झूठी उम्मीद?

Posted by Rahul Verma
August 17, 2017

Self-Published

तो देखो पूरी बात जो है वो ‘बच्चों’ के विषय में लिखे है।

जब पहली बार कुछ गंभीर सोचा था तब हाई स्कूल यानी दसवीं में थे, तब अखबार पढ़ने का बड़ा शौक था, वैसे आउट ऑफ़ सिलेबस सब कुछ पढ़ने का बहुत शौक था और है।
उस रोज़ एक ख़बर पढ़ी, ‘इटावा जिले के डीएम ने 5 मेधावी गरीब छात्रों हायर स्टडीज के लिए फाइनेंस किया।’ बहुत अच्छा लगा जान कर। हम भी सोचे एक दिन हम भी कुछ करेंगे। बारहवीं के बाद भाग्यवश डीयू में एडमिशन हो गया। स्टूडेंट थे हम सोशल साइंस के तो सोशल कॉज ही ज्यादा दिखती थी। ज़ाकिर हुसैन कॉलेज में पढ़ते थे और बसेरा लक्षमी नगर था। एक दिन इक दूकान पर चाय पीते हुऐ वहाँ काम कर रहे छोटू से पूछा, ‘कितने साल के हो? स्कूल नही जाते हों? वो बोला भैया मम्मी बोल रही थी अगले महीने हम 13 साल के हो जाएंगे, और हम स्कूल नही जाते है। फिर अगला क्वेश्चन दूकानदार से, ‘भैया ये तो अभी अंडरऐज है, आप फिर भी इससे काम करवा रहे हो?’
फिर जो जवाब दूकानदार का था उसने झंड कर दी,
‘अरे सर आप लोगो का ये किताबी ज्ञान दुनिया दारी समझ और देख नही पाता। अगर मैं इस छोटू को अभी निकाल दू तो मुझे फ़र्क़ नही पड़ेगा पर इसकी दुनिया उजड़ जाएगी। इसके घर में इसे मिला कर 4 लोग है, बीमार माँ और इससे भी छोटी दो बहने। इसी के बल पर खर्चा चलता है घर का। मैं मानता हूँ की स्कूल जाना, पढ़ना लिखना बहुतई जरुरी है, पर अगर ये स्कूल जाएगा तो वो 3 लोग कैसे जी पाएंगे?’
भाईसाहब कसम से उस दिन सरकार को, सिस्टम को और खुद को हमने बहुत कोसा। की क्या हालात है देश की।
वैसे और जगह की तो बात छोड़िये आप राजधानी में ही देख लो आपको ऐसे बच्चे हज़ारो की सख्ंया में दिख जाएंगे जिन्हें देख आप तरस खा सके। बात सोचनीय है की जिस देश के नागरिक को नोबल का शांति पुरुष्कार इसी क्षेत्र में मिला हो वहा ऐसी हालात। असंख्य एनजीओ काम कर रहे है, पर असर नही दिखता।
फिर हमने सोचा कुछ करना है

उन बच्चों के लिए:-
जो रेड लाइट पर खड़ी चमचमाती गाडी के शीशे पर अपनी मटमैली हथेली रख कर दुसरे हाथ से भूख लगी है का इशारा कर रहे होते है।

उन बच्चों के लिए:-
जो देल्ही पब्लिक स्कूल की टी-शर्ट पहने हुए अपने वजन से ज्यादा भारी बोरी पीठ पर लाधे हुए कूड़ा बीन रहे है।

उन बच्चों के लिए जो:-
राजीव चौक मेट्रो के किसी गेट के बाहर पेन बेच रहे है।

बात 3 साल पहले की है, अब हम ग्रेजुएट हो गए है और mnc में काम करते है और कैब से ऑफिस जाते वक़्त अगर कैब का शीशा खुला रह जाता है तो रेड लाइट पर कोई बच्चा ‘भैया भूख, भैया भूख’ बोल ही रहा होता है उससे पहले मेरे कैब मैट्स शीशा ऊपर चढ़ा चुके होते है और मैं अफ़सोस लिए चुप-चाप भैठे रहता हूँ।

ऊपर लिखी बातो में हम अभी तक
किये कुछ भी नही है, पर अभी भी उम्मीद लिए फिरते है की कुछ करेंगे इन बच्चों के लिए एक दिन। क्या आप भी ऐसी कोई अधूरी उम्मीद लिए फिरते है ?

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