भारतीय युवाः उम्र का एक दौर और अंतरमन के घरौंदे

Posted by Rishabh Kumar Mishra
August 31, 2017

Self-Published

भारत की युवा जनसंख्या इसकी एक महत्वपूर्ण विशेषता है। इन युवाओं को ऐसी मानव-पूंजी माना जाता है जिनकी उत्पादकता आर्थिक-सामाजिक-सांस्कृतिक बदलावों की संभावना रखती है। गौरतलब है कि यह युवा आबादी रोबोट की तरह मशीन न होकर मानव नाम की एक जीव जाति की सदस्य है जिसके पास मस्तिष्क के साथ हृदय भी है। संज्ञान के साथ संवेग भी है। इन विशेषताओं के कारण ये किसी पहले से तैयार प्रोग्राम द्वारा नहीं चलाए जा सकते हैं न ही इनके बारे में निश्चय के साथ कोई भविष्य कथन किया जा सकता है। मनोविश्लेषणवाद की शब्दावली से उधार लेकर कहूं तो इनके जितने व्यवहार और कर्म होते हैं, उससे कई गुना मनोभाव और विचार अप्रकट रह जाते हैं। अंतरमन के ये घरौंदे युवावास्था की उस गिरह को सुलझाने का माध्यम है जो हममें से अधिकांश का भोगा हुआ यथार्थ है। इस यथार्थ की टीस और मिठास ही हमारा ‘मैं‘ बनती है जिससे हम पीछा नहीं छुड़ा सकते हैं। हां यह जरूर है कि एक सामाजिक प्राणी होने के कारण तालमेल और गठजोड़ बनाने की आदत से हम यह सीख जाते हैं कि इस ‘मैं‘ में से कब? कितना दिखाना है? और कितना छुपाना है? फुर्सत के क्षण में अंतरमन के घरौंदों की यात्रा हमारे अपने इतिहास की कई देखी-अनदेखी, सुलझी-अनसुलझी परतों को उघाड़ती है।

भारतीय परिवार में व्यक्ति माता-पिता, रिश्तेदार और भाई-बहनों के बीच भावानात्मक लगाव के साथ बढ़ा होता है। यह लगाव कभी कमजोर नहीं होता है। लेकिन समय के साथ जब इसमें नये संबंध और रिश्ते पैदा होते हैं तो न जाने क्यों हम रिश्तों के घरौंदे को लेकर आवश्यकता से अधिक असुरक्षित महसूस करने लगते हैं। खासकर प्रेमसंबंधों के संदर्भ में देखें तो इसे एक दूसरे के लगाव-क्षेत्र में आक्रमण माना जाता है। संस्कार, पंरपरा और मूल्यांे की दुहाई देकर हम इस सुरक्षित घेरे की कोरी कल्पना को बाह्य आक्रमण से बचाने की कोशिश करते रहते हैं। इस ऊहापोह का एक तार संस्कार में बसता है तो दूसरा युवा हृदय के जोश और प्रेम की मिठास में फंसता है। इस बीच में युवा त्रिशंकु की तरह फंसा रहता है। शनैः-शनैः वह मानने लगता है कि एक को मनाने का अर्थ दूसरे को नाराज करना है। एक के साथ जीने का फैसला दूसरे को छोड़ना है। ऐसे विश्वास के कारण वह उन रास्तों पर चलने का साहस नहीं कर पाता है जो उसे, उसके ‘मैं‘ से परिचित करा सकते हैं।

हमारे समाज में सुरक्षित और शानदार भविष्य की तलाश में गांव और छोटे कस्बों से महानगर और महानगरों से विदेशोें में प्रवास करने की प्रेरणा बचपन से दी जाती है। उम्र के साथ स्वतंत्र और स्वायत्त जीवन जीने की प्रक्रिया में यह सीखाया जाता है कि बाहर की दुनिया में टिके रहना एक कठिन और बड़ी चुनौती है। पढ़ाई और नौकरी इस तरह की चुनौती के उदाहरण मात्र है। जब युवा इस नयी दुनिया का हिस्सा बनने लगते हैं या बन चुके होते हैं तो हम मान लेते हैं कि समय के साथ ‘पुरानी दुनिया‘ धूमिल हो चुकी है। जबकि यह ‘पुरानी दुनिया‘ अचेतन में जाग्रत रहती है और ‘मैं‘ के साथ ‘हम‘ वाले पक्ष का अस्तित्व बनाए रखती है। यह हमारी निर्माण प्रक्रिया के बारे में हमें सजग रखती है। यह भी उल्लेखनीय है कि इस नई दुनिया की चुनौतियों में बीच मुक्ति की छटापटाहट उसे पुरानी दुनिया की ओर ले जाती है। बार-बार जह़न में यही सवाल आता है कि हम क्या कर रहे हैं? क्यों कर रहे हैं? किसके लिए कर रहे हैं? इन सवालांे को आध्यात्मिक या दार्शनिक कहना समस्या भी है और समाधान भी। समस्या इसलिए कहीं समाधान ढँ़ूढ़ने के चक्कर में समाधान का स्रोत बाहर खोजने पर किसी दूसरे पर निर्भर न होना पड़ जाए। समाधान इसलिए कि ये सवाल हमारे मुक्ति का रास्ता बन सकते है। ‘मुक्ति‘ किससे? जो बाहर की दुनिया की भागदौड़ है, सफल होने की भूख है, अहं का व्यर्थ आडंबर है, उससे मुक्त होकर उसी प्राकृतिक मनुष्य का हृदय और मस्तिष्क बन जाने की चाह जो समाजीकरण के चिह्नांे से रहित हो। आप पाएंगें कि प्रेम, घृणा, ईष्र्या, भय जैसे संवेग जिन सामाजिक पात्रों और घटनाओं के माध्यम से उमड़-घुमड़ कर हमारे अंदर की घुटन को बनाए रखते हैं उनका मूल हमारी समाजीकरण की ही प्रक्रिया तो है। हमें ऐसा मानना सीखा दिया जाता है कि अच्छा होना अच्छा होता है और बुरा होना बुरा होता है। यह अच्छाई और बुराई हमारी विचार प्रक्रिया की खिड़की बन जाते हैं। सोचने की आदत ऐसी पड़ जाती है कि हमारा व्यवहार, कर्म और निर्णय अच्छा बनने के लक्ष्य से प्रेरित होता है और बुरा बनने की हर संभावना से दूर-दूर तक वास्ता नहीं रखता। ‘अच्छे‘ बने रहने का लक्ष्य कई बार समझौते करने को मजबूर करता है, शोषण को स्वीकृति देता है, शाॅर्टकर्ट अपनाने को प्रेरित करता है। इस तरह की प्रवृत्तियों से उपलब्धि तो मिल सकती है लेकिन अंतरमन को शांति ठहराव नहीं!

पुरातन और आधुनिकता का टकराव इस दौर में सबसे मुखर होता है। जैसे-जैसे संस्कृति, सामाजिक-आर्थिक और प्रौद्योगिकीय बदलाव के साथ नए-नए रूपों और व्यवहारों को अपनाया है वैसे-वैसे परंपराओं को टूटने का भय बढ़ा है। यह कहना कि आधुनिकता के प्रवेश के लिए परंपरा का टूटना अनिवार्य है न तो आधुनिकता के सही अर्थ को साकार करना है और न ही परंपरा के सार को बनाए रखना। आज के युवा इसी संघर्ष से गुजर रहे हैं। औपचारिक शिक्षा और कार्यस्थल ऐसी दुनिया हैं जो आकर्षक हैं जिसे जीने और अपनाने के तौर-तरीके आप सीख रहे हैं लेकिन गांव और कस्बा बार-बार बातचीत और खान-पान में आकर खड़ा हो जाता है। प्रतिस्पर्धा, गति, सदा आगे रहने की भावना सबकुछ रेडीमेड चाहती है जबकि इस भागमभाग में सृजन सुख से वंचित होना और इसके अवसरों को खोना आलोचक और निंदक बनाता जा रहा है। बचपन के टिंकू, रामू और निम्मो को जो आदर्श घोंट-घोंट कर पिलाए गए थे, वे जिंदा रहते हैं और जिन तर्कों को ज्ञान और बौद्धिकता के नाम पर हमने अपनाए है, हर बार उसके बरक्स खड़े हो जाते हैं।

भारतीय युवाओं के अंतरमन में एक नायक/नायिका बनने की चाहत हैं। उन्हें बचपन से ही इस नायकत्व का स्वप्न दिखाया जाता है। कई बार यही स्वप्न बोझ बन जाता है। जीवन की भूलभूलैया में भारतीय युवा इतने अंतरद्वन्दों से गुजरता है कि क्या करें?क्या न करें? इस दुविधा में उसका नायकत्व डगमगाने लगता है। वे सब कुछ पाना चाहते हैं लेकिन पाने की कीमत पर कुछ भी छोड़ना नहीं चाहता है। एक सवाल जिससे हम भारतीय कतराते हैं वह है कि हम जो पाना चाहते हैं, क्या वह हमारे अंतरमन की उपज है या केवल बाह्य आकर्षण। इसे एक उदाहरण द्वारा समझ सकते हैं। जिस रोजगार के द्वारा आप अपने नायकत्व को सिद्ध करने के लिए लालायित रहते हैं वह आपकी रूचि और अभिवृत्ति से संबंधित है या केवल लोगों के बीच सम्मानित है इसलिए आप रोजगार के माध्यम से सम्मान पाने के लिए अपने अंतरमन की आवाज को अनसुना कर रहे हैं। यह अनसुनी आवाज किसी न किसी रूप में हमारे भीतर गूंजती रहती है। ऐसी न जानी कितनी आवाजों को घोंटकर हम क्रमशः युवा, प्रौढ़ और वृद्ध बनने के रास्ते पर बढ़ रहे हैं। शायद एकल संस्कृति से बहु संस्कृति और परंपरा से आधुनिकता की ओर प्रस्थान; मानने के साथ तर्क, निर्भरता के साथ स्वायत्तता जैसे बदलावों को अपनाना उम्र के इस दौर की ताजगी को बनाए रखे।

भारत की युवा जनसंख्या इसकी एक महत्वपूर्ण विशेषता है। इन युवाओं को ऐसी मानव-पूंजी माना जाता है जिनकी उत्पादकता आर्थिक-सामाजिक-सांस्कृतिक बदलावों की संभावना रखती है। गौरतलब है कि यह युवा आबादी रोबोट की तरह मशीन न होकर मानव नाम की एक जीव जाति की सदस्य है जिसके पास मस्तिष्क के साथ हृदय भी है। संज्ञान के साथ संवेग भी है। इन विशेषताओं के कारण ये किसी पहले से तैयार प्रोग्राम द्वारा नहीं चलाए जा सकते हैं न ही इनके बारे में निश्चय के साथ कोई भविष्य कथन किया जा सकता है। मनोविश्लेषणवाद की शब्दावली से उधार लेकर कहूं तो इनके जितने व्यवहार और कर्म होते हैं, उससे कई गुना मनोभाव और विचार अप्रकट रह जाते हैं। अंतरमन के ये घरौंदे युवावास्था की उस गिरह को सुलझाने का माध्यम है जो हममें से अधिकांश का भोगा हुआ यथार्थ है। इस यथार्थ की टीस और मिठास ही हमारा ‘मैं‘ बनती है जिससे हम पीछा नहीं छुड़ा सकते हैं। हां यह जरूर है कि एक सामाजिक प्राणी होने के कारण तालमेल और गठजोड़ बनाने की आदत से हम यह सीख जाते हैं कि इस ‘मैं‘ में से कब? कितना दिखाना है? और कितना छुपाना है? फुर्सत के क्षण में अंतरमन के घरौंदों की यात्रा हमारे अपने इतिहास की कई देखी-अनदेखी, सुलझी-अनसुलझी परतों को उघाड़ती है।

भारतीय परिवार में व्यक्ति माता-पिता, रिश्तेदार और भाई-बहनों के बीच भावानात्मक लगाव के साथ बढ़ा होता है। यह लगाव कभी कमजोर नहीं होता है। लेकिन समय के साथ जब इसमें नये संबंध और रिश्ते पैदा होते हैं तो न जाने क्यों हम रिश्तों के घरौंदे को लेकर आवश्यकता से अधिक असुरक्षित महसूस करने लगते हैं। खासकर प्रेमसंबंधों के संदर्भ में देखें तो इसे एक दूसरे के लगाव-क्षेत्र में आक्रमण माना जाता है। संस्कार, पंरपरा और मूल्यांे की दुहाई देकर हम इस सुरक्षित घेरे की कोरी कल्पना को बाह्य आक्रमण से बचाने की कोशिश करते रहते हैं। इस ऊहापोह का एक तार संस्कार में बसता है तो दूसरा युवा हृदय के जोश और प्रेम की मिठास में फंसता है। इस बीच में युवा त्रिशंकु की तरह फंसा रहता है। शनैः-शनैः वह मानने लगता है कि एक को मनाने का अर्थ दूसरे को नाराज करना है। एक के साथ जीने का फैसला दूसरे को छोड़ना है। ऐसे विश्वास के कारण वह उन रास्तों पर चलने का साहस नहीं कर पाता है जो उसे, उसके ‘मैं‘ से परिचित करा सकते हैं।

हमारे समाज में सुरक्षित और शानदार भविष्य की तलाश में गांव और छोटे कस्बों से महानगर और महानगरों से विदेशोें में प्रवास करने की प्रेरणा बचपन से दी जाती है। उम्र के साथ स्वतंत्र और स्वायत्त जीवन जीने की प्रक्रिया में यह सीखाया जाता है कि बाहर की दुनिया में टिके रहना एक कठिन और बड़ी चुनौती है। पढ़ाई और नौकरी इस तरह की चुनौती के उदाहरण मात्र है। जब युवा इस नयी दुनिया का हिस्सा बनने लगते हैं या बन चुके होते हैं तो हम मान लेते हैं कि समय के साथ ‘पुरानी दुनिया‘ धूमिल हो चुकी है। जबकि यह ‘पुरानी दुनिया‘ अचेतन में जाग्रत रहती है और ‘मैं‘ के साथ ‘हम‘ वाले पक्ष का अस्तित्व बनाए रखती है। यह हमारी निर्माण प्रक्रिया के बारे में हमें सजग रखती है। यह भी उल्लेखनीय है कि इस नई दुनिया की चुनौतियों में बीच मुक्ति की छटापटाहट उसे पुरानी दुनिया की ओर ले जाती है। बार-बार जह़न में यही सवाल आता है कि हम क्या कर रहे हैं? क्यों कर रहे हैं? किसके लिए कर रहे हैं? इन सवालांे को आध्यात्मिक या दार्शनिक कहना समस्या भी है और समाधान भी। समस्या इसलिए कहीं समाधान ढँ़ूढ़ने के चक्कर में समाधान का स्रोत बाहर खोजने पर किसी दूसरे पर निर्भर न होना पड़ जाए। समाधान इसलिए कि ये सवाल हमारे मुक्ति का रास्ता बन सकते है। ‘मुक्ति‘ किससे? जो बाहर की दुनिया की भागदौड़ है, सफल होने की भूख है, अहं का व्यर्थ आडंबर है, उससे मुक्त होकर उसी प्राकृतिक मनुष्य का हृदय और मस्तिष्क बन जाने की चाह जो समाजीकरण के चिह्नांे से रहित हो। आप पाएंगें कि प्रेम, घृणा, ईष्र्या, भय जैसे संवेग जिन सामाजिक पात्रों और घटनाओं के माध्यम से उमड़-घुमड़ कर हमारे अंदर की घुटन को बनाए रखते हैं उनका मूल हमारी समाजीकरण की ही प्रक्रिया तो है। हमें ऐसा मानना सीखा दिया जाता है कि अच्छा होना अच्छा होता है और बुरा होना बुरा होता है। यह अच्छाई और बुराई हमारी विचार प्रक्रिया की खिड़की बन जाते हैं। सोचने की आदत ऐसी पड़ जाती है कि हमारा व्यवहार, कर्म और निर्णय अच्छा बनने के लक्ष्य से प्रेरित होता है और बुरा बनने की हर संभावना से दूर-दूर तक वास्ता नहीं रखता। ‘अच्छे‘ बने रहने का लक्ष्य कई बार समझौते करने को मजबूर करता है, शोषण को स्वीकृति देता है, शाॅर्टकर्ट अपनाने को प्रेरित करता है। इस तरह की प्रवृत्तियों से उपलब्धि तो मिल सकती है लेकिन अंतरमन को शांति ठहराव नहीं!

पुरातन और आधुनिकता का टकराव इस दौर में सबसे मुखर होता है। जैसे-जैसे संस्कृति, सामाजिक-आर्थिक और प्रौद्योगिकीय बदलाव के साथ नए-नए रूपों और व्यवहारों को अपनाया है वैसे-वैसे परंपराओं को टूटने का भय बढ़ा है। यह कहना कि आधुनिकता के प्रवेश के लिए परंपरा का टूटना अनिवार्य है न तो आधुनिकता के सही अर्थ को साकार करना है और न ही परंपरा के सार को बनाए रखना। आज के युवा इसी संघर्ष से गुजर रहे हैं। औपचारिक शिक्षा और कार्यस्थल ऐसी दुनिया हैं जो आकर्षक हैं जिसे जीने और अपनाने के तौर-तरीके आप सीख रहे हैं लेकिन गांव और कस्बा बार-बार बातचीत और खान-पान में आकर खड़ा हो जाता है। प्रतिस्पर्धा, गति, सदा आगे रहने की भावना सबकुछ रेडीमेड चाहती है जबकि इस भागमभाग में सृजन सुख से वंचित होना और इसके अवसरों को खोना आलोचक और निंदक बनाता जा रहा है। बचपन के टिंकू, रामू और निम्मो को जो आदर्श घोंट-घोंट कर पिलाए गए थे, वे जिंदा रहते हैं और जिन तर्कों को ज्ञान और बौद्धिकता के नाम पर हमने अपनाए है, हर बार उसके बरक्स खड़े हो जाते हैं।

भारतीय युवाओं के अंतरमन में एक नायक/नायिका बनने की चाहत हैं। उन्हें बचपन से ही इस नायकत्व का स्वप्न दिखाया जाता है। कई बार यही स्वप्न बोझ बन जाता है। जीवन की भूलभूलैया में भारतीय युवा इतने अंतरद्वन्दों से गुजरता है कि क्या करें?क्या न करें? इस दुविधा में उसका नायकत्व डगमगाने लगता है। वे सब कुछ पाना चाहते हैं लेकिन पाने की कीमत पर कुछ भी छोड़ना नहीं चाहता है। एक सवाल जिससे हम भारतीय कतराते हैं वह है कि हम जो पाना चाहते हैं, क्या वह हमारे अंतरमन की उपज है या केवल बाह्य आकर्षण। इसे एक उदाहरण द्वारा समझ सकते हैं। जिस रोजगार के द्वारा आप अपने नायकत्व को सिद्ध करने के लिए लालायित रहते हैं वह आपकी रूचि और अभिवृत्ति से संबंधित है या केवल लोगों के बीच सम्मानित है इसलिए आप रोजगार के माध्यम से सम्मान पाने के लिए अपने अंतरमन की आवाज को अनसुना कर रहे हैं। यह अनसुनी आवाज किसी न किसी रूप में हमारे भीतर गूंजती रहती है। ऐसी न जानी कितनी आवाजों को घोंटकर हम क्रमशः युवा, प्रौढ़ और वृद्ध बनने के रास्ते पर बढ़ रहे हैं। शायद एकल संस्कृति से बहु संस्कृति और परंपरा से आधुनिकता की ओर प्रस्थान; मानने के साथ तर्क, निर्भरता के साथ स्वायत्तता जैसे बदलावों को अपनाना उम्र के इस दौर की ताजगी को बनाए रखे।

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