अंतिम समय में दहेज की मांग बढ़ा दी गई और हमारी सारी जमा पूंजी उनके नाम कर दी गई

Posted by Shruti Sonal in Dowry, Hindi
August 5, 2017

ये बात 6 साल पहले की है, जब मैं चीज़ें समझने तो लगी थी लेकिन किसी मुद्दे पर मेरी कोई प्रभावशाली राय नहीं होती थी। बिहार स्थित मेरे गांव में तब मैं एक कज़न की शादी में गई थी। पूरे घर में शादी और उत्सव का माहौल था, घर की औरतें चर्चा कर रही थी कि कौन सी साड़ी पहनी जाए और मर्द इसी में उलझे रहते कि खाने के मेन्यू में क्या-क्या होगा। मैं अपना ज़्यादातर समय छत पर ही बिताती। शोर से दूर, आस-पास की खुली जगह को निहारते हुए जो दिल्ली में बमुश्किल ही देखने को मिलती थी। लेकिन शादी से एक हफ्ते पहले ही घर पर शादी का वो माहौल अचानक से फीका पड़ गया।

लड़के वालों ने अंतिम समय में दहेज की मांग बढ़ा दी। इससे सभी लोग सकते में आ गए। मेरी कज़न के पिता 2 साल पहले गुज़र चुके थे और उनके परिवार में कोई और कमाने वाला सदस्य भी नहीं था। अब परिवार के सभी लोग और मेरे दादा जी मिलकर ये सोचने लगे कि इस ‘समस्या’ को कैसे सुलझाया जाए। लड़के वालों से कई बार बात की गई लेकिन अंत में उनकी सभी मांगों को मानना पड़ा जो अक्सर सभी लड़की वालों के साथ होता है। जितनी भी बचत थी सभी को निकाला गया, एफ.डी. तोड़ दी गई, इस सब के बाद कोई भी खुश नहीं दिख रहा था।

मन ही मन में मैं इस समस्या से निपटने के ऐसे रास्तों के बारे में सोच रही थी जिनका वास्तविकता से दूर-दूर तक कोई नाता नहीं था। मैं समझ नहीं पा रही थी कि आखिर कैसे इस माहौल में शादी के बारे में सोचा जा सकता है? यही सोचते हुए मैंने मॉं से पूछा कि आखिर क्यूं हम इन लोगों को ना नहीं कह सकते? दहेज लेना गैरकानूनी है, हम सभी ये जानते हैं। लेकिन उन्होंने जो जवाब दिया वो सुनकर मैं हैरान थी- “हम ना नहीं कह सकते क्यूंकि अगले और उसके बाद के रिश्तों में भी यही सब होगा।” वैसे भी मेरी कज़न की हालत किसी एक्टिव टाईम बम की तरह ही थी, वो 29 साल की जो हो चुकी थी। किसी ‘अच्छे घर’  में लड़कियों के लिए शादी की ‘सही उम्र’ को तो वो कब का पार कर चुकी थी।

उसके ऊपर समस्या ये कि वो खूबसूरती के तय कर दिए गए पैमानों पर भी खरी नहीं उतरती थी। बहुत सारे लोगों ने तो उसका फोटो देखकर ही रिश्ता ठुकरा दिया। घर में सबसे बड़ी होने के कारण उसे पढाई छोड़ने पर मजबूर किया गया ताकि वो ‘परिवार’ के बाकी लोगों का खयाल रख सके।

अन्य लोगों पर निर्भर होने के कारण अपने सपनों की शादी के खयाल को तो वो कब का अपने मन से निकल चुकी थी। एक और छोटी बहन भी तो शादी के लिए तैयार बैठी थी! यह एक ऐसी कड़वी हकीकत थी जो हमें स्वीकार करनी पड़ी, एक ऐसी हकीकत जो पिछली कई पीढ़ियों से मौजूद है और शायद आने वाली पीढ़ियों में भी रहेगी।

शादी के दिन से पहले ही दहेज का सारा सामान पैक करके लड़के वालों के घर पहुंचाया गया। ट्रक में सामान लादने से पहले ये सारा सामान एक जगह पर रखा गया, ताकि आस-पड़ोस की महिलाएं आकर देख सकें। सब सामान चेक हो जाने के बाद सभी ने सर हिलाकर मानो सहमति जताई कि हां! अब सब ठीक है। और इस तरह हमारे परिवार की ‘प्रतिष्ठा’ समाज में बरकरार रही। गाजे-बाजे के साथ शादी का जश्न एक बार फिर शुरू हो गया। दोनों परिवारों के सम्बन्ध और बेहतर हुए जब मेरी कज़न ने एक स्वस्थ ‘लड़के’ को जन्म देकर उसकी सास की इच्छा को पूरा किया। इस तरह ये शादी बिना किसी ख़ास परेशानी के एक ‘सफल’ शादी साबित हुई, कम से कम समाज की नज़रों में तो ये सफल थी ही।

यहां लिखने का मेरा मकसद दहेज की समस्या पर एक गंभीर लेख लिखना नहीं है, बल्कि ये बताना है कि दहेज अतीत की बात नहीं है। ना ही ये किसी विशेष इलाके, जाति या वर्ग तक ही सीमित है। शिक्षित होने के बाद भी दकियानूसी सोच और सामाजिक दबाव मौजूद रहता है, यहां बता दूं कि मेरी कज़न के पति एक पत्रकार हैं।

इस तरह की कुप्रथाओं के चलते ना केवल लड़कियों को एक बोझ समझा जाता है बल्कि उन्हें जन्म से पहले ही मार दिए जाने यानि कि भ्रूणहत्या के पीछे भी इसकी प्रमुख भूमिका है। साथ ही मनचाहा दहेज ना मिलने पर लड़कियों की हत्या करने को कैसे भुला जा सकता है? ये एक ऐसी समस्या है जिसके मूल में भ्रूणहत्या, पितृसत्ता और सामाजिक औहदे के दिखावे जैसी कई समस्याएं छुपी हुई हैं। अब ये ज़रूरी है कि इससे निपटने के ऐसे तरीके खोजे जाएं जो किताबी और कानूनी बातों से हटकर ज़मीनी समाधान के करीब हो।

यह लेख अंग्रेज़ी में पढने के लिए यहां क्लिक करें।

Youth Ki Awaaz is an open platform where anybody can publish. This post does not necessarily represent the platform's views and opinions.

[mc4wp_form id="185350"]