भारत का बंटवारा

Posted by Sandeep Anand kumar
August 27, 2017

Self-Published

भारत का बंटवारा

अंग्रेज भारत छोड़ कर जल्दी से जल्दी ब्रिटेन जाना चाहते थे। दितीय विश्व युद्ध के बाद सेना मैं हुआ विद्रोह और बढ़ता हुआ स्वतंत्रता आन्दोलन का दबाव अब उन्हें मजबूर कर चूका था की सत्ता का हस्तान्तर्ण कर वो वापस अपने देश चले जाये।

भारत में भी समस्याए इतनी बढ़ गयी थी की अब वो इसका समाधान कर अपना पैसा और समय नहीं बर्बाद करना चाहते थे ! यहाँ अब सिर्फ गरीबी, भुखमरी और बिमारिया बची थी बाकि सारा भारत तो वो लगभग दो सो सालो में लूट ही चुके थे।

जाते समय भी वह ऐसे बीज बों कर जाना चाहते थे की भारत उस बीज से उपजे साम्प्रदायिकता और दुश्मनी की फसल को आने वाले भविष्य में काटते रहे और ऐसा ही हुआ है।

अगर एक परिवार का भी अगर बंटवारा हो तो घर के बड़े तय करते है की क्या होगा, क्या नहीं और कितना समय लगेगा यानि एक बटवारे को स्थिर करना और उसमे समन्वय लाने में वर्षो का समय लगता  है।
सामान्य व्यक्ति भी इस बारे में यही राय रखता हैं।

भारत की निति थी की जब भी आजादी मिले तो एक अखंड भारत के रूप में मिले और हम उसका नव निर्माण करे,लेकिन अंग्रेजी हुकूमत और राजनीतिक महत्वकांक्षी लोगो की वजह से हम पर बंटवारा थोप दिया गया और खीच दी एक लकीर जिसके एक और भारतवर्ष और उसके दुसरे और पाकिस्तान खड़ा हो गया।

बंटवारे का दर्द वो ही समझ सकता है जिसने बंटवारा झेला हो या देखा हो। विस्थापन के दौरान जिस तरह मानवता को ताक पर रख दिया गया, हर तरह के जवान-वृद्ध,ओरत-मर्द,मासूम बच्चे सब पर विभाजन कहर बन कर टूट पड़ा. कभी अपने हुआ करते थे जो लोग एक रात मे पराये हो गए, जिन लोगो ने हर दिन,वार,त्यौहार,सुख,दुःख, साथ रहकर बिताया हो अब कभी ना मिलने के लिए बिछड गऐ।

इस बंटवारे मे हजारो लोग एक दुसरे के खून के प्यासे हो गए, लाखो को जान माल और हकुक का नुकसान उठाना पड़ा, मरने वालो की निश्चित तादात का आज भी कोई तय नहीं कर पाया है, हा अगर सरकारी आंकड़ो को आप चाहे तो मान सकते है जो की लाखो में हैं।
उस बंटवारे के दर्द को बयां करने की ताक़त शायद किसी कलम में नहीं, इस इतिहासिक घटना को लिखने वाली कलम भी एक बार कांपी होगी।
सिर्फ दो महीनो में बंटवारे को अंजाम देने की कोशिश की गयी जो की एक खोफनाक मंजर में तब्दील हो गयी लाखो लाशो के ढेर पर आजादी की कहानी लिखी गयी। इस तरह के हालत जो की बेकाबू हो चुके थे वो अब काबू में लाना न अंग्रेजो की इच्छा शक्ति थी और  न ही भविष्य के उन नेताओ के बस में जो अपने देश के भाग्य विधाता बनने जा रहे थे।

विश्व इतिहास में इस तरह का विस्थापन संग्राम शायद ही हुआ हो और इतने लोगो को अपनी जान गवानी पड़ी।गाँव का नाम बदल गया,शहर का नाम बदल गया, देश का नाम बदल गया, जो अपने भाई और मित्र थे वो शत्रु हो गए, पूर्व और पश्चिम दोनों तरफ दुश्मन बन गए और सारे अपने पराये हो गए।
जो भारतीय लोग चाहते थे की भारत का बंटवारा न हो उन्हें राजनितिक तोर पर दरकिनार कर देने की कोशिश की गयी, उन लाखो करोडो लोगो के २०० सालो से चले आ रहे बलिदानों को पल भर मे तिलांजलि दे दी गयी.१५-०८-१९४७ से नया इतिहास लिखने की कोशिश की गयी गई मगर उन्हें इतनी कामयाबी नहीं मिली जो वो चाहते थे पर सुभाष चन्द्र बोस की वीर गाथा को पूर्णत दफ़न कर दिया गया।

नए बने देश जो की पाकिस्तान के नाम से जाना जाने लगा था उसने तो इतिहास को सिर्फ मुहमद अली जिन्ना के इर्द गिर्द ही लिखा और जैसे १४-०८-१९४७ के दिन ही पाकिस्तान का जन्म हुआ हो उससे पहले उस जगह का कोई वजूद ही नहीं था।
जो राजनेतिक दल, क्रन्तिकारी, स्वतन्त्रता सेनानी आजादी के लिए लड़े वो पाकिस्तान, बांग्लादेश या भारत के लिए नहीं बल्कि अखंड भारत के लिए लडे और अपनी जान की सहादत दी थी।उस पाकिस्तानी इतिहास में किसी भारतीय मुसलमान का जिक्र भी नहीं चाहे वो मौलाना अब्दुल कलाम आजाद हो, अशफाकुल्ला खान, असफ अली [वकील भगत सिंह], सैफुद्दीन किचलू [रोलेट एक्ट], मक्बूर हुसैन [जिन्होंने दो देशो के प्रस्ताव का विरोध किया था] और न जाने कितने ऐसे हजारो स्वतंत्रता सेनानीयो को वहा के इतिहास से हमेशा के लिए मिटा दिया गया और लिख दिया गया एक नया पाकिस्तान।

जब मुस्लिम लीग वजूद में आई तो वो कतई नहीं चाहती थी की वो कांग्रेस का साथ दे और कांग्रेस भी कुछ इसी तरह नहीं चाहती थी की वो गरम दल के नेताओ का साथ दे वरना ये आजादी तो हमें कई पहले मिल चुकी होती, वैसे भी ‘भारत छोड़ो आन्दोलन’ ने तो कुछ समय बाद ही दम तोड़ दिया ।विश्व युद्ध की समाप्ति के कगार पे था आजादी तो हमें मिलनी ही थी, बस कुछ लोगो में होड़ लगी हुई थी की इस आजादी का श्रेय किसे मिले।

कभी एक छोटी जॉन कम्पनी के नाम से जाने वाली इस्ट इंडिया कम्पनी का पुरे भारत में अपना इतना बड़ा कारोबार कायम करना और पुरे तोर पर अपना आधिपत्य हासिल कर पाने के बारे में किसी ने कल्पना भी नहीं की होगी।

अपार संसाधनों से भरे भारत वर्ष का पूर्णत दोहन किया गया।हर उस सम्पति को अपना नाम दे दिया जो उनके साम्राज्य के लिए फायदेमंद था। बिखरे हुए भारतीय शासको और राजाओ की कमजोरी का फायदा उठाकर बलवान होते गए और उन्हें कमजोर करते गए।

इस तरह के दमन के खिलाफ अगर शुरुवात में ही विरोध और खदेड़ा जा सकता है परन्तु भारतीय राजाओ की गुलामपसंद मानसिकता और आपसी समन्वय न होने की वजह ही भारत को गुलामी में धकेलने की मुख्य वजह रही।

इस्ट इंडिया ने इससे आगे बढ़ते हुए अपनी सेनाओ का विस्तार शुरू किया और भारतीय लोगो को ही रोजगार के लालच में उस सेना में शामिल कर लिया गया जो की भारतीयों के दमन करने के लिए बनी थी। अब उन राजाओ में भी इतनी ताकत नहीं बची थी की वो उन ताकतों का अब मुकाबला कर पाए।

अत्याचार का आलम यह था कि बिना जुर्म किये ही लोगों को जेल में भर दिया गया छोटे से छोटे स्वर को भी दबा दिया गया और अनगिनत लोगों को नीरअपराध ही जेल में सालों बिताने पडे। उन स्वतंत्रता सेनानियों के साथ जेलो में जो सलूक हुआ उसका वर्णन करना काफी दर्दनाक है। कालापानी नाम की जेलों ने तो इंसानियत की सारी हदें पार कर दी थी।

आजादी की आवाज फिर भी दबाई नहीं जा सकी, आजादी की लड़ाई एक आन्दोलन थी, एक क्रांति थी वो किसी से दबाने से दबाने वाली नहीं थी ये तो अलग अलग तरह के विचार धारा के लोगो के द्वारा बुलंद की गई आवाज़ थी।

करोडो लोगो के अथक प्रयासों, लाखों क्रन्तिकारीयो की शहादत पर और हजारो क्रन्तिकारीयो ने अपने जीवन को इस भारत भूमि की आजादी के लिए न्योछावर कर दिया, कइयो ने अपनी पुरी जवानी आजादी का सूरज देखने की प्रतिज्ञा में बंद काल कोठरी में गुजार दी।

नमन है उन मात्रभूमि के वीरो की जिन्होंने हमें आज आजादी में साँस ले पाने का अवसर दिया,ये उनका पुरुषार्थ ही था जो वो अन्ग्रेओ से अपनी मौत की परवाह किये बिना ही लादे और आने वाले भविष्य को आजाद हवाओ का आनंद दिया. ऐसे हजारो क्रन्तिकारी है जिनका नाम इतिहास के किसी भी पन्ने में दर्ज नहीं है और दर्ज है भी तो बेनाम ही रहा हैं ।

जो लोग इस त्रासदीपूर्ण शासन के द्वारा दमन किये गए, मार दिए गए, ओरतो को विधवा और बच्चो को अनाथ कर दिया गया. ब्रिटिश शासन का यह क्रूरतम कर्म उन्हें भविष्य में भी  माफ़ नहीं करेगा.
आजादी की रोशनी खुशनुमा होने की उम्मीदों पर भी ये अंग्रेज बंटवारा थोप गए और छोड़ गए अपने हालत पर झुझने के लिए. उसी बंटवारे की जड़े आज भी एक बड़े वृक्ष को हिलाने की कोशिश करती रही है, कोशिश अंदरूनी और बाहरी दोनों ओर  से की जाती है परन्तु अपार जनशक्ति की भावनाओ के आगे विफल हो जाती है।आजाद भारत ने शुरुआत में मुश्किल का सामना किया पर धीरे धीरे मुश्किल दूर होती गयी और भारत विकास के रस्ते पर चल पड़ा।

अगर आजाद भारत की सबसे बड़ी कामयाबी कुछ है तो वो है भारत का संविधान। संविधान ने भारत को प्रगति करने का सही रास्ता दिखाया, उसी रह पे चल कर ही आज जाती-पंथ-रंग को लेकर जो कट्टरता अंग्रेजो ने विरासत में दी थी उसको लगभग पटाने य ख़तम करने में भारतीय समाज कामयाब हुआ।
भारत आज सबसे बड़े लोकतान्त्रिक देश की श्रेणी में गिना जाता है, दबी कुचली और सामाजिक उपेक्षा झेलने वाली सारी बिरादरी के लोग आज मुख्य धारा के साथ जुड़ चुके है और वो भी अब समाज और देश को आगे बढाने में अपना बड़ा योगदान दे रहे है। संविधान हमारे भारत की सबसे बड़ी ताकत है।
भारत की आर्थिक, सामाजिक, वैचारिक और सामरिक सभी तरह से तरक्की हुई हैं।गुलामी के काल खंड से  निकलने के बाद भारत में शिक्षा और खेती पर जोर दिया गया जिससे सामाजिक अज्ञानता दूर हो सके और खेती से किसान आत्मनिर्भर बने और जनमानस सदृढ़ बने ।

भारत को विश्व् के मानचित्र पर अपना प्रभुत्व स्थापित करने में कई महापुरुषो ने अपने अपने समय में पुरुषार्थ किया और सफलता मिलती गयी।आज उन महापुरुषो के उस योगदान के कृतज्ञ है हम सभी भारतवासी है। सत् सत् नमन्
वंदे मातरम्।
संदीप पंचाल।

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