तीन तलाक का ख़त्म होना ही महिला सशक्तिकरण नहीं है

Posted by Deepak Bhaskar
August 22, 2017

Self-Published

२२ अगस्त को भारत का ऐतिहासिक दिन बताया जा रहा है. महिला सशक्तिकरण के रास्ते में एक मील के पत्थर जैसा माना जा रहा है. मानो सब ठीक हो गया हो. सर्वोच्च न्यायलय ने ट्रिपल तलाक को असंवैधानिक बताया है और सरकार को छः माह के भीतर कानून भी बनाने का आदेश दिया है. बस देश में मुसलमान औरतों की जीत का जश्न मनाया जा रहा है. लेकिन मूल सवाल आज भी यही है क्या तीन तलाक को ख़त्म कर देना भर ही सरकार की जिम्मेदारी है. क्या इसके खत्म हो जाने से मुसलमान महिलाएं सशक्त हो जाएँगी. इसमें कोई दो राय नहीं कि मुसलमान महिलाओं की समस्या का निदान होना ही चाहिए लेकिन सिर्फ मुसलमान महिलाओं की समस्या पर इतना बल क्यूँ दिया जा रहा है. क्या हिन्दू और अन्य धर्मों की महिलाओं का सशक्तिकरण हो चूका है. क्या इस देश की अन्य महिलाएं पति के अत्याचार से मुक्त हो चुकी हैं.

कानून का क्या है वो तो है. हिन्दू मैरिज कानून से लेकर घरेलु हिंसा कानून तक है, दहेज़ के कानून से लेकर बलात्कार के खिलाफ भी कानून है. तो क्या अब यह सब बंद हो गया. कानून होना चाहिए क्यूंकि इसी से भविष्य की संभावनाएं तय होती हैं. कानून बनाना सरकार का काम है लेकिन कानून का जब महिमा-मंडन होने लगे, किसी वर्ग को नीचा दिखाकर खुद को बेहतर मानने लगे तो वो कानून नहीं रह जाता बल्कि राजनीति का रूप ले लेता है.

जो लोग आज ट्रिपल-तलाक के ख़त्म होने पर एक दुसरे को बधाई दे रहे हैं वो आने वाली शादी के लगन में बिना दहेज़ के एक इंच न खिसकेंगे. कितने रिश्ते इस आधार पर ठुकरा दिए जायेंगे की लडकी काली है, उसकी नाक नुकीली नहीं, होंठ मोठे हैं, लम्बी नहीं, पतली नहीं, स्तन का साइज़ ठीक नहीं, कमर का मानक ठीक नहीं इत्यादि-इत्यादि. जब यह सब होगा तो ट्रिपल तलाक का जश्न क्यूँ. जो सरकार ट्रिपल ख़त्म कर इतिहास रचना चाहती है उसे महिला आरक्षण के बिल को संसद में पास कर देना चाहिए उसमें मुस्लिम महिलाओं को अलग से आरक्षण का प्रावधान होना चाहिए. तीन तलाक के ख़त्म होने से महिलाएं पुरुषवादी समाज के चंगुल से बाहर तो नहीं आ जाएँगी. देश की ५० प्रतिशत महिलाओं को उन्हें उनकी नुमाईंदगी करने का अधिकार मिलना चाहिए. संसद में आज भी महिलाएं ५० के आंकड़े के आस-पास ही रहती हैं. तीन-तलाक अमानवीय है परन्तु इसके ख़त्म होने का महिला सशक्तिकरण से कोई सम्बन्ध नहीं. महिला सशक्तिकरण तो उनके शिक्षित होने में है, उनके नौकरियों में स्थान पाने से है, संसद में खुद की आवाज बनने में है, उनके कामकाज और निर्णय की प्रक्रिया में उसकी भागदारी होने में है. तीन-तलाक का खत्म होना पुरुषों की मनमानी पर तो रोक लगा सकता है लेकिन महिला को सशक्त नहीं कर सकता. जिस मुसलमान औरतों के लिए आज रोया जा रहा है वही मुसलमान महिला जब कल आरक्षण की मांग करेंगी तो उसे क्या-क्या नहीं कहा जायेगा.

जिस न्यायलय ने आज यह निर्णय दिया है इसी तरह के न्यायलय ने शादी-शुदा औरतों के पति के द्वारा उनके साथ जबरदस्ती सम्भोग करना बलात्कार नहीं लगता है. मुसलमान औरतों के लिए इतने संवेदनशील हो रहे हैं लेकिन समलैंगिकता पर हम संवेदनहीन कैसे हो जाते हैं. आदिवासी औरतों के साथ रोज हो रहे अत्याचार पर हम इतने निष्क्रिय कैसे हो जाते हैं. महिलाओं के दुर्लभ जीवन पर हमारा कोई विचार क्यूँ नहीं होता है. किसी महिला को प्रेम करने के जुर्म में जब हम क़त्ल कर रहे होते हैं तब हमारी संवेदना क्यूँ नही होती. जब महिलाओं को डायन बताकर उसे मानव मलमूत्र पिलाकर जिन्दा जलाया जाता है तो हम इतने ही उत्साहित होकर विरोध क्यूँ नहीं करते हैं. दस साल की लड़की को जबदस्ती बच्चा पैदा करना पड़ता है तो हमारी जुबान किस बात का इन्तेजार कर रही होती है. कई हजारों सवाल हैं जिसका जबाब हम में किसी के पास नहीं है. शायद इसलिए तीन तलाक के खत्म होने में, जश्न मनाने जैसी कोई बात नहीं.

इसे महिला सशक्तिकरण का नाम मात्र भी देना इस देश में हो रहे महिला आन्दोलन को कमजोर करने जैसा है. याद रहे पिंजड़ा तोड़ जैसे आन्दोलन आज भी हमारे जेहन को कौंध नहीं पा रही हैं. तीन तलाक के कारण महिलाओं को परेशानी थी लेकिन नर्मदा आन्दोलन के उन हजारों-लाखों परिवार की महिलाओं के प्रति संवेदना का न होना हमारे महिक्ला सशक्तिकरण की समझ पर सवाल खड़े करता है. हमें देखना चाहिए की कहीं इस उत्सव के आड़ में असली सवाल से दूर तो नहीं किया जा रहा है. क्यूंकि असल में सशक्तिकरण महिला को “ना” कहने के अधिकार मिल जाने में है.

दीपक भास्कर, लेखक दिल्ली विश्विद्यालय में राजनीति पढ़ाते हैं.

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