सिर्फ ट्रिपल तलाक जैसे मुद्दों पर ही क्यूँ मांगी जाती है अमुवि छात्रों की राये?

Posted by FAUZAN ARSHAD
August 23, 2017

Self-Published

अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय एक बार फिर से उस वक़्त चर्चा में आ गया जब ‘इंडिया टुडे’ ने अपनी एक रिपोर्टर ने साथ हुई नोक-झोंक का विडियो सोशल साइट्स पर डाला। देखते ही देखते विडियो वायरल हो गया और हमेशा की तरह इस बार फिर से हर तरफ से अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी को आलोचनाओं का सामना करना पड़ा। यहां हम आपको बता दें कि “नोंक-झोंक जिन छात्रों से होती हुई दिख रही है दरअसल वो AMU के निलंबित छात्र हैं और वो कैंपस के बाहर हैं” जैसा के कुच्छ न्यूज़ चैनल्स ने कहा|लेकिन यहाँ एक दूसरी विडियो में जो कुच्छ दिखा जिसे बाद में ‘IRONY OF INDIA’ नाम के एक फेसबुक पेज ने डाला है हकीकत काफी हद  तक कुच्छ अलग ही बयान करता है|राष्ट्र के परसिद्ध मीडिया हाउस से जुड़े पत्रकार का ऐसा लहजा जो उस विडियो में सामने आया है कहाँ तक सही है ?

सोशल साइट्स पर चल रही गरमा-गरम बहस भी खूब चली, बहस इतनी बढ़ गयी के ‘जनता का रिपोर्टर’ के CEO रिफत जावेद ने भी AMU-India Today रिपोर्टर विवाद पर लाइव कर अपील की ‘मीडिया को निष्पक्ष और बिना किसी के दबाव के काम करना चाहिए’

उन्होंने ने आगे कहा ” औरतों के हक की लडाई में में दो राये हो ही नहीं सकती, औरतों के साथ कहीं भी हो रहे ज़ुल्म के खिलाफ हमें सबसे पहले आगे आके लड़ना चाहिए”   

दूसरी अहम बात ये कि वो यूनिवर्सिटी कैंपस में भी नहीं थे तो ऐसे में अमुवि को इन पूरे मामले घसीटना कहां तक सही है?

तीसरी सबसे अहम बात- जब AMU PRO ने अमुवि कैंपस में कुछ भी शूट करने की अनुमति नहीं दी तो बिना अनुमति के अमुवि के गेट पर शूट करने का क्या मतलब निकलता है? किसी गैर-संवैधानिक मुद्दे पर बात करने के लिए गैर-संवैधानिक तरीके का अपनाया जाना कहां तक सही है?

चौथा सवाल- ट्रिपल तलाक़ जैसे मसले पर जानकारों की राय ज़्यादा मायने रखती है या एक 10th और 12th स्टैण्डर्ड के छात्रों की राय? खासकर ऐसे माहौल में जब अमुवि के किसी भी छात्र की कोई भी व्यक्तिगत राय राष्ट्रीय समाचार में आने के बाद व्यक्तिगत नहीं रहती, उसे देशभर के मुस्लिम समुदाय के लोगों की राय की नज़र से देखा जाने लगता हो।

अगर हम अनुमति मिलने और ना मिलने वाली बात को दरकिनार कर भी दें तो भी एक और सवाल दिमाग में आता है। वो ये कि अगर मीडियाकर्मी, रिपोर्टर, एडिटर या एंकर की मंशा बिलकुल साफ़ थी और उनको मसले की बारीकियों को जानना था तो ट्रिपल तलाक़ पर जानकारी रखने वाले अर्थात डिपार्टमेंट ऑफ़ इस्लामिक स्टडीज, डिपार्टमेंट ऑफ़ वीमेनस स्टडीज या किस दूसरी ऐसी ही जगह क्यूं नहीं गए? या जहां के छात्र उन्हें बेहतर ढंग से बता पाते या उन छात्रों से संपर्क साधने की कोशिश क्यूँ नहीं की गई?

अब सबसे बड़ा सवाल ये है कि देश के सर्वश्रेष्ट शिक्षण संस्थानों में से एक, अलीगढ मुस्लिम यूनिवर्सिटी को सिर्फ ट्रिपल तलाक, या मुस्लिम समुदाय से जुड़े मुद्दों पर ही क्यूं पूछा जाता है? देश की पालिसी मेकिंग पर अमुवि की राय जानने कितने पत्रकार आते हैं? देश के विकास में मुसलमानों की भागीदारी, देश की कानून व्यवस्था, आर्थिक, सामाजिक, सांस्कृतिक और राजनीतिक मुद्दों पर अमुवि की राय क्यूं नहीं ली जाती? अमुवि को देश के अन्य मसलों में दरकिनार क्यूँ कर दिया जाता है?

शोध के क्षेत्र में किये गए कार्यों पर अमुवि के छात्रों का ओपिनियन क्यूं नहीं लिया जाता? पिछले साल हुए विमुद्रीकरण पर कितने चैनल्स (एक दो चैनल्स को छोड़कर शायद किसी ने नहीं ) ने यहां के छात्रों या शिक्षकों से बात की? अमुवि का योगदान भारत के मुस्लिमों के साथ-साथ देश के हर नागरिक के लिए बराबर रहा है, अमुवि भी देश के बाकी मसलों में उतना ही भागीदार है जितना बाकि दूसरे शिक्षण संस्थान हैं, लेकिन अफ़सोस कि हमारा मीडिया इस चीज़ से कोसों दूर है।

Youth Ki Awaaz is an open platform where anybody can publish. This post does not necessarily represent the platform's views and opinions.