मासूम बना मसीहा….गरीब बच्चों का सन्देश।

Posted by naresh koshyari Koshyari
August 15, 2017

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हमेशा से इस माँ की ख्वाईश थी कि मेरे बन्दे इस धरती पर सलामत रहें। वो माँ थी हमारी भारत माँ, इस माँ ने अपने बच्चों को  क्या नहीं दिया। गंगा ,.यमुना जैसी पवित्र धाराओं का पानी ,वे सावन के बरसते मेघ, सुन्हरी आसायें , सुन्दर पर्यावरण और भी बहुत कुछ ।..इसलिए कि मेरे बन्दे सलामत रहें न कि एक छोटी सी बीमारी से सैकडृो मासूम अपनी माँ को खो दे ,और वो अपनी माँ को जान ही न सकें।

इस माँ का आदर्श, माँ का प्यारा एक छोटा सा बालक था नंदू , नंदू जब आठ साल का था, वह रोज सुबह जल्दी उठता धरती माँ को प्रणाम करता ,आदर्शवादी बनकर रहता , वह देशभक्ति की बातें करता और हमेशा खुश रहता पर जैसे ही भौर का अँधेरा खत्म होता वह सूरज की पहली किरन के साथ अपने काम पर चले जाता और उसका काम था भीख माँगना ।रोज की तरह वह लोगों से कुछ सिक्कों की दरकार करता और कोई आसानी से दे देता तो कोई परेशान कर के। नंदू धीरे-धीरे इस काम से उब चुका था सर पर जन्म देनी वाली माँ का साया नहीं और बाप को अपनी जिम्मेदारी की सुध नहीं ,पर इस लाचार हालत में भी नंदू खुद को हिम्मती समझता ।

अब नंदू 10 साल का हो गया था तभी अचानक एक दिन नंदू ने कुछ बच्चों को आपस में लड़ते हुये देखा नंदू तुरन्त उनके पास गया और उन्हें लड़ने से रोका , फिर पूछा कि तुम क्यों लड़ रहो हो तब एक बच्चे ने कहा कि कल मेरा भाई अस्पताल में  मर गया वह बिमार था और पापा ने कहाँ कि सरकार की लापरवाही की वजह से उसकी जान गई और मुझे पता है कि सरकार इस कमल के फूल वालों की है और ये कमल वाला झण्ड़ा पकड़ कर उसकी तारीफ कर रहा है इसलिए मैं लड़ रहा हूँ

ये सब सुन के नंदू बड़ा दुःखी हुआ और मन ही मन ये सोचने लगा कि मैं क्या कर सकता हूँ जिससे ये दिन दुबारा न देखना पड़े। और नंदू इस समस्या का हल ढूढ़ने निकल पड़ा साथ-साथ नंदू को एक ओर अपनी पढ़ाई की चिता भी उसे सता रही थी क्यूकि नंदू का सपना भी स्कूल जाने का था । नंदू ने हिम्मत जताई और वो सब से रोजाना पूछता कि क्या वो कुछ कर सकता है । फिर एक दिन नंदू की मुलाकात एक बंगाली बाबू से हुई ,नंदू ने उन्हें जब ये बात बताई तो वे काफी प्रभावित हुये और उन्होंने नंदू का साथ देने का निर्णय लिया। उन्होंने नंदू को शहर के उन तमाम बच्चों को एकत्र करने को कहा जो इस समस्या से जूज रहे थे। नंदू के जोश ने ये सब कर दिखाया और फिर  बंगाली बाबू  ने शहर से दूर एक स्कूल बनवाया और सभी बच्चों को अपने पास रखा ।

 

अब नंदू के दोनों सपने पूरे हो चुके थे।  और वह यहाँ से अपनी शिक्षा  पूरी कर चुका है और अब नंदू खुद उन तमाम गरीब बच्चों को शिक्षा दे रहा है जो उसे पाने के हकदार है।

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