-नजीब के मामले में. दलितों-आदिवासियों के अत्याचार पर. जल-जंगल-जमीन के सवाल पर. महिलाओं के इज्जत तार होने पर भी. अफ्रीकियों के रंगभेद के कारण पिटाई, मार दिए जाने के बाद भी. हालियाँ प्राकृतिक आपदाओं पर. कितने उदाहरण दूँ. खैर.
हम हर चींज को लेकर नार्मलाइज होते जा रहे. हम क्राइम पेट्रोल, सावधान इंडिया, कपिल शर्मा शो देखने वाले पीढ़ी है. जो हत्या, हिंसा, मार-काट, बलात्कार, महिला द्वेष, बॉडी शेमिंग, रेसिज्म, कुँण्ठा, पति-पत्नी, साली-देवर टाइप जोक वगैरह. सभी को मजा लेकर देखते है. हमारे लिए हर चीज मजा लेने वाला कटेंट है. टीवी सीरिअल्स से लेकर ख़बर तक.
क्राइम पेट्रोल जैसे प्रोग्राम जागरूकता को लेकर बनाए गए थे. वह उसकी कसौटी पर कितना खड़ा उतरा है पता नहीं. लेकिन यकीन मानिए इन जैसे शोज ने अपने लंबे सफर में हिंसा को नार्मलाइज ही किया है. हम कितने जागरूक हुए पता नहीं. इसलिए हम अपने आसपास हो रहे हिंसा को देखकर चुप हो जाते है. और उसी हिंसा को स्क्रीन पर देखते हुए चटखारे लेते है.
इसे स्थापित करने की प्रक्रिया लंबी है. जिसका सीधा फायदा स्टेट को पहुँचता है. क्योंकि आपके डरे और सहमे रहने पर ही उसका प्रॉफिट है. और टेलीविजन माध्यम इसका भरपूर साथ देते है.
जो सुबह-सुबह नित्यकर्म समझ कर हरेक के इनबॉक्स में सुविचार भेजते है. हर सुबह उठते ही सुविचारों से लबालब हो जाता हूँ. अब सोचता हूँ जब सुविचारों की इतनी अहमियत है, फिर हमारे व्यावहारिकता में वह कितना झलकता हैं. क्या वह दूसरों के लिए ही हैं. और खुद के लिए?
होली-दिवाली जैसे त्यौहार आते नहीं की हर कोई चस्पाने लगता है. अंदर के रावण को मारिए. हिंसा पर अहिंसा की जीत. वगैरह. बाबा-साधु-सत्संगी आदि भी तो यही बात दोहराते आए हैं. मने कह रहे हो मेरे अंदर का रावण मर नहीं रहा. न ही हिंसा. तुम्हारा मर रहा है तो तुम अपना देख लो.
यहाँ हर मामला फारवर्डेड है. हम नया कुछ नहीं रच रहे हैं. क्योंकि हमने सिर्फ नायक और भगवान बनाना ही सीखा है. जिनकी प्रेरणा हम मिथकों से लेते रहे हैं. इन दोनों के बीच का जो स्पेस खाली है न उसे रामरहीम से लेकर आशाराम सरीखे लोग भलीभाँती जानते है. उसी की ऊपज है बाबाजी.
क्योंकि हमारा समाज इतना पिछड़ा है और हम मूर्ख. हर तरफ से गैर-बराबरी, असुरक्षा और बेचैनियों से बने हम. तो हमारे देश में मूर्खता की दूकान भी सबसे ज्यादा फलती-फूलती है.
आज जब एक बाबा के सजा पर हम खुश हुए जा रहे हैं. तो कुछ बात गौर करने वाली है. क्या यह एकमात्र बाबा है? इसके बाद हम इन चींजों-आदतों-अंधविश्वास सें मुक्त हो जाएंगे. कंठी-माला-रक्षा-ताबीज वगैरह पहनना छोड़ देंगे? नहीं. नजर दौड़ाईगा तो ऐसे बाबा हर तरफ मिल जाएंगे. ऑनलाइन से लेकर ऑफलाइन.
ऐसी नौबत आज क्यों आ गई है. क्योंकि हम प्रॉब्लम की रिपेयरिंग करना जानते है, उसके सोल्यूशन पर बात करना नहीं. ऐसी स्थिति व्यक्तिगत सवालों से लेकर राजनीतिक सवालों तक हैं.
याद कीजिएगा आप जब बढ़े हो रहे थे. तब आप अपने घरवालों, आस-पड़ोस से क्या सीख रहे थे. यहाँ मैं अपनी बात करता हूँ. हो सकता है आपका मामला मुझसे अलग रहा हो. घर से जो पहली चींज हम सीखते है वह है पावर को सेलिब्रेट करना. कमजोरी को दूर करना नहीं.
चूंकि हमलोग ज्यादातर धार्मिक माहौल में पले-बढ़े होते है. और बहुसंख्यक लोग ऐसे ही मनोस्थितियों और आचार-व्यवहार को प्रैक्टिस करते हुए बढ़े होते है.
पहला बावस्ता घर में धार्मिक माहौल और सीरियल्स से होता है. जहाँ हम देखते है एक ईश्वर रूपी इंसान है जो बलवान है. जो राक्षसों को पिटता है. (हालांकि आज राक्षस वाली बात डिबेटेबल है, जिसपे अलग से बात हो सकती है. बाबा राम रहिम के संदर्भ में इसे मैं थोड़ा समझाऊं तो बात यह है कि इन्होंने खुद को मैसेंजर ऑफ गॉड साबित करने के क्रम में कई फिल्में भी बनाई.
उस सीरीज में एक फिल्म में यह दर्शाया गया है वह भगवान का दूत है. हालांकि उसने हर फिल्म में खुद को भगवान बनाकर ही दिखाया है. लार्जर देन लाइफ. खैर. फिल्म में आदिवासियों को उन्होंने राक्षस माना है. और खुद को भगवान. अब इस विचारधारा को समझने वाली बात है. जिस देश में आदिवासी समाज की अपनी परंपरा, जीवन-शैली, संस्कृति आदि का अपना खुद का भरा-पूरा इतिहास रहा हो. वहा उसकी राक्षसिय तुलना करना कहा तक जायज है?
अब बात यह है कि जब बाबा इसे फिल्म के माध्यम से प्रमोट करेंगे. और जिनका छह करोड़ से ज्यादा अनुयायी हो. तो एक बड़ा वर्ग का फिल्म देखने के बाद आदिवासियों के प्रति जो धारणा बनेगी. वह किस तरह का होगा. यह समझना पड़ेगा.
यही कारण है कि पिछले कुछ सालों में जब विभिन्न समाज के लोग जागरूकता के एक स्तर पर पहुँचे है. तो अपनी जगह से अपने समाज, संस्कृति के ऐतिहासिक सवालों को उठाने, उससे जुझने, उनका तुलनात्मक अध्ययन वगैरह करने लगे है.
पिछले कुछ सालों में महिषासुर या रावण को लेकर जो डिबेट है. वह इसी का हिस्सा है. जिन्हें हम दानव या राक्षस मानते आए है. एक बड़ा समाज उसे पूजता भी है. आखिर सही मायनों में राक्षस कौन है? और जब-जब ऐसी बाते होती है उस पर बबाल मचता है. लेकिन कितने लोग है जो इसे सुनने-समझने में यकीन करते है? खैर यह तो हमारे प्रैक्टिस में रहा ही नहीं.
इसी प्रकार का पूर्वाग्रह या स्टीरियोटाइप हमारे अंदर मॉइनोरिटिस, देशभक्ति वगैरह को लेकर भी बनता, पनपता और धीरे-धीरे स्थापित होता जाता है. क्योंकि हम हर चींज को पूर्वाग्रहों और प्रतीकों में देखने के आदि रहे है. खैर थोड़ा लंबा हो रहा है. इस पर अलग से बात किया जा सकता है.) हिंसा को अनजाम देता है. मार-धार-काट करता है. फिर भी वह सर्वे सर्वा है.
मने जीवन में पावरफुल होना जरूरी है. चाहे वह आर्थिक रूप से हो, समाजिक रूप से, राजनीतिक रूप से. या किसी भी अन्य रूप से. सो हमारे दिमाग में वही से यह चींजे घर कर जाती है. जद्दोजहद वही से शुरू होती है. यानी जो पावरफुल है वही सबकुछ है. जबकि होना चाहिए कि हम अपने और दूसरे के कमजोरी को जाने दूर करें. मजाक न बनाए. लेकिन दबा-कुचला कमजोर आदमी हमारे लिए कुछ नहीं. या यूँ कहे वह आदमी ही नहीं कीड़ा-मकौड़ा हो मानो. ऐसे ही हम गरीब को हमेशा से संदेह की नजर से देखने के आदि होते जाते है. हमारे नजरो में वह चोर है. सारे गलत काम वही करता है. वगैरह वगैरह. बावजूद आप संपन्न और हैसियत वाले है तो आपको हर चींज की खुली छूट होती है. इसलिए सारी लड़ाई इस क्लास में ढूकने और जगह बनाने की होती है.
यही कारण है जब माल्या जैसे पूँजीपति हमारे करोड़ो रुपए लेकर भाग जाते है. या सरकार कौड़ियों के दाम पर पूँजीपतियों को जमीनें मुहैया करवाती है. उससे अपना राजनीतिक हित साध रही होती है. तो हमें उसपर नजर नहीं जाता. क्योंकि वह हमारे नजरों में विकास है. लेकिन बात शिक्षा, स्वास्थ्य, किसानों के सब्सिडी पर आती है. तो एक बड़ा वर्ग मुँह बिचकाने लगता है. कि इन्हें खैरात और मुफ्त की आदत पड़ गई है. टैक्स के पैसे से यह ऐय्याशी काटते है आदि.
बचपन से ही हमें ऊंचे-नीचे में बाँट दिया जाता है. स्कूल इसी सीख के साथ भेजा गया कि जो क्लास में तेज हो उन्हीं के साथ दोस्ती, मेल-मिलाप रखें. अपनी बात कहूँ तो मैं औसत से भी खराब छात्र रहा हूँ. लास्ट बेंचर भी कह सकते है. अपने अनुभव के आधार पर कह सकता हूँ सरकारी स्कूली शिक्षा के दौरान मैंने सबसे बेहतरीन टैंलेट लास्ट के कुछ बेंच के दोस्तों में ही देखा.
कोई अच्छा सिंगर था. कोई तबला अच्छा बजाता था. छुटपन में तबले की वह ठाप अच्छी ही लगी. उनमें से ज्यादातर अच्छा फुटबॉल खेलते. बाकी सारे खेल में भी अपने-अपने तरह से माहिर. कोई मिमिक अच्छा करता था. होता यह था कि उम्र के उस पड़ाव में आर्थिक हैसियत से पिछड़े होने के कारण सभी सरकारी शिक्षा लेने को मजबूर थे. एडूकेशन जैसे-तैसे भी मिल रहा था वह कम था क्या.
पारिवारिक बोझ से दबे यह लड़के कम समय में ही बड़े हो गए थे. लंबाई और शारीरिक रूप में भी. इस वजह से भी मास्टरजी इन्हें लास्ट बेंच में ही बैठने को कहते. यह रोजगार में माँ-बाप का हाथ बटाते. स्कूल से जाने के बाद से लेकर आने के पहले तक. कारण रहा इनमें से किसी की पढ़ाई उस तरह से पूरी नहीं हुई. कोई दसवीं के सेंटअप में फेल हुआ कोई बारहवीं के फाइनल में. मैं घीच-घाच के पास भले हुआ.
साथ छूटा. जब आज मैं उन्हें याद करता हूँ तो पाता हूँ कि ज़िंदगी के क्लास में हमारे स्कूली क्लास में पहले आने वाले उस लड़के से ज्यादा मैंने इनसे सीखा है. वह फर्स्ट क्लास वाला लड़का जीवन के उलझनों में कभी याद नहीं आया. जितना मेरे लास्ट बेंच के दोस्त. क्योंकि इन्होंने हमेशा कुछ नया सीखाया. सूचनाएँ नयी होती थी. जो किताब में नहीं होता.
10-12 साल पहले समाज और स्कूल में इन्हें किस नजर से देखा जाता होगा. सोचिएगा. अलग-अलग विशेषताओं में माहिर ये दोस्त आगे नहीं बढ़े. अभी तो मामला थोड़ा बदला है लेकिन उतना भी नहीं. की हम अपने मन का करने का सोच भी लेते है. उस वक्त नहीं था. या यूँ कहे गाइडेंस का अभाव रहा. आज मनोज कुमार कुर्मी, चंदन हरिजन, सत्तन चौधरी, कार्तिक माँझी, जावेद आलम, अनिल राजवंशी कितने नाम लूँ. आज कहाँ है? नहीं मालूम.
आज सब सरकार शिक्षा के बजट लगातार कम करती जा रही है. या प्राइवेट के हाथ में सौंपती जा रही है. तब सोचता हूँ न जाने आज भी कितने टैलेंट ऐसे ही खत्म हुए होंगे. माने एक बड़ा तबका शिक्षा से सीधे बाहर. वैज्ञानिक सोच पैदा होने की बात तो दूर की है. तो मूर्खता फलेगा-फूलेगा ही.
इस गैर-बराबरी में बढ़े हुए समाज में हमलोग जायज है कि मसलों का निवारण खुद से न करके रामवाण इलाज में ढूँढ़ने लगते है. जबकि उसके जड़ में जाने या उसे जानने-समझने का कोशिश तक नहीं करते हैं. क्योंकि समझदारी बनती ही नहीं. और यह एक लंबी प्रक्रिया है. हम यह नहीं स्वीकारते की हमारे समस्याओं का निवारण हमें खुद करना है. खुद लड़ना है. खुद जुझना है. किसी ईश्वर-अल्लाह आदि को इतना फुरसत नहीं है. इन सबको निपटाने का.
आज इस पूँजीवादी व्यवस्था की सचाई यही है कि हर इंसान अपने आप में अकेला है. आज जब तरह-तरह के सोशल माध्यम है. कॉल्स फ्री. फिर भी हम कितने लोगों के संपर्क में रहते है. हम सबने अपनी-अपनी आभासी दुनिया रच ली है. जहाँ आई-मी-माइसेल्फ का कॉनसेप्ट लागू होता है. साराह जैसे एप की उपयोगिता को ही देख लीजिए. उसे हमने कैसे उपयोग में लाया है. आत्ममुग्धता से बाहर नहीं निकलें. हमने इनकरेज-एपरीसिएट और कम्पलीमेंट करना छोड़ दिया है. छोटी-छोटी खुशियों को सेलिब्रेट करना भी. और कुण्ठा पाल लिया है.
आज हम दोस्तों से मिलने के लिए नहीं मिलते हैं. पीने और खाने के लिए मिलते हैं. क्योंकि हमने इस व्यवस्था से जो पैसे बनाये है. उसे कहीं खपाना भी तो है. शो-ऑफ अलग. मुलाकात भी पहले की तरह नहीं रहा. देखता हूँ मिलने पर भी लोग एक-दूसरे की निंदा ही करते है. पर निंदा सुख. या कहाँ-कैसे-क्या जुगाड़ हो पाएगा. कोई बात नहीं करता क्या पढ़-लिख रहे हो? नया स्टोरी आइडिया क्या है, उस पर काम कैसे किया जाए. वगैरह.
कोई संघी-भाजपाई है तो कांग्रेसी को गरिआएगा. आप-कम्युनिस्ट-सोशलिस्ट-बसपाई आदियों का छौंक अलग से. सब गड्मड् है. तू-तू मैं-मैं. इन सब में आदमियत या इंसान कहीं नहीं. गरिआते रहो. निकलता कुछ नहीं.
आज हमें आभासी दुनिया और उसके दोस्तों से बाहर निकल कर असली रिश्तों को बचाने की जरूरत है. जो हमने कहीं पीछे छोड़ दिया है. बात करने की जरूरत है. समझने-समझाने की जरूरत है. जहाँ असहमति का पूरा सम्मान हो. हाँ-ना कहने का स्पेस. और खुद को हर मोड़ पर संपादित करने की गुंजाइश. आदमी-औरत, बड़े-छोटे के लिहाज से परे. आपसी बराबरी में. दोस्ती में. बिना किसी नैतिक दवाब के. जहाँ सम्मान झुकने से नहीं. औपचारिकताओं के नाटक से नहीं. दिल में हो. गले लगने और हाथ मिलाने में हो. माफ करने में हो. जहाँ घर के छोटे-से-छोटे सदस्य को अपनी बात कहने का स्पेस हो. क्योंकि हमसब पहले दिमाग है. उसकी अपनी विचार-यात्रा है. समझदारी है. जो भी हो गलत-सही. लेकिन उस पर बात तो हो ही सकती है.
हमने समाज में जो इतना रायता फैलाया है न. फैलाया ही नहीं. लपेस दिया है. सो उसे हमें ही अंततः साफ करना है. बावजूद हर किसी को अपने हिस्से का संघर्ष और लड़ाईयाँ खुद ही लड़ना होता है. आंतरिक बेचैनियों-अंतरद्वंदों से होकर खुद गुजरना होता है. ऐसे में बाहरी मदद की जरूरत होगी तो बचे रह गए कुछ दोस्तों से, रिश्तों से. न की किसी बाबा, पीर, फकीर से…
राजीव.

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