वंदे मातरम की ठेकेदार नहीं है आरएसएस:

Posted by Afaq Ahmad
August 1, 2017

Self-Published

बंकिम चंद्र चटर्जी ने वंदे मातरम की रचना जिस वक़्त की थी तब ये अंग्रेज़ों के यहां नौकरी करते थे!

दरअसल बंकिम चंद्र चटर्जी को इंग्लैंड की रानी ने भारतीय उपनिवेश को अपने अधीनस्थ करने के बाद 1858 में डिप्टी कलेक्टर के ओहदे पर फ़ायज़ किया था। इसके बाद इन्होंने 1871 में वंदे मातरम की रचना बांग्ला और संस्कृत भाषा में की थी। बाद में इस गीत को बंकिम चंद्र चटर्जी ने अपनी मशहूर और विवादास्पद कृति ‘आनंद मठ’ (1885) में जोड़ दिया था। 1891 में जब बंकिम चंद्र रिटायर हुए तो अंग्रेज़ शासकों ने इन्हें ‘राय बहादुर’ की उपाधि से सम्मानित किया था।

आज आरएसएस का नारा ‘हिंदुस्तान में रहना है तो वंदे मातरम’ कहना है तब और भी जटिल हो जाता है जब मद्रास हाई कोर्ट के माननीय न्यायमूर्ति एमवी मुरलीधरन का आदेश आता है कि राष्ट्रगीत वंदे मातरम को हर सरकारी-ग़ैर सरकारी दफ़्तरों-संस्थानों-उद्योगों में हर महीने कम से कम एक बार गाना होगा। अब चूंकि ये गीत बांग्ला और संस्कृत भाषा में हैं इसलिए इसे तमिल और अंग्रेज़ी में भी अनुवाद करने का हुक्म दिया गया है।

हैरान करने वाली बात तो ये है कि जिस केस में मद्रास हाई कोर्ट का ये फ़ैसला आया है उसमें इस गीत को गाने या ना गाने से मुताल्लिक़ कोई अपील ही नहीं गयी थी…इससे दो क़दम आगे बढ़कर एक तरह से स्वतः संज्ञान लेते हुए मद्रास हाई कोर्ट का उक्त आदेश हैरान करने वाला है। अब आने वाले 25 अगस्त 2017 को सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई होनी है कि ये गीत शिक्षण-संस्थाओं में अनिवार्य रूप से गाया जाए या नहीं।

देश में राष्ट्रगान जन-गण-मन…सर्वमान्य और विवादों से परे है; पर अब से जितनी बार भी राष्ट्रगीत का विवाद गहराया है भारत का मुसलमान कठघरे में खड़ा किया जाता रहा है कि देशभक्ति के प्रतीक राष्ट्रगीत को जब तक मुसलमान गाएंगे नहीं उनकी देशभक्ति संदिग्ध बनी रहेगी!

यह हमारे मुल्क का दुर्भाग्य ही है कि किसी भी बहस या विमर्श में कोई इस्लामी पहलू या मुसलमान जुड़ जाए तो वो मुद्दा एक संकीर्ण साम्प्रदायिक रंग अख़्तियार कर लेता है।

दरअसल हमारे राष्ट्रगीत वंदे मातरम में जिन दृश्यों और प्रतीकों का ज़िक्र है वो सब बंगाल की सरज़मीन से ही जुड़े हुए हैं। इस गीत में बंकिम ने सात करोड़ जनता का भी उल्लेख किया है जो उस वक़्त के बंगाल प्रांत, जिसमें ओडिशा और बिहार भी शामिल थे, की कुल आबादी थी; इसीलिए जब अरबिंदो घोष ने इसका अनुवाद किया तो इसे ‘बंगाल का राष्ट्रगीत’ का टाइटल दिया। मशहूर बांग्ला लेखक नरेश चंद्र सेनगुप्ता ने जब 20वीं शताब्दी की शुरूआत में ‘आनंदमठ’ का अंग्रेज़ी में अनुवाद किया था तो उन्होंने साफ़ लिखा है कि उन्हें ये कहते हुए दुःख हो रहा है कि बंकिम बांग्ला राष्ट्रवाद से इतने ग्रस्त थे कि उन्हें भारतीय राष्ट्रवाद की परवाह ही नहीं थी।

साथ ही आज़ादी के आंदोलन के दौरान ये भी आपत्ति उठाई जाती रही कि बंकिम की ये रचना एक ऐसी कृति से लिया गया है जो मुसलमानों के ख़िलाफ़ हिंसा, क्रोध और अंग्रेज़ी राज का गुणगान करती है!

रवींद्रनाथ टैगोर ने वंदे मातरम के लिए एक बेहतरीन धुन भी बनाई थी, इसके बावजूद बंकिम के जीवनकाल में इस गीत को ज़्यादा मक़बूलियत नहीं मिल पाई थी।

ये सर्वविदित है कि बंगाल के बँटवारे ने वंदे मातरम को बंगाल का राष्ट्रगीत बना दिया था। अंग्रेज़ हुकूमत ने जब 1905 में बंगाल के विभाजन का प्रस्ताव रखा तो इसके ख़िलाफ़ उठे जनाक्रोश ने इस गीत और ख़ासकर इसके मुखड़े को अंग्रेज़ों के ख़िलाफ़ एक मज़बूत क़िलेबंदी में तब्दील कर दिया था! हिंदुओं और मुसलमानों ने मिलकर वंदे मातरम और अल्लाह-हू-अकबर के नारों से अंग्रेज़ शासकों को हिलाकर रख दिया था। बंगाल-विभाजन के ख़िलाफ़ उस वक़्त वंदे-मातरम गीत ने आग में घी का काम किया था और जब बारीसाल (अब बांग्लादेश में) किसान-नेता एम रसूल की क़यादत में हो रही बंगाल कांग्रेस के प्रांतीय अधिवेशन पर अंग्रेज़ सेना ने वंदे मातरम बोलने पर बर्बर हमला किया तो रातोंरात ये बंगाल ही नहीं पूरे मुल्क में गूँजने लगा था।

इंक़लाब ज़िंदाबाद की तरह ही ये नारा साझे राष्ट्रवाद का मंत्र बन गया था और ये भी एक सच है कि भगत सिंह, सुखदेव, राजगुरु, रामप्रसाद बिस्मिल, अशफ़ाक़ुल्लाह ख़ान जैसे अनगिनत शहीद वंदे मातरम गाते हुए फाँसी के फंदों पर झूल गये थे।

इससे भयभीत होकर ही अंग्रेज़ हुक्मरानों और उस समय के आरएसएस के उनके भारतीय पिट्ठुओं ने हिंदू राष्ट्रवाद बनाम मुस्लिम राष्ट्रवाद का विष घोल ‘साझे राष्ट्रवाद’ को छिन्न-भिन्न कर दिया था और इसी रस्साकशी के बीच ‘वंदे-मातरम’ एक मुद्दा बन गया!

चूँकि कांग्रेस के नेतृत्व में स्वतंत्रता-आंदोलन चल रहा था तो उसने वन्दे मातरम पर विभाजन रोकने के लिए महात्मा गाँधी, पण्डित जवाहरलाल नेहरू, मौलाना अबुल कलाम आज़ाद और सुभाष चंद्र बोष को लेकर 1937 में एक समिति बनाई जिसने इस गीत पर आपत्तियां आमंत्रित कीं।

राष्ट्रगीत वंदे मातरम को लेकर सबसे बड़ी आपत्ति ये थी कि ये गीत एक धर्म-विशेष के हिसाब से भारतीय राष्ट्रवाद को परिभाषित करता है, ये सवाल सिर्फ़ मुसलमान संगठनों ने नहीं बल्कि सिख, जैन, ईसाई और बौद्ध संगठनों ने भी उठाया।

इसका हल ये निकाला गया कि इस गीत के शुरू के केवल दो अंतरे गाये जाएंगे जिसमें कोई मज़हबी पहलू नहीं है; पर इससे हिंदुओं में आरएसएस/हिन्दू महासभा और मुसलमानों में मुस्लिम लीग के लोग संतुष्ट नहीं हुए।

उस वक़्त से लेकर आज तक RSS/हिन्दू महासभा दोनों का यही कहना रहा है कि भारत एक हिंदू राष्ट्र है और ये पूरा गीत गाया जाना चाहिए।

मुस्लिम लीग ने भी उस वक़्त इसी हिंदुत्ववादी सोच को ढाल बनाकर साझे आज़ादी के आंदोलन से मुसलमानों को अलग रखने के लिए ख़ूब धमा-चौकड़ी मचाई थी।

अब दिक़्क़त ये है कि RSS वन्दे मातरम के पूरे गाने की वकालत करता है और इसे राष्ट्रगान से भी ऊपर के खाँचे में रखता है। RSS इस गीत को अपने हिन्दू-राष्ट्र के मिशन के मुताबिक़ पाता है। इसलिए RSS को ये ज़रूर बताना चाहिए कि अंग्रेज़ों की हुकूमत के दौरान उनके किस-किस नेता और स्वयंसेवकों ने अंग्रेज़ों के ख़िलाफ़ इस गाने को गाया था, उनमें से भारत माता को आज़ादी दिलाने के लिए कितने लोग शहीद हुए और कितनों ने जेलों में सज़ा काटी!?

चूँकि आरएसएस/बीजेपी वंदे-मातरम गीत की मौजूदा ठेकेदार बनी बैठी है, जो लोग स्वतंत्रता-संग्राम के दौरान अंग्रेज़ों के ज़ुल्म-ओ-तशद्दुद के दौरान अपनी आंखों पर पट्टी बाँधे रखे और ज़ुबानों पर ताला जड़े रखा, जिन लोगों ने आज़ादी की लड़ाई के दौरान फ़िरंगियों के तलवे चाटे—अंग्रेज़ों के यहां मुलाज़मत की और आज़ादी की लड़ाई लड़ रहे शूरवीरों के ख़िलाफ़ अंग्रेज़ों की LIUगिरी की—ख़बर-रसानी की आज वही लोग ‘वंदे-मातरम के ठेकेदार’ बन रहे हैं।

आरएसएस/भाजपा जैसे हिंदुत्ववादी धड़ों की प्रॉब्लम यही है कि एक जम्हूरी और सेक्युलर भारत का राष्ट्रगान (National Anthem) उन्हें अखरता है और इसके समानांतर वो राष्ट्रगीत (National Song) वंदे मातरम को खड़ा करना चाहते हैं।

 

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