क्या हमारे समाज में महीला सुरक्षित होगी ?

Self-Published

कुछ साल 1988 और 1990 के दरम्यान का समय होगा, दादा जी की मृतुय के बाद दादी जी को साथ ही अपने इस शहर में ले आये थे, गावँ में ना ही स्वास्थ्य सुविधाये थी और ना ही अपने रोजगार के चलते पापा या ताया जी गावँ में दादी जी के साथ रह सकते थे, दादी की तबियत भी खराब थी और उन्हे शहर में आते सार एक घर के पास ही ट्रस्ट अस्पताल में दाखिल कर दिया था, कुछ दिन अस्पताल में ही रहने की वजह से और पापा और ताया जी की जॉब जिसका कोई निर्धारित समय नही था घर आने का, इसी वजह से ताई जी को ही रात का खाना अस्पताल लेकर जाना होता था, और एक रात कुछ शाम के 7 या 8 का समय होगा ताई जी ने मुख्य सड़क पर से अस्पताल के लिये शेयर ऑटो लिया, जिसमे पीछे सिर्फ ताई जी ही बैठी थी वही ऑटो ड्राइवर के साथ एक और पुरुष सवारी आगे बैठी थी, इन दोनों की बात चीत से ये अंदाजा लगाना ताई जी के लिये मुश्किल नही था की ये दोनों पहले से ही एक दूसरे को जानते है, लेकिन उनकी बातों से और इशारो से ताई जी को शक हुआ और उन्होंने तुरंत ऑटो को रुकवाकर बीच रास्ते में ही उतर गयी, फिर एक दूसरे ऑटो से जिसमे और भी महिला सवारी थी, में बैठकर अस्पताल दादी जी को खाना देने पहुची लेकिन उस दिन से ताई जी ने रात को  अकेले जाना बाहर बंद कर दिया था.

हम उस समय सभी अपने बचपन की उम्र में थे तो हमें सभी को यही बताया गया की ताई जी ने सोने की बालिया पहन रखी थी शायद ऑटो चालक का इरादा इन्हे लूटने का था इसी को भाप कर ताई जी ने ऑटो बीच रास्ते में ही छोड़ दिया, कुछ साल बाद में दसवीं पास रहा हूँगा, मैं और मेरी माँ हम दोनों अपने इस शहर से गाँव की और आने के लिये ट्रैन से आ रहे थे, रास्ते में और कुछ पुरुष सवारिया चढ़ी जो शायद जम्मू से आगे किसी धार्मिक यात्रा पर थे, इस समय हमारी ट्रैन की 8 सीटों के स्लीपर क्लास में एक तरह से कम्पार्टमेंट में माँ अकेली महिला थी, बीच रास्ते साथ की पुरुष सवारियों का आपस में जोर जोर से बात करना, हसना, ठहाके लगाना कही भी कुछ सहज नही था, बा मुश्किल हमने लुधियाना आकर इस सफर का अंत किया, ट्रैन या ऑटो या बस किसी भी तरह की यात्रा में कही भी एक महीला भारत देश में सहज महसूस ना करती थी और ना ही अब करती है.

जब थोड़ा बड़ा हुआ, आवाज में शब्दों की कठोरता ने कही भी हो रही गलत घटना के खिलाफ बोलना सीखा दिया तब भी अनुभव ज्यादा अच्छा नही रहा, मेरे गाँव में एक रिश्तेदारी में बहन बस के इंतजार में सड़क पर छोड़कर वापस कुछ सामन उठाने के लिये नजदीक ही अपने घर आया और कुछ ही पलों में वापस समान उठाकर सड़क की और हो गया जंहा मेरी बहन पहले से खड़ी थी, इसी दरम्यान एक नजदीक में ही बैठा व्यक्ति जिसने कुछ शराब भी पी रखी थी, मेरी बहन से पता पूछने के बहाने परेशांन करने लगा लेकिन जैसे ही उसने मुझे देखा वह वँहा से नो दो ग्यारह हो गया, यंहा में खुद को कोस रहा था की कुछ ही पलों के लिये ही सही मैंने अपनी बहन को इस तरह अकेले क्यों छोड़ा और साथ ही साथ एक और तथ्य का सामना हुआ की भारत देश में एक महीला तभी तक सुरक्षित है जब तक उसके साथ कोई ना कोई पुरुष रिश्तेदार साथ है.

लेकिन मेरी ये धारणा भी ज्यादा समय तक स्थायी नही रही की किसी महिला के साथ किसी पुरुष के होने से महिला सुरक्षित रहेगी, साल 2010 और 2011 के दरम्यान, एक दिन सहारा माल के पीछे स्थीत अपने पीजी से पुराने गुड़गावं के बाजार जाने के लिये एक मीनी बस का सहारा लिया जंहा सवारी के रूप में दो जवान बेटियो के साथ उनके पिता भी सफर कर रहे थे लेकिन थोड़े समय के बाद मेरी निगाह बस के कंडक्टर (सहयोगी स्टाफ) पर गयी जो इन लड़कियों को इस तरह घूर रहा था, जंहा लड़कियों के पिता और सारी सवारिया कही ना कही खुद को बैसहरा महसूस कर रहे थे, मैं बाकी किसी के बारे में अंदाजा ही लगा सकता हूँ लेकिन मेरी चुपी के बारे में मैं कह सकता हूँ की पारिवारिक जिम्मेदारियां, परदेश और सरकारी पुलिस और अदालतो के चक्कर में उलझना नहीं चाहता था जंहा जिंदगी घुटने टेक देती है लेकिन सरकारी व्यवस्था का दामन नही छूटता.

खाखी वर्दी, जिस पर सविधान को अमल करने का दायितत्व है वह भी कितनी दागदार है ये हम में से किसी से छुपा नही है, पिछली नवरात्री पर, घर से नजदीक ही दुर्गा पूजा के संदर्भ में बंगाली समुदाय द्वारा एक बड़े से पंडाल को सजाया गया था. जिसे एक रात मैं भी अपने परिवार के साथ देखने गया था, जब बाहर आये तब बच्चो ने खिलौने लेने की जिद्द की और हम वहां ना चाहते हुये भी रुक गये, कुछ ही पलों में एक खाखी वर्दी को पहने हुये एक सिपाही आया जो खिलौने वाले को अवैध जगह से हटाने के लिये जोर जोर से माँ बहन की गालिया दे रहा था, जब पास आया तो बदबू से इस बात का भी एहसास हो गया की भाई साहिब ने शराब पी रखी है, मैं अपने परिवार के साथ, जंहा मेरे परिवार के साथ और भी परिवार मौजूद थे कही भी इन गलियों को ना सुनना चाहते थे और ना ही इनसे कही सहज थे, जब मैने रोकने की कोशिश की तभी ज्यादा तर्क और वितर्क काम नही आये, खेर हमारे समाज में पूजा भी एक देवी की होती है, गालिया भी महिला के संदर्भ में दी जाती है और ये गालिया एक आम नागरिक, सुन भी रहा होता है और ना चाहते हुये भी इसको सहना भी पड़ता है क्योंकि गालिया हमारी व्यवस्था में उसी तरह मौजूद है जिस तरह दूध में पानी जिसे अलग करना कही भी मुमकिन नही है, कोशिश करनी भी बेईमानी सी है.

लेकिन जब जब किसी औरत पर हो रहे जुल्म पर हमारा मीडिया अपनी ताकत का परिचय देता है, तब तब समाज में एक बहस छिड़ जाती है की आखिर महिला हमारे समाज में सुरक्षित क्यों नही है ? ये भी सत्य है की आज 95% पुरुष भी ये चाहते है की महीला को उसका हक मिल जाये लेकिन जब भी एक दोपहिया वाहन जिस पर पीछै एक महिला बैठी होती है और ये वाहन गावँ और कस्बो से गुजरता है तब भी महिला को ही कहा जाता है की उसे ही अपना मुंह ढककर बैठना होगा क्योंकि हर चौराहे पर जो एक पुरुष प्रधान की भीड़ बैठी है वह दूर आ रही महिला को ताड़ ने में ही अपनी मर्दानगी समझती है, खेर हमारे समाज का सूझवान तबके का पुरुष भी जो महीला को अपनी बराबरी का दर्जा देने की हामी भरता है वह भी एक भृम है मसलन गोर कीजिए किसी कारण परिवार की महिला जो रिश्ते में माँ या बहन या पत्नी है अगर कुछ पुरुषो के सामने अपने घर के पुरुष से उच्ची आवाज में बात कर ले, तो शायद मुझे या आप को ये कभी कबूल नही होगा, यंहा सिर्फ आवाज को ऊँचा करने मात्र से रिश्तों में दरार आ सकती है.

लेकिन इसके कारण क्या है, अगर आपने जेनोसाइड के कारणों का अध्ययन किया है तो आप समझ सकते है की ये कारण शारीरिक मोत के साथ साथ वैचारिक मोत पर भी लागू होते है मसलन चुटकुले, हमारे समाज में महिलाओं पर कहे जाने वाले चुटकुले महीला को हास्यास्पद बना देते है जो महिला की एक गंभीर छवि को उभरने नही देता, वही हमारी फिल्मो में, लच्चर गीतों में एक महिला को कही भी एक जीवित इंसान की छवि में ना दिखाकर एक वस्तु के रूप में पेश करने की कवायद किस तरह जोर शोर से की जाती है इसका अंदाजा हम सभी को है, मसलन इंसानियत जज्बात महीला को एक वस्तु के रूप में देखते है जंहा इसकी चीक पुकार सुनी तो जाती है लेकिन दर्द का एहसास नही होता.

इसकी सबसे बड़ी वजह हमारी ब्राहिमनवाद सोच भी है, जो समाज को पुरुष प्रधान घोषित करती है, अंधविश्वास ऐसा की कभी मूर्ति दूध पीती है तो कभी चोटी काटने के इल्जाम एक महिला को मार दिया जाता है, जंहा वैचारिक गुलामी है, सवाल पूछने की और जवाब देने की ना क्षमता है और ना ही गुलाम बुद्धि को इसका एहसास, यँहा महीला पर हो रहे जुल्म को, इस पर हो रही बहस को किस तरह महीला के चरित्र के साथ जोड़कर, पूरे मामले को किस तरह नया रंग दे दिया जाता है ये हम सब जानते है निर्भया कांड के बाद संत आसाराम का विवादित बयान की अगर लड़की बलात्कारियो के पैर पकड़ लेती उन्हे भइया कहती तो ये जुल्म ना होता, अब जिस समाज में खुद को धार्मिक कहे जाने वाली संत बाबा इस तरह का ब्यान देगे और दूसरी तरफ महीला को बच्चा पैदा करने वाली मशीन के रूप में देखा जायेगा, वह समाज कितना अस्वेदशील है इसकी कल्पना हम सब कर सकते है और भारतीय समाज के रूप में इसे हकीकत के रूप में देख भी सकते है.

निर्भया के बाद भी, आज भी महिला पर हो रहे जुल्म और बलात्कार की संख्या साल प्रति साल बढ़ती जा रही है और इस पर किस तरह काबू पाना है इसकी कही भी कोई ठोस नीति हमारी सरकार, खाखी वर्दी और कानून के पास मौजूद नही दिखाई दे रही, इस हालात में हमारे समाज में महिला पर जुल्म होने बंद हो जायेगे, महीला सुरक्षित होगी, ये सब एक भृम की तरह ही लगता है जिसे हर 5 साल के बाद चुनावी भाषणों में दोहराया जाता है लेकिन व्यक्तिगत क्रांति की नामौजूदगी में मुझे नही लगता की महीला को पुरुष समाज में बराबरी का दर्जा मिल पाएगा,

समय समय पर पीड़ित के नाम बदल जायेगे लेकिन समाज उसी रूप में महीला के ही विरोध में खड़ा होगा जैसे पहले था, अगर कुछ बदलाव लाना है तो उसकी शुरुआत परिवार और व्यक्तिगत सोच से होगी, क्योकि एक नागरीक समाज की रचना करता है और समाज एक नागरीक की रचना, ये दोनों एक दूसरे के पूरक है और निर्भर भी, इसी दायरे से महीला के विकास की बात हो सकती है अन्यथा महीला सुरक्षा के लिये बहस तो जरूर हो सकती है लेकिन हकीकत में बदलाव नही लाया जा सकता.

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