बेपटरी होती रेल

Posted by Bhoopendra Singh
August 21, 2017

Self-Published

अगर आप रेलवे स्टेशन पर जाते हैं तो कई टिकट खिड़कियां दिखाई देती हैं। लेकिन उनमें से कुछ खिड़कियों के पीछे ही कर्मचारी मौजूद होता है बाकी खिड़कियों के मुंह पर बंद होने का गत्ता लगा होता है। असल में ज़्यादा खिड़कियां आम जनता की सहूलियत के लिए शुरू की गईं, ताकि टिकट के लिए लंबी लाइने न लगें। लोग फ्रस्टेट न हों। कई बार लाइन इतनी लंबी होती है कि लोग बेटिकट यात्रा को मुफीद समझते हैं। खिड़की के पीछे बैठा मुालाजेिम भी काम के दबाव  से बेहद तनाव में होता है और रूखा व्यवहार करता है। लोग इसको सीधा कामचोरी समझते हैं।

असल में एशिया का दूसरा सबसे बड़ा और दुनिया का चौथा बड़ा रेल नेटवर्क कर्मचारियों की भीषण कमी से जूझ रहा है। इसकी वजह से 2 करोड़ 30 लाख प्रतिदिन यात्रा करने वालों की जान जोख़िम रहती है। करीब ढाई लाख पद रेलवे में रिक्त चल रहे हैं। यात्रियों की संख्या बढ़ रही है लेकिन रेल में मुलाजिमों की संख्या दिनों दिन घट रही है। हर माह करीब 300 लोग सेवा निवृत्त हो रहे हैं। 16 हजार लोको पायलटों की कमी है। संसदीय समिति ने भी रेल मंत्री सुरेश प्रभु के सामने रेलवे में यात्रियों की सुरक्षा के साथ हो रहे खिलवाड़ को लेकर पिछले साल दिसंबर में नाराजगी जताई थी। रेल सुरक्षा से जुड़े करीब 1 लाख 25 हजार पद जिनमें गैंगमैन, पॉइंटमैन, पैट्रोलमैन, तकनीशियन और स्टेशन मास्टरों के खाली चल रहे हैं। 2016 में रेल के पटरी से उतरने की 67 घटनाएं हुईं जबकि 2015 में 52 बार रेल बेपटरी हुई।
रेल किराए में कई बार कई तरह की बढ़ोत्तरी हुई है। टिकट रद्द कराने से लेकर प्लेटफॉर्म टिकट तक के दाम बढ़ाए गए हैं लेकिन ट्रेनों की लेट लतीफी के आलम बरकरार है। कई रेल परियोजनाएं मंद गति से चलती हुई दम तोड़ रहीं हैं। रेल मंत्रालय का कहना है कि हमारे पास फंड नहीं है। पिछले साल रेल मंत्री ने 1 लाख 2 हजार करोड़ रुपए की मांग वित्त मंत्रालय से की थी जिसे वित्त मंत्री अरुण जेटली ने नकार दिया था। अब रेल मंत्री सुरक्षा को पुख़्ता करने के लिए टिकट पर उपकर लगाने की योजना बना रहे हैं।
भारत में सबसे पहले रेल 1853 में दौड़ी थी, जबकि चीन में इसके 23 साल बाद यानी 1876 में। जब भारत आजाद हुआ तो भारत में रेल नेटवर्क की कुल लंबाई 53,596 किमी थी, जबकि चीन का रेल नेटवर्क सिर्फ 27,000 किमी ही था। लेकिन चीन आज भारत से काफी आगे निकल गया है। दुनिया की सबसे तेज़ रफ्तार से चलने वाली रेलगाड़ी शंघाई मागलेव चीन की है जिसकी रफ़्तार 501 किलोमीटर प्रति घंटा है। औसतन यह रेलगाड़ी 299 किलोमीटर प्रति घंटा तो दौड़ती ही है। हालांकि यह रेल बिना पहियों की है जोकि चुंबकीय ट्रैक पर रपटती है। दूसरी तेज़ रेलगाड़ी भी चीन में ही चलती है। इसका नाम हार्मनी सीआरएच 380 ए है, जोकि बीजिंग से शंघाई के बीच चलती है। इसकी औसतन रफ्तार 275 किलोमीटर है। चीन ने अपनी ट्रेनों को 500 किलो मीटर प्रति घंटे की रफ्तार से भी दौड़ाया है।
वहीं भारत ने अपनी सबसे तेज़ ट्रेन गतिमान एक्सप्रेस को 160 किलो मीटर प्रति घंटे की रफ्तार से दौड़ाया है। वहीं दूसरी सबसे तेज़ ट्रेन भोपाल शताब्दी है जोकि 150 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार से दौड़ी है लेकिन औसतन 91 किलोमीटर प्रति घंटे की तेजी से चलती है। फिलहाल भारतीय रेल गाड़ियों को 200 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार से चलाने की योजना पर काम कर रहा है। 
इसबीच ताज़ा समाचार मिलने तक उत्तर प्रदेश के मुजफ्फरनगर के खतौली में कलिंग-उत्कल एक्सप्रेस  हादसे  हादसे में अबतक 24 लोगों की मौत की पुष्टि हो चुकी है, जबकि 150 से ज्यादा जख्मी हैं।  इस हादसे के पीछे भी एक ही बजह जान पड़ती है वो है पर्याप्त कर्मचारियों का न होना। ग्राहक ज़्यादा हैं तो स्टाफ भी रखना पड़ेगा।

 

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