शादी तक सीमित नहीं हमारे सपने

Posted by Pratiksha Aashiwal
August 17, 2017

अगर आपको लगता है कि लड़कियों के सपनों में सुन्दर राजकुमार आता है ,वो लाल चुनरी ओढ़े उसके इंतज़ार के सपने देखती है ,ये सोचती होगी कि वो चूड़ा ,सिन्दूर लगाकर कैसी दिखेगी , या अगर वो सज-धज कर घर से निकल रही होगी तो ज़रूर किसी लड़के के लिए, तो इन सबका जवाब है – नहीं। वो खुद के लिए सजती है, संवरती है। वो किसी के द्वारा जज नहीं होना चाहती। और रही सपनों की बात, तो लड़कियों के सपने सिर्फ शादी ,दूल्हे तक नहीं होते। बहुत सी लड़कियां बहुत अलग सपने भी देखती है।

कभी – कभी वो सिर्फ ये चाहती है कि चले जाये यूं ही कहीं अकेले पहाड़ों पे। छू ले हर अनछुई बहती नदी को ,वो गोल रोटी बनाना सीखने के साथ -साथ इस गोल – गोल दुनिया के चक्कर भी काटना चाहती है। उतनी ही बेफिक्री और आज़ादी के साथ जितनी की एक लड़के को हो।
कभी – कभी वो चाहती है कि वो छोटे से छोटे और बड़े से बड़े काम के लिए भी किसी पर निर्भर न रहे ।अपनी ज़रूरतें वो खुद पूरी करे। उसे उन लोगों की सोच समझ नहीं आती जो महिला दिवस पर उसे विश करते है और उसके अगले ही दिन उसके कपड़ों और उसके घर आने के समय से उसे जज करते हैं।

उसे शादियों में होने वाली उन सारी परम्पराओं से नफरत है जो उसे और उसके परिवार को कमज़ोर करती है। उसे नफरत होती है जब वो दहेज़ लेते या देते देखती है। वो इस सो कॉल्ड पढ़े -लिखे समाज को चीख -चीख कर ये बताना चाहती है कि दहेज़ सिर्फ वो नहीं होता है जो ऑन डिमांड पूरा किया जाये ,दहेज़ वो भी होता है जो माता – पिता स्वेच्छा से दें। हालांकि उसमे स्वेच्छा से ज्यादा चिंता और ड़र होता है कि अगर हम कुछ कम दें तो कल को हमारी बेटी को कुछ सुनना न पड़े। उसे हँसी आती है जब लड़के वाले कहें कि- जी हमें कुछ नहीं चाहिए बस आप अपनी बेटी को जो देना चाहें दें। ये है हमारा समाज।
लड़की अपना घर छोड़े ,अपने माता -पिता को छोड़े ,अपने सपने ,शौक सब छोड़ दे ,सारे एडजस्टमेंट ,त्याग समर्पण की उम्मीद भी उसी से की जाये और फिर भी स्वेच्छा से दिया गया दहेज़ भी वही लाये ।अब ये कहाँ के न्याय की बात है ?
जबकि वह सपने देखती है कि इसे कैसे बदला जाए। प्रकृति के संतुलन को वह समझती है और चाहती है कि उसकी जिम्मेदारी मे ईमानदार साझा हो। अकेले दोनों ही (स्त्री पुरुष ) नही रह सकते इस सच को वह समझती है और समझाना चाहती है। उसकी इस समझाने की चाहत या पहल को *ज़ुर्रत* समझने वाले लोग उसके विरोध में बोलने लगते हैं जबकि वह प्रतिपक्ष बनना नहीं चाहती। वह तो चाहती है जड़ परंपराएं टूटे। वह चाहती है कि साथ मिलकर चलें,दुखद यह है कि उसकी इस चाहत को कमज़ोरी मान लेते हैं लोग या फिर विद्रोह । जबकि वह दोनों से अलग है । वह चाहती है कि उसे स्त्री नहीं मनुष्य समझा जाए। उसे तन से नहीं मन से पढने की कोशिश की जाए।

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