ये त्रासदी! बिहार के “विकास-मॉडल” में “विजन” के अभाव का नतीजा है.

Posted by Deepak Bhaskar
August 18, 2017

Self-Published

बिहार के इस जल-त्रासदी में सैकड़ों लोग अपनी जान गवां चुके हैं वही दूसरी तरफ आर्थिक नुकसान का लेखा-जोखा करना, तत्काल किसी भी संस्थान के वश में नहीं है. इस नुकसान की भरपाई करने में बिहार को सालों लग जायेंगे. बीते सप्ताह, लगातार हो रहे मुसलाधार बारिश की वजह से जलमग्न हुए बिहार के इस त्रासदी का कारण ‘बाढ़’ कहा जा रहा है, असल में ये ‘बाढ़’ नहीं बल्कि “जल-जमाव” है. सरकारें हमेशा की तरह इसे प्राकृतिक आपदा का नाम देकर बच निकलने की जुगत में हो लेकिन इसमें कोई दो राय नहीं की यह त्रासदी का मुख्य कारण सरकार का “विकास मॉडल” है. यह प्राकृतिक नहीं बल्कि मानव-निर्मित आपदा है. यह उस विकास-मॉडल पर सवालिया निशान खड़ा करता है जिसको लेकर सरकार खुद का महिमा-मंडन करती रहती है. देश भर में विकास की राजनीति का माहौल है, हर राजनीतिक पार्टी ने विकास को, (कहने के लिए ही सही) मुख्य एजेंडा बनायी हुई है लेकिन इस तरह की त्रासदी, असल में उसी त्वरित-अनप्लांड-विकास का नतीजा है. इस बारिश ने लगभग पूरे बिहार(मोतिहारी, बेतिया, रक्सौल, सीतामढ़ी, दरभंगा) और मुख्यत कोसी-सीमांचल इलाका (अररिया, पूर्णिया, कटिहार, किशनगंज, सहरसा, सुपौल) को बुरी तरह से प्रभावित किया है. अगर यह कई दिनों तक हो रहे मुसलाधार का नतीजा है तो क्या इस तरह की बारिश बिहार में पहली बार हुआ है? बिलकुल नहीं! यह इलाका अपने हाई ग्राउंड वाटर टेबल के लिए प्रसिद्द है. यहाँ दस फीट नीचे खोदने से पानी मिलने लगता है. “बिहार का शोक” कहे जाने वाले “कोसी” के पेट में बसा यह सीमांचल इलाका बाढ़ के लिए कुख्यात है. इस इलाके में बारिश, हर साल सामान्य से ज्यादा होती ही है. कभी “हथिया नक्षत्र” शुरू होने से पहले लोग दो महीने का राशन अपने घरों में भर लेते थे क्यूंकि इस नक्षत्र में एक-डेढ़ महीने तक लगातार बारिश होती थी और लोगों का घर से निकलना मुश्किल हो जाता था. लेकिन उस समय, इस तरह से जल-जमाव नहीं होता था, ऐसी त्रासदी नहीं होती थी. इसके कई कारण थे.

इसका मुख्य कारण था, बारिश के पानी का निकलने के लिए रास्ते का होना. इस इलाके में छोटी-बड़ी नदियों के सिवा धार(बरसाती नदी), ताल (वेटलैंड-स्वैम्पी एरिया), छोटे-बड़े कुडा (तालाब) का “जाल” होना जिससे बरसात के पानी को निकलने का पैसेज(रास्ता) मिल जाता था. लेकिन इस बार की बारिश के पानी को निकलने का कोई रास्ता नहीं मिला और फिर पानी घरों में घुसकर स्थिर हो गया. नतीजा सामने है! इस रुके हुए पानी ने सड़के, तटबंधों को तहस-नहस कर आपना रास्ता खोज लिया. अब-जब पानी कम हुआ है तो ऐसा लगता है कि इलाका किसी विध्वंशक युद्ध के बाद का इलाका है जिसमें सब-कुछ तहस-नहस हो गया है. असल में यह युद्ध प्रकृति ने सरकार के विकास-मॉडल से लड़ा है. बिहार में द्रुत-गति(२५.०७%) से बढ़ती आबादी(२०११ के सेन्सस के अनुसार १०.४ करोड़) पर सरकारों का कोई विशेष ध्यान नहीं वो शायद इसलिए भी कि अब आबादी ‘मानव-संपदा’ नहीं बल्कि ‘वोट-संख्या’ होती जा रही है. बिहार दूसरा सबसे ज्यादा आबादी वाला राज्य और जनसँख्या घनत्व में शीर्ष स्थान पर है. इस बढ़ती जनसँख्या ने हर तालाब, धार, ताल(वेटलैंड) को भरकर लोगों का घर बनवा दिया. उदहारण के लिए, अररिया जिले के फोरबीसगंज शहर में सीताधार की वाटर-पैसेज कैपेसिटी ने इस शहर को कभी डूबने नहीं दिया. लेकिन अब वहां सीताधार नहीं बल्कि पक्के मकानों का जंगल है. इस धार के ख़त्म होने का नतीजा, इस बार इस शहर ने देख लिया है. पूर्णिया शहर में रामबाग इलाका ताल(वेटलैंड) के लिए प्रसिद्द था और अब यह रामबाग रेजिडेंशियल कॉलोनी है, लाईन बाजार पूर्णिया से सटे, बड़े तालाब की जगह पर मैक्स हॉस्पिटल जैसे कई और बड़े मकान बना दिये गए हैं. जलकुम्भी से भरा यह बड़ा-तालाब के ख़त्म होने का नतीजा पूर्णिया के नगरवासी ने देख लिया है. लम्बी-चौड़ी सड़के, तटबंध तो बना दिए गए हैं. पानी को रोकने का उपाय तो किया गया है लेकिन उसे निकलने के हर रास्ते बंद कर दिए गए हैं. धार की जगह अब कालोनी है, वेटलैंड(ताल) की जगह अब बड़े मकान हैं. नदियाँ संकरी हो गयी हैं. नतीजा पानी निकलने का कोई रास्ता नहीं बचा और अंत में इस बार पानी ने अपना रास्ता खुद खोज लिया. सरकार के विकास मॉडल में पानी को रोकने की बात तो थी लेकिन उसके निकलने का विजन नहीं था.

सरकार के पास विकास-मॉडल की राजनीति तो है लेकिन इस विकास मॉडल में विजन का अभाव साफ़ झलक कर सामने आया है. सतत विकास(सस्टेनेबल डेवलपमेंट) को लेकर बहस जहाँ द्वितीय विश्व युद्ध के बाद से शुरू हो गया था, क्लब ऑफ़ रोम के लिमिट्स टू ग्रोथ की बहस जगजाहिर है. लेकिन बिहार की सरकार के विकास के मॉडल में सतत विकास की संकल्पना का अभाव साफ़ दीखता है. चीन के किसी भी शहर के विकास के लिए उस शहर में एक शहरी विकास काम्प्लेक्स है जिसमें पहले थ्री-डी प्लानिंग की जाती है फिर उसे जमीन पर लागू किया जाता है. किसी भी त्रासदी से बचने का उपाय, विकास मॉडल में निहित होता है. जहाँ बिहार में स्मार्ट-विलेज बनाने की बात है वहीं दूसरी तरफ इसको कार्यान्वित करने की कोई योजना नहीं है. एक तरफ स्मार्ट-सिटी का स्वप्न तो है पर कहीं भी इसे साकार करने की योजना नहीं है. बिहार में बाढ़ की समस्या निरंतर है लेकिन बाढ़ आपदा को कण्ट्रोल करने के लिए कोई अध्ययन संस्थान नहीं है. प्रभावित इलाकों में घर किस तरह का बनाना चाहिए इसके लिए कोई मॉडल नहीं है. सीमांचल इलाके में ‘बाढ़ नियंत्रण अध्ययन संस्थान’ की सख्त आवश्यकता है. संस्थान में इस इलाके का, सतत विकास के तहत अध्ययन होना चाहिए. जनसँख्या वृद्धि को रोकने के लिए लगातार उपाय होने चाहिए. बाढ़ की समस्या अगर इतनी सामान्य है तो एक फुल मंत्रालय भी हो और इसका मुख्यालय सीमांचल इलाके में होना चाहिए. बिहार सरकार के पास बाढ़ आपदा से निपटने के लिए खुद का टास्क-फ़ोर्स होना इस इलाके की जरुरत है. विश्विद्यालय के सिलेबस में बाढ़ आपदा से जुडी शिक्षा को जोड़ना जरुरी है. सरकार के विकास पधाधिकारियों को विकास की संकल्पना के साथ सतत विकास का ज्ञान होना चाहिए. किसी भी चीज को बनाने से पहले अगले सौ साल की दूरदर्शिता होनी चाहिए. अन्यथा सड़के बनेंगी, तटबंध बनेंगे और फिर तहस-नहस हो जायेंगे. सरकार के पास विजनरी आर्किटेक्ट होने चाहिए जिनमें दूरदर्शिता हो. तमाम झीलों, ताल, धार, तालाब को सुनियोजित तथा सरंक्षित करना सरकार की प्राथमिकता होनी चाहिए. याद रहे! प्रकृति पर विजय पाने की चाह में हो रहे इस युद्ध में, हार हर हमेशा मनांव की ही होगी. प्रकृति से तालमेल बिठाकर ही बिहार का विकास संभव है. इस त्रासदी ने यह दिखा दिया है की सरकार के विकास मॉडल में दूरदर्शिता का खासा आभाव है. नतीजा! सबके सामने है.

डॉ दीपक भास्कर, दिल्ली विश्विद्यालय में राजनीति पढ़ाते हैं.

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