मुंबई की आशा साहनी के मौत के पीछे का सच

Posted by Rachana Priyadarshini
August 10, 2017

Self-Published

पिछले दिनों मुंबई के लोखंडवाला इलाके के एक पॉश अपार्टमेंट में रहनेवाली व‍ृद्धा, आशा साहनी की मौत के बारे में जिसने भी जाना, वह सन्न रह गया। दिल दहला देनेवाली इस घटना के बारे में जिसने भी जाना, इसके लिए उसके बेटे ऋतुराज को कोसने लगा कि ‘कैसा निर्मोही बेटा है, जिसने साल भर से मां की सुध-बुध नहीं ली कि वह कहां है और कैसी है.’ जाने कितने लोगों ने ऐसे बेटों को कोसा होगा…उन्हें लानत भेजी होगी…कुछ हद तक यह सही भी है, पर कुछ हद तक शायद नहीं. दरअसल ऐसा कुछ भी करने से पहले हमें आशा साहनी या उन जैसे तमाम लोगों के जीवन के उस पहलू को समझना होगा, जिनकी मौत की खबरें यूं ही किसी गुमनाम अंधेरी कोठरी में हो जाती है और लोगों को हफ्तों-महीनों बाद उनके बारे में पता चलता है.

बीते बीस सालों से अमेरिका में रह रहा बेटा जब घर लौटा तो उसे उसकी मां नहीं, बल्कि उसका कंकाल मिला, जिसे देख कर बेटा चीख उठा. उसने खुद इस बात को स्वीकार किया कि अप्रैल 2016 में आखिरी बार उसकी अपनी मां से फोन पर बातचीत हुई थी. उस वक्त उसकी मां ने कहा था कि वह अब अकेले रहते हुए ऊब गयी है. या तो वह उन्हें अपने साथ ले जाये या फिर किसी वृद्धाश्रम में भेज दे. शायद उस वक्त ऋतुराज ने मां की इस बात को गंभीरता से लिया होता, तो आशा साहनी की मौत यूं अकेलेपन और गुमनामी में न हुई होती. कई सालों पहले ऐसी ही एक गुमनाम मौत की खबर अपने जमाने की मशहूर अदाकारा परवीन बॉबी की भी आयी थी. महीनों बंद पड़े जब उनके फ्लैट को खोला गया तब जाकर पता चला कि परवीन बॉबी तो कब की मर चुकी हैं. इसके अलावा भी न जाने ऐसी कितनी मौताें की खबर हम आये  दिन पढ़ते-सुनते या देखते रहते हैं, जिनकी कोई खोज-खबर लेने वाला नहीं.

दरअसल यह कहानी  एक अकेली आशा साहनी, परवीन बॉबी या ऐसे किसी अन्य की नहीं है, यह कहानी है इस समाज में टूटते-बिखरते उन रिश्तों की जिसमें संवेदनाएं मर चुकी हैं, स्नेहभाव खोखला हो चुका है और तो और इंसानियत भी कहीं दूर-दूर तक दिखायी नहीं दे रही.  बड़े शहरों के आलीशान मकानों में रहनेवाले लोगों के पास आज सारी सुख-सुविधाएं हैं. इसके बावजूद जीवन की अंतिम घड़ी  में जब उन्हें अपने अकेलेपन को बांटने के लिए किसी की जरूरत होती है, तो आस-पास कोई भी नजर नहीं आता. ऐसे में इंसान का अकेलापन उसे काट खाने को दौड़ता है. आशा साहनी के साथ भी यही हुआ. ऋतुराज, जो कि आशा साहनी के पहले पति का बेटा था, उनसे करीब बीस वर्षों से अलग अमेरिका में रह रहा था.

जाहिर-सी बात है कि आशा ने जब पहले पति की मौत के बाद जब दूसरी शादी की होगी, तो निश्चित रूप से, जैसा कि अधिकतर मामलों में देखने को मिलता है, ऋतुराज के बालमन पर इसका नकारात्मक असर पड़ा होगा और तभी से मां-बेटे के आपसी रिश्तों की कड़ियां टूट कर बिखरनी शुरू हो गयी होगीं. शायद इसी वजह से जब आशा के दूसरे पति की मौत हुई होगी, तो वह पूरी तरह से अकेली पड़ गयी. इस अकेलेपन ने न केवल उन्हें शारीरिक रूप से बल्कि मानसिक रूप से भी बीमार बना दिया था, जिस वजह से उन्होंने खुद को पूरी तरह से अपने उस फ्लैट में कैद कर लिया, जिसमें उनकी मौत हुई. उनकी मौत के लिए उनके बेटे के साथ-साथ वह खुद भी जिम्मेदार हैं. दरअसल आज की व्यस्त जिंदगी और ऐशो-आराम की हमारी बढ़ती चाहत में हम सबने खुद को पैसा कमानेवाला मशीन समझ लिया है. बचपन सपने देखने में गुजर जाता है और पूरी जवानी आनेवाले कल के  लिए पैसे कमाने और बचाने में. इस आपा-धापी में हम रिश्तों की कमाई करना शायद भूलते जा रहे हैं.  हम आये दिन ऐसी खबरों को देखते-सुनते हुए भी इस बात को इग्नोर कर रहे हैं कि जीवन के उस मोड़ पर, जब हमें किसी सहारे या अपनों के साथ की जरूरत होगी तो हमारा बैंक बैलेंस, आलीशान महल, कार, टीवी, फ्रिज या ऐसी अन्य चीजें हमारे काम नहीं आनेवाली. उस वक्त अगर कुछ काम आयेगा तो वह है आपके रिश्ते, जिन्हें आज आप इग्नोर कर रहे हैं. इसलिए मेरी मानिए तो पैसे से कहीं ज्यादा जिंदगी में रिश्तों की कमाई पर जोर दीजिए. केवल खून के रिश्ते ही नहीं,दिल के रिश्तों  की भी कद्र कीजिए. लोगों से मिलिए-जुलिए. नये-नये दोस्त बनाइए और उस दोस्ती की कद्र करना सीखिए. उन्हें संजोइए. समय-समय पर उन्हें स्नेह व प्यार की खाद-पानी डाल कर सीचिंए. उनके संग-संग जीने की कोशिश कीजिए. कोई अपना न भी हो,  तो उसे अपनाना सीखिए. रूठे दोस्तों को मनाना और अपनी नाराजगी का त्याग कर रिश्तों को गले लगाना सीखिए. याद रखिए अगर आपके जीवन में रिश्ते नहीं, तो आप सब कुछ होने के बावजूद दुनिया के सबसे गरीब लोगों में शुमार होगें और तब शायद आपके मौत की खबर भी ऐसे ही किसी न्यूज का हिस्सा बन कर रह जायेगी.

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