हर सवाल का जवाब मिल रहा है

Posted by Saurabh Agarwal
August 17, 2017

Self-Published

अपने फेसबुक की न्यूजफीड पर जाइये। 25 में से 9 पोस्ट आपको ऐसे मिल जाएंगे जो किसी मीम के रूप में आपसे सवाल करते नजर आएंगे। ऐसे पोस्ट जो आप ही को बताएंगे कि आपने अपने बचपन में स्कूल कॉलेज में क्या क्या किया। अगर आपने भी ठीक वैसा ही किया है तो बताइये और साथ में अपने ऐसे ही दूसरे दोस्तों को भी टैग कीजिये। कुछ पोस्ट तो सीधे आपको बेवकूफ बताके चैलेंज करेंगे कि इस सवाल का जवाब तो 90% लोग गलत ही देंगे और अद्भुत है कि आप फौरन अपने आप को 10% में शामिल साबित करने की होड़ में जुट जाते हैं। पता नहीं कहाँ कहाँ से लड़कियों की फोटो पोस्ट करके पूछते हैं कि मैं कैसी लगती हूँ। ऐसे तमाम पोस्ट पर अच्छे खासे जवाब भी मिलते हैं।

ऐसे सवालों के जवाब देना हर कोई अपना धर्म समझता है। आप भी जवाब क्यों नहीं देंगे भला, जिस सवाल का आपको जन्मों से इंतजार था वो सवाल आज आपसे सीधा पूछा जा रहा है आप जवाब देंगे कैसे नहीं। जो दिखाई दे उसके पीछे का सच, ये आपको ध्यान में रखके लगातार आपकी ही पसंद के सवाल पूछे क्यों जा रहे हैं? और फिर इसमें उनका छोड़िये कम से कम आपका क्या फायदा?

वास्तव में ये सवाल कोई जवाब तलाशने के लिए नहीं किये जाते। अब तो जवाब देने वालों की अक्ल और सहूलियत के हिसाब से ही सवाल किए जाते हैं। ऐसे सवाल के करने का क्या फायदा कि जिसका जवाब भी न हो। इसलिए अब जवाब की भरमार है, सवाल पूछने की देर है जवाबों की कतार लग जाती है।

सवाल करने वाले कि मंशा जवाब पाना नहीं बल्कि जवाब देने वालों को नंगा करने की लगती है। दिखाई जो देता है उसके पीछे का सच यही है।

वो उकसाते हैं ताकि आप गाली दें। आपको डर लग रहा है और गुस्सा भी। लेकिन इस पर्दे के पीछे आपका डर भी तो छुप जाता है। वो बार बार उकसाते हैं ताकि आप बार बार जवाब दें। गाली दें। जैसे इससे किसी का फायदा ही हो रहा हो। किसी का फायदा? किसका फायदा? फायदा हो किसका सकता है? किसी का फायदा तो होगा ही। दिखाई दे उसके पीछे का सच। लेकिन राजनीतिक दल ऐसा क्यों करेंगे भला। उन्हें इससे क्या फायदा? ओह। राजनीतिक दल सच में। उन्होंने कभी रोका भी तो नहीं न। हाँ वाकई।

राजनीतिक दल जो अपनी पुकार से कोई व्यापक आंदोलन ही खड़ा कर दें, वो तो खुद ट्विटर ट्रेंड की होड़ में लगे हुए हैं। अगर राजनीतिक दल आपको नहीं रोक रहे तो सवाल है कि वो आपको हीरो क्यों बनने दे रहे हैं? देखा यहाँ भी सवाल आ गया। आपसे टेलीविज़न, सोशल मीडिया हर माध्यम से देशहित की खातिर सब कुछ छोड़ के व्यापक कदम उठाने को कहा जा रहा है। आपको हीरो बनने का सपना बेचा जा रहा है। अब आपने अपना फायदा तो सोचा नहीं तो फिर से एक सवाल का जवाब दीजिये कि राजनीतिक दलों का ही क्या फायदा है इस में?

वाकई गजब का दौर है। हर सवाल का  जवाब मिल रहा है। कोई प्रश्न अनुत्तरित नहीं। आप पूछ के तो देखिए। कमाल है न।

यकीन नहीं तो अपनी कोई जैसी तैसी सी फ़ोटो लगा के पूछ लीजिए कि मैं कैसा लग रहा हूँ। आपकी पोस्ट पर जवाबों की झड़ी लग जायेगी।

हर कोई इतना कॉंफिडेंट है। लेकिन फिर वही दिखाई दे उसके पीछे का सच। जब सब के सब ही इतने निश्चित हों तो समझिए कि कुछ भी सही नहीं है।

आपके अंदर किसी प्रोफेशनल पत्रकार के जैसा कॉन्फिडेंस भर दिया गया है। गुरु अभी पूछते हैं एक ठो धाकड़ क्वेश्चन, देखो कैसे पोस्ट को चैट बॉक्स बना देते हैं। फिर इतिहास भूगोल जीके संस्कृति राजनीति सब उसी में उड़ेल के कैसे युद्ध का आरंभ करते हैं।

कॉन्फिडेंस की तलाश किसको नहीं होती। लेकिन कहाँ से आ रहा हैं ये फर्जी बाजारू कॉन्फिडेंस। हर कोई स्वघोषित राष्ट्रनायक और राष्ट्रप्रमुख बना बैठा है।

चाहे आपने कैंडी क्रश में 50 लेवल पार कर लिया हो, सुडोकू के दस पजल एक कतार से सुलझा लिए हों, 4 फेसबुक पोस्ट हिट हो गयी हो, ऐसी कोई भी साधारण सी घटना भी आपके कॉन्फिडेंस को सातवें आसमान पे पहुंचा देती है। और फिर जैसे कंटेंट बनाना और उस पर रिस्पांस पाना आपके बाएं हाथ का खेल है। बस एक सवाल और खेल शुरू।

असल में आपको दिखाया जा रहा है वो जो आप चाहते हैं, लेकिन कुछ भी ऐसा  हुआ है जो आप वास्तव में चाहते हैं सिवाय उसके जो वो चाहते हैं। जो दिखाई दे उसके पीछे का सच, बाजार हमेशा होता है और व्यपार सतत चलता है। न आपके लिए ये बाजार बंद होगा न ही व्यापार रुकेगा। ये बाजार है इस बाजार में आपने क्या बेचा और क्या खरीदा? ये भी एक सवाल है।

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