राजनीति या धर्मगुरु नीति….

Posted by Sharda Dahiya
August 27, 2017

Self-Published

कभी कभी सोच कर आश्चर्य होता है की दुनिया किस हाशिए और किन मूल्यों पर जिन्दगी को जी रही है माफ़ कीजियेगा जी नहीं रही गुज़ार रही है |कहने को हम विश्व के सबसे बड़े लोकतान्त्रिक देश में जीते हैं जहाँ जीने का अधिकार ,बोलने का अधिकार ,और ना जाने कितने ही स्वन्त्रता के नाम पर अधिकार है जिनपर हमने कब्जा कर रखा है मगर ये कैसी स्वन्त्रता है जिसमें हम स्वन्त्रता का मतलब तक नहीं समझ पा रहे हैं | स्वन्त्रता का मतलब होता है अपनी जिन्दगी को बेशक अपने हाशियों और अपने मूल्यों पर जियो मगर ये जरुर दिमाग में रख कर चलो की आपकी आज़ादी किसी की तकलीफ़ का कारण कतई ना बने , अगर ऐसा है तो क्या फर्क है आप में और उन जानवरों में जिनका मकशद सिर्फ और सिर्फ पेट भरना और अपने दिमाग की खुन्नस को मिटाना है | जिनकी आदत में ये आजाता है की उनको बस खाना है और सब अलूल जलूल करके अपने दिमाग को शांत रखना है | हम मेरे हिसाब से इन्सान है, और वो इन्सान जिनके पास दिल ,दिमाग ,इमोशन ,दुःख ,तकलीफ़ आदि जैसे टूल है जो हमें इंसानियत को जिन्दा रखने की सहूलियत देते हैं मगर हम करते क्या हैं ? कभी कभी मुझे इन इंसानियत ,मानवता ,प्यार जैसे शब्दों पर भरोसा करने में  कौफत होती  है |हम ऐसी आज़ादी जीना चाहते है जो बस और  बस औरों  को तकलीफ दें और आपको रत्ती भर खुशी | ज्यादा दूर नहीं जाते कल ,परसों की घटना को ही ले लीजिये बाबा राम रहीम ने अपने सुख अपनी सुविधा और अपनी जिस्मानी खुशी को पूरा करने के लिए कितने ही लोगों को तकलीफ़ दी | माना की धर्म और आस्था की आज़ादी हमें अधिकार देती है किसी चीज़ को भी अपनाने का | मगर उस सृष्टि के रचियता ने हमें दिमाग नाम के तोफे से भी नवाजा है जो सही और गलत में फर्क करने की ताकत देता है | माना की प्यार अँधा होता है मगर इतना भी अँधा नहीं होता की उसको सही और गलत में फर्क ना दिखाई दे | बाबा जी ने जो किया सो किया कहाँ गया हमारा विवेक जो हम उस सही और गलत में फर्क नहीं कर पाते | क्यों नहीं देख पाते सही और गलत के बीच के बुनियादी फर्क को | एक इन्सान सिर्फ और सिर्फ अपने कर्मों से ही बड़ा बनता है और उसके कर्म ही उसको ईश्वर तुल्य स्थापित करते है | देश की एक अदालत अगर उसके कर्मों का एक एक कच्चा  चिटठा खोल देती है जिससे ये साबित भी हो जाता है की ये इन्सान दोषी है तो फिर रह क्या जाता है | अदालत लोकतान्त्रिक देश की है जिसने हमें ये हक़ दिया और ये अधिकार दिए की हम किसी भी भगवान या धर्म के उपासक बने रहे | जब वो आपको इतना अधिकार देती है तो आपको भी उसके फैसले से सहमत होना चाइए| राजनीति और धर्म दो पहलू होते हैं किसी भी समाज के | अगर धर्म को राजनीति चलती है तो भी बस वोट बैंक तक ही होकर सिमट जाता है मगर जब धर्म राजनीति को चलता है तब वो यकीनन  एक बड़े विध्वंस का कारण बनता है |बाबा राम रहीम के समर्थकों ने जो किया वो किसी वहशीपन से कम नहीं था | ऐसा धर्म और ऐसी आस्था किस काम की  जो आपको एक अच्छा इन्सान भी ना बना सके आपकी सोचने समझने की  शक्ति का भी पतन कर दे| आस्था कभी भी किसी नुकसान का सबब नहीं बनती तो ये कैसी आस्था है जो इतने लोगों की मौत का कारण बनी | इससे भी ज्यादा हैरानी का कारण मेरे लिए तो कम से कम ये था की  मेरे घर में मम्मी एक बात से खुश थी की चलो जो हुआ वो कम से कम शुक्रवार को हुआ अगले दो दिन उनकी छुट्टी है ही तब तक तो कम हो ही जाएगा अगर बीच में किसी दिन हो जाता उनकी ऑफिस में एक्स्ट्रा छुट्ठी कट जाती या मेरी बहन जो भटिंडा में पढ़ रही है उसके बारे में जानने के लिए मैंने फ़ोन किया तो पता लगा की वहाँ उसकी यूनिवर्सिटी में सब शांत है मगर वो खुश है क्योंकि आज कर्फ्यू की स्थिति में उसके लेक्चरर जल्दी चले गए और उनको शुक्रवार भी मिल गया शनिवार और रविवार के साथ साथ छुट्टी मनाने के लिए | आम जनता की ये  मनोस्थिति थी कल | और उनको छोड़ो हमारे राजनीतिज्ञ जो शायद इस शब्द के भी लायक नहीं है उनका कहना है की धारा 144 आस्था पर नहीं लग सकती | सही बात है आस्था या यूँ कहें की चाटुकारिता पर क्यों लगेगी ये तो भारी जान हानि या लाशें बिछाने के बाद लगती है लो जी बिछ गई मौत के तांडव की समीक्षा अब लगाइए धारा 144 अब तो सरकार के पास कारण मिल गया है | अगर धर्म का और आस्था का यही रूप प्रचलित रहा तो वो दिन दूर नहीं है जब हम लोग भी इराक या इरान के जैसे धार्मिक आतंकवाद से झूझते नजर आएँगे जहाँ प्यास पानी से नहीं दुसरे धर्म के लोगों के खून से ही बुझेगी | बचा लीजिये खुद को इस गर्त में जाने से | आँखें खोलिए ये वक्त तो कम से कम आँखें बंद करके बिल्ली की तरह मौत के आने के इन्तजार में गुजारने का नहीं है | कहीं ऐसा ना हो इन अंधी आस्था और अंधी राजनीति की दौड़ में हम खुद को नेस्तानाबूद न कर दे और उसका इल्जाम फिर दुसरे धर्म पर धरें |

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