फितूर ए आज़ादी

Posted by Priyamvada Rana
August 2, 2017

Self-Published

मैं हूँ उस आज़ादी की कैदी,
जिसे कश्मीरी कहकर दरकिनार किया तुमने- 1989 में, 2008 में, 2010 में और अभी 2016….

कैदी हूँ, क्योंकि यह आज़ादी मुझे जीने नही देती, हर वक़्त एक सफ़ेद गुलाबी लिहाफ़ कि तरह मेरे कन्धों पर रहती है मानो कभी भी मौत का कफ़न बन जाएगी।

डर लगता है ऐसी आज़ादी के लिहाफ़ से जिस पर बने गुलाबी फूलों ने मेरे अपनों के ठंडे, बेजान शरीर पर पड़ते ही अपना लाल रंग छोड़ दिया था….
अब इस लिहाफ़ का रंग कच्चा है या उन शरीरों की तासीर इतनी ठंडी, यह तो आप ही जाने!

मेरा मन करता है इस आज़ादी के लिहाफ़ को आग लगा दूँ,ख़तम कर दूँ , उस चिंगारी से जो उन पत्थरो की तपिश से निकली थी, जिनको पकड़ने वालों के जनांज़ो में मैं खुद शरीक थी।

शरीक थी उनको यह समझाने के लिए कि ये वक्त का तकाज़ा है मेरे दोस्त, जहाँ घड़ी की सुईयाँ ठीक 5.30 बजे कश्मीरियों के दिलों में उस आज़ाद के लिए सुराख करती है- जो चुप चाप  आती है….मेरे दिल को घर बनाती है…. और मेरी रूह को कैदी।

सोचती हूँ एक घड़ी दिल्लीः से मंगवालू ….शायद हम कश्मीरियों को भी अच्छे वक़्त का दीदार होजाए,

पर फिल्हाल तब तक तो मैं रहूँगी उस वक़्त की कैदी जो जमूरियत के बाज़ार में कश्मीरियत ढूंढने निकली है।

जब निकली बाज़ार में तो एक खिलौना पत्थर जैसा बड़ा पसंद आया,

तबसे उसे पकड़ने की ऐसीे आदत पड़ी है, की हाथ अब खुलने से शर्माते हैं…मानो मुट्ठी से बंद रहकर, सिमट कर, रहना चाहते हो।

मैं खोलना चाहती हूँ इस मुट्ठी को, फ़ेंकना चाहती हूँ इन पत्थरों को,

क्योंकि आज़ादी के बोझ से ये इतने भारी हो चले है कि अपनों के जनांज़े तक अब हलके लगने लगे हैं।

ये लिहाफ, ये  पत्थर, ये वक़्त और वह तमाम चीज़े जिनमे आज़ादी मुझे इतराती दिखती है.…..अब मैं उनसे दूर भागना चाहती हूं…..

क्योंकि ये आज़ादी उस शाही शौक़ की तरह बन चुकी है, जो मौत के पैग़ाम को भी शहादत का तोहफ़ा बनाकर ऐसे भेजती है  मानो कुर्बानी देकर हमने कितनी बड़ी बादशाहत हासिल की हो।

देखिये, Skitzophrenic नहीं हूँ मैं, पर हाँ मेरी हस्ती एक मज़ाक बन चुकी है,

जहाँ वादी कहती है मुझे “आज़ादी का दीवाना” और बाकी सब जगह बोलने को “कश्मीरी” मेरी पहचान है।

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