एक कविता के रूप में “भीड़ का बेसूध आतंक”

Posted by Kaveri Singh (Kaamini)
August 26, 2017

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लड़ो जितना लड़ सकते हो
मारो जितना मार सकते हो
फूंको जितना फूंक सकते हो
तुम जैसी अपंग मानसिकता वाली भीड़ से
उम्मीद भी क्या हो सकती है।।
कभी गाय के सेवक बनके आते हो
कभी रेपिस्ट के रक्षक बनकर
कभी सोचा है
बेवज़ह हिंसा फैलाते
बिन जाने बसों, गाड़ियों, इमारतों
और इंसानों को जलाते हुए…
कभी सोचा है
गुंडों की भीड़ को बढ़ाते हुए
मासूमों को दहशत में लाते हुए
तुम तो आतंकवाद से भी बत्तर आतंक फैलाते हो
आपस में ही अपनों को लड़ाते हो।।
जरूरत नहीं है तुम्हें
कानून की…
न्यायालय की…
जवानों की…
वर्दी वालो की…
तुम तो हुक्मरानों के आदेशों पर
बेसुध, बद दिमागी, बेपरवाह तबाही मचाते हो।।
खोखली खोपड़ी वाली तुम्हारी यह भीड़
काश…
तुम्हारे ही विस्फ़ोट में भस्म हो जाए।।
अशांत करने वाली तुम्हारी यह भीड़
काश….
तूम्हें ही निगल जाए।।
                                        कामिनी सिंह
#RamRahim

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