सत्ता का लोभ कहो या मजबूरी की चुपी

Posted by priyanka singh
August 12, 2017

Self-Published

भारत के पूर्व उपराष्ट्रपति हामिद अंसारी ने अपने कार्यकाल के अंतिम दिन में अल्पसंख्यक की बिगड़ते हुए हालात पर चिंता जताई। इसके बाद सोशल मीडिया पर इनके सवाल को गैर जिम्मेदाराना  बताकर जनता ने उन्हें खूब अनाब सनाब कहा । ये सोचने की बजाए की एक उपराष्ट्रपति को ये सब कहने की जरूरत क्यों आन पड़ी। क्या सच में अल्पसंख्यक भारत में असुरक्षित हैं, या सिर्फ उन्हें चुनाव में जितना का एक जरिया बनाया जाता है।
अगर हम इनके बयान को धर्म से जोड़ने की बजाए इनके शब्दों पर गौर करे और एक बार  सोचे तो शायद हमें समझ में आए की हकीकत क्या है, और क्यों इतने ऊपर बैठे इंसान को ये बोलने की जरूरत पड़ी। इतनी सुरक्षा रहने के बावजूद भी इन्हें ये डर सता रहा है, तो एक बार सोचिए की आम जन के साथ क्या होता होगा। कैसे वो पूरे दिन इस डर के साथ जीवनयापन करते हैं।
देश में आए दिन कोई न कोई घटना सुनने को मिलती हैं, जिसमें एक भीड़ आती हैं और एक इंसान को अपना शिकार बना लेती है। इस भीड़ से लोग इतना डरते है कि इसके खिलाफ कोई एक्शन नहीं लेते है. ऐसे में एक माँ अपने बेटे को , एक बहन अपने भाई को और एक पत्नी अपने पति को खो देती है और ऐसी घटना पर सवाल किया जाये तो ये गलत कैसे हुआ। हां, हम ये जरूर कह सकते है कि इतने दिनों तक चुप्पी क्यों साध राखी थी। अचानक से ये सवाल क्यों ? इसके पीछे भी कोई राजनीति है या कोई डर था।
वैसे सोचना हमें भी चाहिए एक इंसान होने के नाते की अचानक से देश में आए दिन इतनी मौत क्यों हो रही हैं। वो भी सिर्फ उन लोगों पर हमला किया जा रहा है , जो एक अलग सोच रखते है। चाहे वो जेएनयू के छात्र पर हमला हो, अचानक से इतने बड़े यूनिवर्सिटी के छात्रों पर देशद्रोही का इल्जाम लगाना , या एक भीड़ के  द्वारा जुनैद की हत्या करना। ऐसी घटनाओं की संख्या में एकाएक बढ़ोतरी होना, सोचने पर मजबूर कर देता हैं कि हमारा देश किस और जा रहा है या यूं कहे कि इसे किस और ढकेला जा रहा है।
 मौजूदा समय में लोगों के अंदर एक अजीब से नफ़रत पैदा की जा रही हैं और इसी नफ़रत का फयदा सत्ता लोभी लोग उठा रहे है। तभी तो विद्यमान समय में संसद में मुद्दे की बात होने के बजाए, एक दूसरे पर इलज़ाम लगाने में पक्ष और विपक्ष व्यस्त है, और शायद विपक्ष के पास मुद्दा भी नहीं है। तभी तो वो लोग अपना मुद्दा भी नहीं उठा पाते है। शायद ये समय लोकतंत्र के लिए सबसे बड़ा खतरा है, क्योंकि जनता की बात रखने वाला ही कोई नहीं है।  तो जनता कैसे अप्रत्यक्ष रूप से सत्ता चला रही है।
आज के समय में जनता काम सिर्फ इतना रहे गया है कि वो अपनी मनपसंद पार्टी को वोट दे और उसके गलत और सही में साथ दें। चाहे उसके लिए उसे कोई भी हर्जाना भरना पड़े। अंतः हम कह सकते है कि अब हमें मुद्दे की जरूरत नहीं है क्योंकि हम तो बस कठपुतली का काम कर  रहे है।  तभी तो  आवाज़ उठाने वाले पर भी हम शक करते है और सही को गलत कहने में एक बार भी झिझकते नहीं है। अब हमारे अंदर इंसान नहीं है, बस एक नफ़रत है,जिसे हम शौक से पाल रहे है।

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