गोरखपुर I am responsible

Posted by Sandeep Anand kumar
August 23, 2017

Self-Published

गोरखपुर उप्र में जो कुछ भी हुआ उसका जिम्मेदार ना ही मुख्यमंत्री है ना ही प्रधानमंत्री और उसका कोई जिम्मेदार है तो मैं स्वयं हूं क्योंकि जब चुनाव हुए तो मैंने एक बार भी प्रधानमंत्री से और मुख्यमंत्री से कभी ये मूलभूत मुद्दों के बारे पूछा ही नही कि स्वास्थ्य के बारे में आपकी क्या नीति रहेगी।
राज्य या देश मे जो स्वास्थ के बिगड़े हुए हालात को आप कैसे सुधारेंगे, शिक्षा के बारे आप कोनसी नीति ला रहे हो जिससे हमारे राज्य और देश में शिक्षा का अधिक विस्तार हो , कुपोषण के शिकार होते इस देश के बारे आप क्या कुछ ऐसा करेंगे जिससे मेरे देश के हजोरो लाखों कुपोषित बच्चो का भविष्य स्वस्थ होगा, भुखमरी पर आप क्या करने वाले है या कोई नई व्यवस्था लेन एले हो जिससे आप लोगो को दो जून की रोटी दिल सके,क्या करंगे आप जिससे बेरोजगार युवाओं को रोजगार मिलेगा और हमारे आने वाले भविष्य सुधार सकेगा।
एक आम आदमी की संवेदनाएं तब तक नहीं जब जागृति जब तक कुछ बुरा उसके साथ या उसके परिवार उसके चाहने वालों के साथ ना हो हर आम आदमी इंतजार करता है किसी ने किसी घटना का कोई न कोई घटना ही आम आदमी के जानने का कारण बनती है आम इंसान कभी भी ज्यादा हुआ नहीं रहता हमेशा सोया हुआ ही रहता है उसी सोने की आदत ने आज उसको इतना लाचार बना दिया है कि वह अपने हक के लिए अपनी आवाज उठाने में भी असमर्थ है मैं भी उन्हीं लोगों में से एक हूं मैंने भी कभी नहीं सोचा कि जिस पार्टी को जिस व्यक्ति को चुना है क्या वह व्यक्ति लोगों का भला कर रहा है या नहीं कर रहा है ।

सारे मूलभूत सवालों को छोड़कर मैं पार्टी भक्ति में डूब कर मैं गाय-हिन्दू-मुसलमान,मंदिर-मस्जिद,कब्रिस्तान-शमशान,ईद-दीपावली, पाकिस्तान-कश्मीर और गुलाबी क्रांति जैसे मुद्दों में ही सिमट के रहा गया। कभी मूल मुद्दों पर सोचने का समय ही नही मिला अपनी पार्टी को और अपने नेता को जिताने के लिए मैं अंधा होता जा रहा था। मैं तो भूल ही गया कि मैं ही जनता हूं मैं एक वोटर बन के रह गया और कभी इन सवालों के आगे न जा पाया नही किसी जाने के लिए प्रेरित कर पाया।

आज जिन समस्याओ का हम सामना कर रहे है उन समस्याओ के हल बारे में तो कोई वादा किया ही नही था मेरे राजनेताओ ने तो अब में उनको दोषी कैसे मान लू।
इनके वादों में गाय थी,मंदिर था,लवजेहाद था,एन्टीरोमियो दल था,पाकिस्तान था,चाइना था,सब कुछ था मगर मूल मुद्दे नदारद थे और जब इसका पता हमको चला है तो समय हाथ से निकल चुका है।
आज प्रशासन संवेदनहींता की पराकाष्ठा को लांग चुका है, हर पल अनेको माध्यम से जुड़े रहने वाले मेरे प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्री को इतनी फुरसत नही की उन बच्चो के माता पिता का हाल जाना जाए, आप लोगो को कोई औलाद नही पर इनको अब ताउम्र बे औलाद जीना पड़ेगा।
अब मुझे सवाल खुद से करना होगा कि मैं क्या चाहता हूँ, वोटर बन कर सिमट जाऊ या जनता बन कर अपने सवालो को अपने नेताओं तक पहुँचाया जाए?
मैं शायद यह जान गया हूं कि मुझे मेरे सवालों को मेरे नेताओं तक पहुंचाना ही होगा उम्मीद करता हूं बाकी लोग सिर्फ मोटर बंद करना रहे वह भी एक जरूरतमंद इंसान की तरह अपने हक की आवाज उठाये।
धन्यवाद
संदीप आनंद पंचाल

Gorakhapur madical college

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