भारतीय ग्रामीण समाज : सम्पूर्ण क्रांति से संचार क्रांति के दौर तक

Posted by Ashish Bhardwaj
August 14, 2017

Self-Published

भारत गांवों का देश” प्राथमिक और माध्यमिक कक्षाओं के बहुत सारे निबंध इसी पंक्ति से शुरू होती थी| औरों का नहीं पता लेकिन इस एक पंक्ति ने मेरे विद्यार्थी जीवन में एक बहुत बड़ी भूमिका अदा की थी; कहने से तात्पर्य यह हैं कि इस पंक्ति से शुरू हुए निबंधो ने मुझे कुछ अच्छे अंक और शिक्षकों की शाबाशी बड़े ठाठ से दिलाई|
दूसरी पंक्ति यह थी कि “भारत की आत्मा गाँव में बसती हैं”| एक बहुत बड़ा वर्ग, जिसमें मैं भी शामिल हूँ यह मानता हैं कि शरीर अपना आकार रूप आदि में परिवर्तन करती हैं परन्तु आत्मा का स्वरुप सदैव एक समान रहता हैं यह नश्वर हैं| तो क्या यही बातें हमारे देश के सन्दर्भ में भी कही जा सकती हैं| बदलते युग के के साथ हमारे देश के स्वरुप में आमूल-चुल परिवर्तन आया हैं; जिसे नंगी आँखों से स्पष्ट रूप से महसूस किया जा सकता हैं| देश के इस स्वरुप परिवर्तन में गांवों में आए बदलाव ने सबसे महत्वपुर्ण भूमिका निभाई हैं| बदलते समय और नित् नए आ रहे तकनीकों ने गांवों को भी उसी प्रकार से चकाचौंध किया हैं जैसे शहरों को|
आज़ादी के बाद देश में दो क्रांतियाँ हुई- पहली क्रांति का नाम था “सम्पुर्ण क्रांति” जिसने गांवों झकझोरा, ग्रामवासियों को देश की मुख्यधारा से जुड़ने के लिए प्रेरित किया और दूसरी क्रांति आई “सुचना क्रांति” के रूप में, जिसने गांवों को मुख्यधारा से बहुत हद तक जोड़ दिया| शहर और गाँव के फासलों को कम किया और इस कम हुए फासलों ने लोगों का प्रशासन तक और प्रशासन का लोग तक पहुँच आसन किया| सरकार ने सुचना क्रांति के फायदों को देखते हुए इसे जन-जन तक पहुँचाने के लिए ‘डिजिटल इंडिया’ और इस तरह के कई योजनाओं की शुरुआत की| बैंकों और वित्तीय संस्थानों तक ग्रामीणों के आसान पहुँच और सरकार की कुछ नीतियों ने गांवों में भी अवसर पैदा करना शुरू किया; जिससे ग्रामीणों के आर्थिक स्तिथी में बदलाव आने की एक शुरुआत जरुर हुई है| हालांकि इसे एक लम्बा सफ़र तय करना हैं|
फिर भी एक ग्रामीण होने के नाते गांवों में आ रहे इन बदलावों को मैंने महसूस किया हैं| अगर मैं अपने ही गाँव का उदहारण लूँ (कुशमाहा, झारखण्ड के देवघर जिला मुख्यालय से 18 किलोमीटर की दुरी पर अवस्तिथ) तो पिछले दस से पंद्रह वर्ष के दौरान आर्थिक स्तिथी में एक उल्लेखनीय परिवर्तन आई हैं| गाँव के अलग्भाग ज्यादातर परिवार पूरी तरह से संपन्न ना सही पर अपनी मुलभुत आवश्यकताओं को पूरा करने में सक्षम जरुर हो गाय हैं और इसके साथ दैनिक मनोरंजन के साधनों और सुचना तकनीक का भी उपयोग नवयुवाओं द्वारा आत्मसात किया गया हैं| मेरे गाँव में सड़क, बिजली, पानी, स्वास्थ्य, शिक्षा और नज़दीकी शहर तक यातायात की उत्तम व्यवस्था के आधार पर एक विकसित ग्राम कहना अनुचित नहीं होगा| इस तरह गांवों में अब विकास की शुरुआत या यों कहे नीवं तो रखी जा चुकी हैं| यह आज के दौर की बेहतरीन उपलब्धि हैं|
इस तरह से देश का कुपोषित शरीर शनैः शनैः पोषित होने लगा हैं; कहने अक आशय हैं कि शरीर के स्वरुप में संरचनात्मक परिवर्तन आने लगा हैं| अब अगर शरीर से थोड़ा आगे बढ़ते हुए बात करे तो उस आत्मा की भी बात कर ली जाए जो इन्ही गांवों में बसती हैं| तो क्या आत्मा में भी बदलाव आई हैं और अगर कोई बदलाव आया हैं तो यह सकारात्मक बदलाव हैं या नकारात्मक| यह एक बहस का मुद्दा है और प्रत्येक व्यक्ति की इस पर अपनी राय हो सकती हैं|
जहाँ एक तरफ सम्पूर्ण क्रांति ने पुरे देश को एक साथ एक मंच पर लाने में अति सक्रिय भूमिका अदा की थी वहीँ सुचना या संचार क्रांति ने भूगोल के सिद्धांतों को दरकिनार हुए देश दुनिया को एक मंच पर ला खड़ा किया और इसका फायदा गांवों तक भी पहुंचा| दूर दराज के गाँव जो अपनी भोगौलिक स्तिथियों के कारण पीछे छुट जाते थे, को उसी पंक्ति में ला खड़ा किया जिसमे बाकी दुनिया लगी हुई थी| सुचना क्रांति के बाद ग्रामीण लोगों के जीवन में जो बदलाव आया उसी बदलाव ने गांवों के सामाजिक, पारिवारिक और सांस्कृतिक ताने-बाने में भी एक बदलाव आया हैं|
गाँव के बुजुर्ग और हमसे दो पीढ़िया ऊपर, के मन में अक्सर ये भाव रहता हैं कि जो सामाजिक ताना-बाना गाँव में मौजुद था उसको आज जबरदस्त आघात पहुंचा हैं| उनके विचार से, आज का समाज भले ही प्रगतिशील हैं लेकिन ‘समाज’ शब्द अपने वास्तविक अर्थ को पुष्ट करने में थोड़ा कमजोर पड़ने लगा हैं| गाँव की ये एक खास बात थी कि किसी गाँव के उत्सव, मेले या फिर सामाजिक कर्म-कांडों जैसे शादी-विवाह या फिर किसी व्यक्ति के निधन पर होने वाले श्राध्द पर आस-पास के कई गांवों के व्यक्तियों का हुजूम उमड़ पड़ता था| लोगों अक एक दुसरे से मिलना जुलना होता था| आस-पास और दूर-दराज़ में घटने वाली घटनाओं की जानकारियां ऐसे ही यहाँ के लोगों से वहां के लोगों की मिलती थी| ये समारोह या कार्यक्रम एक दुसरे के साथ अपने आप को जोड़ कर ग्रामीण समाज के जड़ को मजबूत करता था| लोगों के पास एक-दुसरे के लिए वक्त होता था जो सामज की संरचना के ताने-बाने को दुसरे से जोड़े रखता था उन्हें मजबूत करता था| ये सामाजिक सौहाद्र और भाईचारे के जड़ को भी सिंचता था| राजनीती पर चर्चा होती थी; बदलते और उभरते राजनितिक और प्रशासनिक व्यवस्था पर लोगों को एक दुसरे का विचार और दृष्टिकोण समझते और समझाते थे| लोग एक दुसरे के सामने अपनी राय रखते थे और यह सब बिल्कुल एक जगह होता था, गाँव-देहात में होने वाले उत्सव या समागम इनके मंच बनते थे| यह लोगों में, खासकर युवकों में अपने से वरिष्ठों के विचार और उनके ज्ञान को जानने का एक अवसर होता था| यह लोगों के दिल में सामाजिकता पैदा करता था और इनकी वजह से लोग कुछ भी गलत करने से पहले सौ दफ़ा सोचते थे, क्योंकि एक साधारण व्यक्ति की भी एक पुरे इलाके में एक खास पहचान होती थी|
आज की बदलती दुनिया ने लोगो के बीच एक अंतर पैदा किया हैं| लोगों की एक-दुसरे के प्रति जिम्मेदारी में कमी आई हैं| लोग अब सामाजिक होने के बदले कुछ और होते जा रहे हैं जिन्हें परिभाषित करने के लिए मेरे पास तत्काल कोई उचित शब्द उपलब्ध नहीं हैं| हालाँकि इन बदलावों के प्रति सभी के मन में एक समान विचार नहीं हैं| कोई इसे एक सकरात्मक और सराहनीय परिवर्तन बताता हैं कोई इसे सुव्यवस्थित सामाजिक संरचना पर आघात|
अतः यह लोगों को ही तय करना हैं कि क्रांतियों से उत्पन्न होने वाले प्रभावों से वे अपने जीवन को कितनी हद तक प्रभावित होने देते हैं| इन तकनीकों के सकारात्मक उपयोग कर अपनी जीवन को तरक्की और अग्रसर रखते हुए इनके होने वाले नुकसानों से अपनी तरक्की और अपने जीवन और उसके मूल्यों को कितनी हद तक बचाए रख सकते हैं| हमारे बुजुर्गों की चिंता व्यर्थ नहीं लेकिन इस कारण से तकनीक से खुद को दूर बनाए रखने का विचार भी पूरी तरह से असंगत हैं|
अंत में, सब कुछ फिर से मनुष्य के विवेक पर आ निर्भर होता हैं|

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