1990 का कॉलेज

Self-Published

शायद मेरे इस तथ्य का कोई यकीन ना करे लेकिन माँ कहती है कि एक बार नाना जो की किसान थे अपनी फसल आढ़तिये को बेचने गये, जंहा आढ़तिये ने क्विंटल के हिसाब से कुल आनाज की बोरियो में से 10 बोरियो की गिनती कम कर के रसीद बना दी, जब घर आकर पता चला तो, नाना उल्टे पैर वापस शहर आढ़तिये के यहां दौड़ पड़े। मां यही तथ्य हर बार देती थी जब मेरा मन किताबो से उक जाता था, मां कहती थी कि शिक्षा एक ऐसा धन है जिसे कोई लूट नहीं सकता, चुरा नहीं सकता, जबरन छीन नहीं सकता मेरी मां के लिये शिक्षा का मतलब बहुत कुछ या यु कहु की सब कुछ था तो गलत नही होगा, क्योकि माँ ने गरीबी के साथ भूख और व्याज दोनों को देखा था। समाज की नींव एक नागरिक रखता है और यही समाज एक नागरिक को गढ़ता है, मसलन दोनों एक दूसरे पर निर्भर और अनुरूप है लेकिन 1989 और 1992 के बीच केंद्र में सरकार भी बिखरी हुई थी, मंडल कमीशन और अयोध्या का मुद्दा अपनी चरम पर था, 1984 की लगी आग में पंजाब  अभी तक झुलस रहा था, अब इस माहौल में शिक्षा का स्तर भी मजबूत नही रह सकता. इस समय की कुछ 5-6 फिल्मों के माध्यम से शिक्षा की परिस्थति का अध्ययन किया जा सकता है.

अमूमन, इस वक़्त हर फिल्म में नायक कॉलेज का ही स्टूडेंट होता था, और जो सब जगह हर फिल्म में सामान्य बात थी वह नायक को फिल्म में दिखाना, यँहा से ही शर्ट या टीशर्ट के कॉलर को खड़ा रखने का रिवाज शुरू हुआ था, और शर्ट की बाहों को ऊपर तक चढ़ा कर रखने का भी रिवाज अपनी चरम पर था जंहा एक नायक अपनी भुजाओ का, मतलब अपनी ताकत का प्रदर्शन कर सके, यँहा जीन्स की पेंट का रिवाज अभी शुरू ही हुआ था लेकिन इसे इतना टाइट पहना जाता था की जब नायक चलता था तो उसकी एक पलाग के बीच में से उत्तर और दक्षिण दिशाओ को देखा जा सकता था, यँहा कॉलेज जाने के लिये स्कूटर एक विकल्प था, लेकिन नायक कहाँ स्कूटर पर जचता है उसके लिये या तो मोपेड होती थी या हीरो हौंडा की सीडी 100 बाइक, लेकिन एक मजेदार तथ्य जो था की नायक कॉलेज में पढ़ने जाता था लेकिन इसकी कॉपी या नोटबुक को रखने का अपना एक ही अंदाज था, ये शर्ट को इन करके, जीन्स में एक चौड़ा सा बेल्ट पहनता था और पीछे पीठ की तरफ नोटबुक को जीन्स पेंट में टांगा होता था, मैंने कई बार कोशिश की इस नोटबुक में लिखने वाली कलम को भी देखु की नायक ने कहा रखा है पर हर वक़्त मुझे असफलता ही मिलती थी, मसलन कलम नायक नही रखता था, इस तरह की फिल्मों में नायिका भी होती थी लेकिन नाच गाने और रोने से ज्यादा इनका किरदार लिखा नही जाता था, सही अर्थों में आज भी नायिका का किरदार कहा लिखा जाता है ये अक्सर नायक के इर्द गिर्द ही घूमती रहती है.

इस तरह की फिल्मों की शुरुआत, न. चंद्रा द्वारा निर्देशित फिल्म तेज़ाब से हुई थी, जंहा मुख्य नायक अनिल कपूर था वही नायिका माधुरी दीक्षित, इस फिल्म का गीत एक दो तीन बहुत बहुत ज्यादा मशहूर हुआ था, कॉलेज के इर्द गिर्द घूमती ये फिल्म, की खासियत नोजवान ही थे जो एक टोले में अक्सर कॉलेज की कन्टीन में बैठे हुये मिलते थे, जंहा फिल्म का नायक लड़की को किस तरह पटाना है इसकी जानकारी देता है और इसे एक प्रयोग के रूप में भी दिखाता है, जँहा ये मंदाकनी के नजदीक जाकर माधुरी पर इर्षा का प्रभाव डालता है लेकिन जब माधुरी को इसी तथ्य का पता चलता है तो टुटा हुआ आशिक इसी कॉलेज की छत से ख़ुदकुशी करने की कोशीश करता है, फिल्म में शिक्षा नदारद है और बेरोजगारी और गुंडा गर्दी की भरमार है.

इसी दौर में, इसी सिलसिले को आगे बढाती फिल्म दिल आयी थी जिसका मुख्य नायक आमिर खान था और नायिका माधुरी दीक्षित, इंद्र कुमार द्वारा निर्देशित ये फिल्म भी कॉलेज और जवानी के इर्द गिर्द घूमती है, फिल्म में इसका नायक और नायिका हर वक़्त टशल में रहते है, इसी सिलसले में फिल्म का गीत भी है खम्बे जैसी खड़ी है लड़की है या छड़ी है, यँहा भी पढ़ाई गायब थी, इश्क ऐसा की कहानी मोड़ लेकर नायक और नायिका को घर से भागने के लिये मजबूर कर देती है, जँहा नायक एक बिल्डिंग में मजदूरी का काम करता है वही नायिका एक हैप्पी हाउस वाइफ के किरदार में बहुत खुश रहती है, इस फिल्म के और भी गीत मसलन हमने घर छोड़ा है, ये सभी गीत और ये फिल्म दोनों ही बहुत मशहूर हुये थे, इसका प्रभाव समाज पर भी इस तरह हुआ जँहा कई जोड़ो ने घर से भागने का जोखिम उठाया, जँहा बहुत सी जिंदगियां उभरने से पहले ही भुझ गयी वही हर चौराहे और नुक्कड़ पर इस फिल्म के गीत इतनी जोर से बजाये जाते थे की एक लड़की का रास्ते पर चलना मुश्किल हो गया था.

इसी सिलसिले को आगे बढ़ाती हुई चंकी पांडे और माधुरी दीक्षित की फिल्म खिलाफ आयी थी, यँहा बॉक्सिंग मैच में जीत का मतलब फिल्म की नायिका से बॉक्सिंग रिंग में किश करना था, फिल्म दिल में भी कुछ ऐसा ही था, इस फिल्म में भी एक गीत आज सनम मेरी जान चली बहुत मशहूर हुआ था, आगे इसी सिलसिले में अक्षय कुमार, आयशा जुल्का और दीपक तिजोरी अभिनीत फिल्म खिलाडी आयी थी, यँहा भी नायक और नायिका में टशल दिखाया गया, फिल्म का गीत भी इसी सिलसिले में है खुद को क्या समझती है इतना अकड़ती है कॉलेज में आयी इक नयी लड़की है,  फिल्म कॉलेज से निकलकर एक नया मोड़ लेती है लेकिन यँहा भी शिक्षा का कहि आस्तित्व भी नही दिखाया गया. इसी दौर में कुछ समय बाद अक्षय कुमार और सुनील शेट्टी की फिल्म वक़्त हमारा है. भी इसी तर्ज पर कॉलेज के इर्द गिर्द घूमती है.

अजय देवगन, की डेब्यूट फिल्म फूल और कांटे भी इसी सिलसिले को आगे बढ़ाती है, जिसमे मधु बतौर नायिका थी, इस फिल्म में अजय देवगन की एंट्री एक एक्शन हीरो के रूप में थी जँहा ये दो मोटर साइकिल पर पीछे खड़े होते है, जिन्हे कोई और चला रहा होता है वही थोड़ी आगे जाकर जब ये मोटर साइकिल के बीच का फर्क बढ़ जाता है तब अजय देवगन एक्शन स्टाइल में टांगो को फैला कर एक तरह का स्टंट करते हुये दिखाई देते है, लेकिन ये सब कॉलेज में आने वाले एक स्टूडेंट की एंट्री होती है, हम सोच सकते हैं कि कॉलेज का स्तर क्या होगा, इसी फिल्म में मधु की एंट्री होती है जँहा चहरे को दिखाने से पहले शरीर के अंगों पर कैमरा फोकस कर दिखाया जाता है,  ये फिल्म केबल पर आ रही थी जिसे हमारा पूरा परिवार देख रहा था, इस सीन के समय आप समझ सकते है हमैं किस शर्मिंदगी से होकर गुजरना पड़ा होगा, खेर फिल्म आगे बढ़ती है जँहा फिल्म का नायक कॉलेज के माइक्रो फोन पर गीत गाकर नायिका से अपने इश्क का इजहार करता है, फिल्म में कॉलेज में इश्क के सिवा और कुछ नही था.

जब व्यक्तिगत किरदार की गंभीरता को खत्म कर दिया जाता है, इसे हास्यस्पद बना दिया जाता है, जँहा इस तरह के किरदार को समाज और कही भी स्वीकृति नही मिलती, ये अपना स्थाम समाज में ढूढ रहे होते है, लेकिन इन्हे अक्सर इसमे नाकामयाब ही रखा जाता है, इसी तरह की छवि में एक कॉलेज का प्रोफेसर अमूमन हर फिल्म में दिखाया गया है, फिल्म फूल और कांटे का प्रोफेसर जगदीप बहुत हास्यस्पद है, मसलन शिक्षा को ये सारी फिल्म नकार रही है, वही बेरोजगारी, गुंडा गर्दी, बिखरती कानून व्यवस्था, भरस्टाचार का भरमार इन सभी फिल्मो में है, इश्क अपने जोबन पर है लेकिन शिक्षा के बिना समाज में अक्सर अँधेरा ही रहता है, यही हाल था इस समय के समाज का था, निराशा और बेरोजगारी अपनी चरम पर थी, व्यवस्था भी ज्यादा शिक्षा के प्रति गंभीर नही थी, 1997 में जब कॉलेज से पास हुआ तब MCA का एक ही कॉलेज था, मुझे आगे पढ़ना था लेकिन कॉलेज के आखरी साल में बीमार हो गया था, नंबर  कम आये, आगे पढ़ नही पाया पैसे भी नही थे और कॉलेज भी नही, फिल्म हीट हो रही थी और इसी आधार पर समाज की रचना भी हो चुकी थी.

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