निकाह हलाला के नाम पर सेक्स की डिमांड क्या मजहब के नाम पर सब जायज है?

Posted by Sufii Shreya
August 21, 2017

Self-Published

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“कब तक ये जंग जारी रहेगी,

औरत कब तक बेचारी रहेगी,

मर्द से कब तक हारी रहेगी,

औरत ने है ये सवाल उठाया। (rekhta)

ट्रिपल तलाक और निकाह हलाला से अगर इन पंक्तियों को जोड़ा जाए तो ये साफ है कि औरत कल भी मुद्दा थी और आज भी मुद्दा ही है। आज हम 21वीं सदी में हैं फिर भी ऐसी कुप्रथाओं से निकल नहीं पा रहे। सती प्रथा और बाल विवाह जैसी प्रथाओं से तो हम उबर चुके लेकिन मुस्लिम समुदाय के लोग ना जाने ऐसे अंधविश्वास से कब तक निकल पाते हैं। कितनी महिलाओं ने प्रधानमंत्री को खत लिखे विषय बस एक ट्रिपल तलाक का अंत। कितनी कहानियां सुनने में आईं कुछ नहीं आया तो बस बदलाव। हालीं में इंडिया टुडे के वीडियो ने ये साफ किया कि किस तरह निकाह हलाला के नाम पर मासूम महिलाओं को ही हलाल किया जा रहा है। वीडियो में मौलवी की बातों ने ये साफ किया कि उन्होंने अपनी भूख को मिटाने का इसे एक जरिया बना लिया है, ऐसा जरिया जो कहता है कि किसी भी औरत को अगर अपना निकाह बचाना है तो ऐसा हलाला करवाना जरूरी है।

“मेरे पति ने मेरा हलाला करवाया और मुझे घर ले गए। फिर मुझे अपनाने से मना कर दिया और कहा मैंने बस केस वापस कराने के लिए ये सब किया। मेरे मना करने पर भी ननदोई को मेरे कमरे में भेज देते हैं और बहुत जुल्म करते हैं, सास बोलती है इसमें कुछ बुरा नहीं”।

ये शब्द हैं उस महिला के जिसकी खबर ने फिर हमें सोचने पर बेबस कर दिया है। जिस पति ने तीन बार तलाक दिया उस पति को अगर एक औरत फिर से अपनाना चाह रही है तो हलाला उस मर्द का होना चाहिए या उस औरत का। निकाह हलाला को मौलवी और कुछ बुद्धिजीवियों ने एक प्रोसेस बना लिया है जिसके तहत वो अपनी चाहतों की पूर्ति करते हैं और नाम देते हैं मजहब का। यहां तक कि रात गुजारने के बाद वो गारंटी देते हैं कि वो उस औरत को तलाक दे देंगे।

हम बहुत सी कहानियों से रूबरू होते हैं लेकिन किसी भी कहानी में ये नहीं सुना कि किसी औरत ने अपने पति देंगे। लेकिन उस पति की क्या गारंटी कि हलाला के बाद भी वो अपनी पत्नी को अपना लेगा। को तलाक दे दिया। कोई पति मैसेज कर के तलाक दे देता है, किसी को ज्यादा फुर्सत  हुई तो कॉल कर लेता है, कोई तो लिख कर चला जाता है तलाक तलाक तलाक। कोई पति हलाला करवाता है, कोई हलाला के बाद भी नहीं अपनाता, और कोई हलाला करवा कर घर ले जाता है और दूसरे मर्दों के साथ सोने को कहता है।

मेरा सवाल है कि औरत ही क्यों ऐसी परीक्षाओं से गुजरे मर्द की क्या जिम्मेवारी है? निकाह जैसे पाक रिश्ते को दोनों बराबरी से निभाते हैं फिर निकाह तोड़ने का फैसला सिर्फ एक को क्यों? क्यों तलाक के बाद बस औरत को हराम माना जाता है? मर्द तब भी शान में घूमते हैं। रामायण के युग में भी माता सीता ने अग्नि परीक्षा देकर अपनी पवित्रता साबित की। आज भी औरत दूसरे मर्दों के साथ सो कर अपने रिश्ते को बचाती हैं। क्या बदला है इन युगों में? औरत को उस वक्त भी दबाया गया और आज भी दबाया जा रहा।       

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