रोएं गरीब-दुखारी, डॉक्टर सा’ब की जेब और भारी

Posted by Rana Ashish Singh
August 5, 2017

Self-Published

 

 

चमोली जिले के थराली ब्लॉक के सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र में तैनात डॉक्टर जगदीश जोशी की किसी ने शिकायत की कि डॉक्टर जोशी सरकारी अस्पताल में दवा होने के बावजूद मरीजों को बाहर की एक दुकान से दवा लेने की सलाह देते हैं. सरकारी दवाओं के मौजूद होने के बावजूद उनकी कार्यशैली जस-की-तस बनी हुई है.

क्षमता से ज़्यादा मरीज़ भर्ती कर लेना, फिर उन्हें बाहर की दवाएं लिखना यह हमलोग सुनते आये हैं , लेकिन स्थिति ज़्यादा विकट तब हो जाती है जब जनता के पास कई मील तक उपचार के अन्य कोई साधन उपलब्ध न हों. पहाड़ों पर यह स्थिति और भी भयावह है क्योंकि पहाड़ो पर आवागमन की सुविधाएं अब भी पहले जैसे ही हैं और गांव से सड़क तक की दूरी मरीजों को अक्सर किसी की पीठ पर तय करनी होती है.

सरकारी अस्पतालों में दवाओं का एक निश्चित कोटा होता है, क्षमता से अधिक मरीज भर्ती कर लेना इस हिसाब से भी गलत है क्योंकि इस स्थिति में कुछ मरीजों को दवाएं मिलेंगी और बाकी को बाहर की दवा पर निर्भर रहना होगा.

एक कहावत है कि जिस घर में कोई बीमारी और कोई मुकदमा हो जाये उस घर का उबर पाना लगभग असंभव हो जाता है. शायद यही कारण है कि डॉक्टर और वकील पर लोग आँखबन्द करके भरोसा करते हैं, रिजल्ट चाहे जैसे हों. डॉ. जगदीश जोशी की कहानी को हम समाजशास्त्र के कई आयामों से देख-समझ सकते हैं, खीझ सकते हैं और उस पर एक सकारात्मक कार्यवाही की मांग कर सकते हैं. जो दवा अस्पताल से मुफ्त या लगभग मुफ्त जैसे मूल्य पर मिल सकती है, उसके लिए जनता को पचास से सत्तर प्रतिशत अधिक भुगतान करना पड़ रहा है. शायद डॉ. जोशी की ट्रेनिंग में कोई कमी रह गयी हो? या उनकी आवश्यकताएं कुछ ज़्यादा हों? दोनों ही अवस्थाओं में दबाव जनता पर और फायदा कुछ चुनिंदा लोगों और कंपनियों का क्यों हो?

तकनीकी तौर पर यह समझने की ज़रूरत है कि दवा के रासायनिक सूत्र पर कंनियों का एकाधिकार नहीं होता है. उनके मूल तत्त्व /साल्ट एक जैसे होते हैं और थोड़े बहुत बदलाव के साथ कम्पनियाँ दवा को अलग-अलग नाम से बेचती हैं.आम भाषा एक ही दवा के अलग-अलग दाम तय होते हैं. दवा कंपनियों के सेल्समेन डॉक्टर्स को अच्छे ऑफर देकर अपनी दवा लिखवाने का आग्रह करते हैं. यह एक तरह की मार्केटिंग स्ट्रेटिजी है. होना यह चाहिए कि जो दवाएं सरकारी अस्पतालों में मौजूद नहीं हैं, केवल उन्हें ही मरीज बाहर से खरीदें; लेकिन होता इसके विपरीत है. घर की गाढ़ी कमाई इलाज की लागत में जाया जाती है और बीमारी के साथ-साथ आर्थिक दवाव भी पड़ता है.

बहरहाल, थराली के लोगों के स्वास्थ्य को कुछेक व्यक्तियों के स्वार्थ और लालच के भरोसे छोड़ देना कितना सही है?

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