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बिहार_का_रामायण 

Posted by Satwik Mishra
August 3, 2017

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कुछ लोग नितीश जी को फिर से मशीहा/ईमानदारी का प्रशस्ति पत्र देने लगे हैं। शायद याददाश्त का भी थोड़ा दोष रहा हो।
खैर, एक नागरिक होने के नाते अपना फर्ज अदा करना कर्तव्य समझता हूँ। इसलिए आपके मनोरंजन को ध्यान में रखते हुए आज #बिहार_का_रामायण के ऊपर आपका ध्यान केंद्रित करना चाहूंगा।

लंका में 15 वर्ष के जंगलराज से जब जनता क्लेश और आहत के स्थिति में उम्मीद की किरण ढूंढ रही थी। तब अचानक एक दिन नितीश जी राम बनकर उभरे और लोगों में ये विस्वास जगाया की वो लंका को रावण से छुटकारा दिलाएंगे। लोगों में विश्वास जगा भी और वानरसेना बनते हुए लोगों ने नितीश जी का साथ देकर उन्हें सिंहासन पे बैठा दिया।

फिर अचानक नितीश जी के अंदर लोभ बढ़ने लगी। राजतंत्र करने को लंका बहुत छोटा पड़ गया। पर करे तो करे क्या ? जिस हनुमान ने रावण से लड़ने में मदद की थी, उसे लात मारकर, रावण को अपना छोटा भाई लक्ष्मण बताकर फिर से सिंघासन पे बैठ गए। रावण भी खुश था, 10 में 10 तो नहीं पर फिर भी खोया हुआ कुछ सर तो उसके वापस आ गए। और वानरसेना नाराज ना हो जाये, उसके लिए #सेकुलरिज्म नाम का एक मुफ्त दवा नितीश जी ने समूचे राज्य में बटवा दिया ।

अब रावण का वर्चस्व बढ़ने लगा था। और कुछ मिले न मिले पर 10 सर अब पूरा का पूरा चाहिए था। राम इतना तक भी मान गए। पर फिर रावण ने राम से सन्यास मांग लिया। राम अब डर गए। उनके पास तो दस सर भी नहीं था। एक लंका था अब वो भी जाने के डगर पर आ गया। इतने में राम को अपना हनुमान याद आया। अब हनुमान तो राम के लिए सदैव तैयार ठहरे। बस फिर क्या था। राम के सामने सीना चीर कर दिखा दिया की उनके अंदर आज भी राम का वास है। बेचारे रावण की फिर से बलिदानी दे दी गयी। लंका में फिर से ‘जय श्री राम’ के नारे लग गए। इस बार वानरसेना को खुश करने के लिए #सेकुलरिज्म के जगह #ईमानदारी नामक दवा बटवा दी गयी। लोगों ने जब पूछा की #सेकुलरिज्म के जगह अब ये दवा क्यों ? तो राम जी ने कह दिया की वो अब Expire हो गया है। अगले दो साल तक #ईमानदारी दवा का ही प्रयोग करें। आगे की इलाज के बारे में बाद में सोचेंगे।

अब जनता भ्रमित हो गयी है की आखिर इस कलयुगी रामायण में किसे अब राम कहें और किसे रावण ?
बिना किसी रोग से ग्रसित हुए भी कब तक जबरदस्ती ये #ईमानदारी एवं #सेकुलरिज्म का दवा का सेवन करते रहे?
और ये ईमानदारी का दवा बटवाने के लिए राम को 2.5 साल तक रावण के साथ दीपावली क्यों मनाना पड़ा ? क्या उस समय बिहार का विकास दिमाग से बाहर था?
और ये राम के पेंडुलम रूपी सिद्धांत पे कैसे विस्वास करें, जो अपने स्वार्थ के अनुसार अक्सर बदलता रहता है?
ये फैसला अब वानरसेना को ही करना है।

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