मुझे भी डर लगता है

Posted by Tripurari Kumar Singh
August 13, 2017

Self-Published

 

ना ही मैं पत्रकार रविश कुमार नहीं हूँ,ना ही हामिद अंसारी हूँ और ना ही इस देश का एक अल्पसंख्यक ,पर मुझे भी डर लगता है | मजबूर हूँ रविश की तरह स्क्रीन काली पीली नहीं कर सकता क्यूंकि उनकी तरह प्रकांड विद्वान नहीं हूँ कि ऐनडीटीवी जैसे घोर धर्मनिरपेक्ष चैनल में मुझे पत्रकारिता करने का अवसर मिल सके |ना ही हामिद अंसारी कि तरह कोई बयान दे सकता जिसपे बवाल हो और सरकार को गलियां पड़े |पर  मुझे भी उनकी तरह डर लगता है ,खूब लगता है| आपातकाल से भी डर लगता है | अपनी आज़ादी खोने का डर लगता है | अपने हितजनों को खोने का डर लगता है | अपनी धार्मिक आज़ादी खोने का डर लगता है | खुद को काफिर कहे जाने और फिर लूट लिए जाने से डर लगता है | अपनी माताओं बहनों के अपमान का डर लगता है | उनकी अस्मिता लूटने का डर लगता है ,किसी नारंग की तरह पीट पीट कर मार दिए जाने से डर लगता है ,बिलकुल रविश की तरह,अंसारी जी की तरह  डर लगता है न तो उनसे कम न ज्यादा | बिलकुल बराबर ||

अच्छा  लगता है जब रविश बोलते हैं ,अच्छा  लगता है जब वो चुनी हुई सरकार को रोज शाम में उधेड़ते हैं | अच्छा लगता है जब वो कहते हैं डरिये ,साम्प्रदायिक ताकतों से डरिये ,दलितों के हत्यारों से डरिये ,अखलाक के हत्यारों से डरिये ,कलबुर्गी के गुनाहगारों से डरिये | अगर कोई न डरे तो उनका जबरदस्ती डराना भी मुझे अच्छा  लगता है | हमें डरना ही चाहिए कि देश कहीं हिन्दू पकिस्तान ना बन जाये | लोकतंत्र सीमट कर रेत की तरह मुठियों में ना आ जाए| हमारे अधिकारों का हनन होना शुरू न हो जाए | इसलिए जब कभी अखलाक को मारा जाये ,बोलिए, जोर से बोलिए,आवाज कम ना पड़े | जब भी उना में दलितों को मारा जाए ,चिखिये ,इतनी जोर से चिखिये की प्रधानमन्त्री भी बोलें चाहे देर ही सही | जब कभी भी नक्सल विचारों से आक्रांत विश्वविद्यालों पर कानूनी कारवाई हो,चिल्लाये वो भी जोर जोर से | स्क्रीन काली पीली कीजिये |क्यूंकि आपकी ये बुलंद आवाज सरकार को सोने से रोकती है| न्याय का मार्ग प्रशस्त करती है |

मुझे उम्मीद है कि आप मुझे भक्त कह कर खारिज नहीं कर देंगे,क्यूंकि जितना आपको लोकतंत्र में डरने का हक़ है,मुझे भी है |हो सकता है कि बेहतर सुविधा मिलने के कारण आप मुझसे ज्यादा अच्छा लिख पढ़ लेते हैं ,तो ज्यादा मार्मिक तरीके से अपनी बात रख पाते हैं | पर यकीं मानिये मुझे भी डर लगता है देश के मूल पाकिस्तान बनने से |उतना ही जितना रविश या बरखा को हिन्दू पकिस्तान बनने से लगता है |

मुझे भी डर लगता है जब कश्मीर के पंडितों को अपने ही देश में निकाल दिया जाता है ,मुझे भी डर लगता है जब जब मालदा में कुछ लोगों को सिर्फ इसलिए मारा जाता है कि वो किसी तकबीर के नारे में यकीं ना रख कर किसी माँ में यकीं रखते हैं | मुझे भी डर लगता है जब किसी नारंग को मार दिया जाता है और दादरी तक जाने वाले वहां के मुख्यमंत्री उसके घर तक नहीं जा पाते वो भी तब जब वो किसी सीरिया में न होकर हिन्दुस्तान में ही होता है ,बिलकुल दिल्ली के पास  |मुझे भी डर लगता है जब कोई ममता खुलेआम बांग्लादेश से आये लोगों को अपना बनाकर वहां के मूल निवासियों को ही दुत्कार देती है | हमें भी डर  लगता है जब कोई ओवैसी हमें मिटा देने की बात करता है |हमें भी डर  लगता है जब धुलागढ़ जलता है और सब खामोश रहते हैं | रविश भी ,जी हाँ लोकतान्त्रिक मूल्यों की दुहाई देने वाले रविश भी  | बरखा भी कुछ नहीं कहती ,ना राजदीप कुछ कहता है तब हमें भी डर  लगता है | जब कोई मुख्यमंत्री पूरी बेशर्मी से इसे झुठला देती है ,तो भी हमें डर लगता है | पर कोई कुछ कैसे कह सकता है ,ये सेक्युलर डर है ,आदत डाल लीजिये |क्यूंकि सेक्युलर ममता अगर कुछ अममता वाली बात कर दें तो क्या खराबी है | अगर बहुसंख्यक मरते हैं तो क्या फर्क पड़ता है वैसे भी इतने ज्यादा तो हैं हीं | तो क्या हुआ की कल पाकिस्तान में भी ज्यादा थे अब नहीं हैं | तो क्या हुआ अगर कल तक सिंध के दरिया में आरती होती थी अब नहीं होती |

मेरे डर से आपको डरने की जरुरत नहीं है | मैं लाचार हूँ | बेवजह समय जाया कर रहा हूँ | क्यूंकि मीडिया आपकी है | मैं कुछ अगर सोशल मीडिया पर लिख भी दूँ तो आप भक्त कह कर निश्चय ही खारिज कर देंगे | पर यकीं मानिये ये जो आप इतना टीवी पर चिलम चिल्ली करते है वो इसलिए क्यूंकि हम बहुसंख्यक हैं कोई और नहीं | वरना हमने सुना है की बांग्लादेश में पिछले 1 सालों में सैंकड़ों रवीश मारे गए हैं | यकीं ना हो तो पता कर लीजिये ,मैं भक्त हूँ कभी झूठ नहीं बोलता |

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