बस चुनाव जीतना ही है BJP का शासन, वचन और विकास

Posted by KP Singh in Hindi, Politics
August 23, 2017

भाजपा की रणनीति बहुत कुछ साफ हो चली है। साफ-सुथरी राजनीतिक व्यवस्था बनाने और तार्किक विकास को गति देने की चुनौती के मामले में उसने आखिर हार मान ली है। आप चाहे जितने हक पर हों लेकिन भारतीय समाज में लड़ाई जीतने के लिए इतना पर्याप्त नहीं है। साम, दाम, दंड, भेद हर तरह के पैंतरे अपनाने पर ही भारतीय समाज में विजय संभव है। यह धारणा भगवान श्रीकृष्ण के ज़माने से कायम है, इसलिए हक की लड़ाई के योद्धा कामयाबी पाने के लिए, दूसरे का हक छीनने में किसी तरह का धर्मसंकट अनुभव नहीं करते।

गुजरात में राज्यसभा की तीन सीटों के लिए हुए चुनाव में यह बात बहुत स्पष्टता के साथ उजागर हुई। भाजपा गुजरात में राज्यसभा की दो सीटें जीतने की स्थिति में थी, लेकिन तीसरी सीट जीतने के लिए उसने ज़बरदस्ती की। इसका सुख भाजपा को तब और ज़्यादा महसूस हो रहा था जब यह दिखाई दे रहा था कि अगर कॉंग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी के राजनीतिक सलाहकार अहमद पटेल हारे तो कॉंग्रेस की ज़्यादा बड़ी बेईज्ज़ती होगी। इस जीत को सम्भव बनाने के लिए भाजपा ने सारी मर्यादाएं तोड़ डाली।

पहले तो गुजरात कॉंग्रेस विधायक दल में प्रलोभन देकर तोड़फोड़ कराई गई। इसके बाद भी काम नहीं बना तो कर्नाटक के जो कॉंग्रेसी मंत्री गुजरात के पार्टी विधायकों को सुरक्षित पनाहगाह उपलब्ध करा रहे थे उनके यहां आयकर की ताबड़तोड़ छापेमारी हुई। यह लिखने का मकसद संबंधित मंत्री को क्लीनचिट देना नहीं है, लेकिन गुजरात में राज्यसभा के चुनाव के समय ही इस तरह की तेज़ी क्यों दिखाई गई? उक्त चुनाव के नतीजे आने के बाद भ्रष्टाचार के महासमुद्र में स्वच्छता के स्वप्निल द्वीप खोजने में जुटी केंद्र सरकार के कोलम्बस कहां लापता हो गए? इसका हिसाब तो आखिर उनको देना ही चाहिए।

जब कोई कार्रवाई समग्रता में होती है तो उंगली उठाने की मंशा रखने वाले कमज़ोर पड़ जाते हैं, लेकिन सेलेक्टिव कार्रवाई, व्यवस्था के कर्ताधर्ताओं की मंशा को संदेह के घेरे में ला खड़ा करती है। भाजपा की सरकारों की कार्यशैली इसी विरोधाभास को इंगित करने वाली है। उत्तर प्रदेश में गुंडागर्दी की राजनीतिक शैली इस इंतहा तक थी कि भाजपा नेताओं का खूनी दमन करने में भी कसर नहीं छोड़ी गई थी। पश्चिम बंगाल के राज्यपाल केशरीनाथ त्रिपाठी इसको ज़्यादा अच्छी तरह से बता सकते हैं, क्योंकि उत्तर प्रदेश विधानसभा के अध्यक्ष रहते हुए उन्हें भी राजनीतिक हिंसा का शिकार होना पड़ा था।

विधानसभा के अंदर उस समय तांडव मचाने वाली राजनीतिक ताकतें आज भाजपा नेतृत्व के लिए आदर और श्रद्धा का पात्र बनी हुई हैं। नेताजी (मुलायम सिंह यादव) महान नेता हैं, यह सोच उनसे अनाधिकृत रूप से उनको उपलब्ध सरकारी गाड़ी छीनने में बाधक बन जाती है। नेताजी लोकसभा में जब भाषण देते हैं तो भाजपा के नेता दत्तचित्त शिष्य की तरह उन्हें सुनने में गौरव अनुभव करते हैं।

इस दौरान कई सांसद ऐसे थे जिन्होंने अयोध्या में 1990 में कारसेवा के दौरान नेताजी की पुलिस की गोलियां झेली थीं। वे राम को अपना आराध्य मानते हैं और उनके लिए प्राण तक होम कर देने में गौरव अनुभव करने की बात कहते हैं। इसलिए उनका कहना था कि रामभक्तों पर गोली चलाने वाले नेताजी उनकी निगाह में कभी माफ नहीं होंगे। पर तमाम कार्यकर्ताओं को इस तरह की गप्पबाजी से भावुक बनाकर सूली पर चढ़ने के लिए तैयार करने वाले भाजपा के फर्ज़ी भक्त आखिर उनके संहार का पुनीत कर्तव्य निर्वाह करने वाले नेताजी के भक्त हो गए हैं। कितना क्रांतिकारी परिवर्तन है यह।

उत्तर प्रदेश विधानसभा के हालिया चुनाव के पहले भाजपा के हलकों में पार्टी के लोगों की ज़मीन-जायदाद पर सत्ता के जोर पर सपाइयों का कब्ज़ा सबसे बड़ा मुद्दा था। इसलिए योगी सरकार ने पदारूढ़ होने के बाद सर्वोच्च प्राथमिकता में इस वायदे को शामिल किया कि सपा के दबंगों द्वारा किए गए अवैध कब्ज़ों को त्वरित गति से खाली कराकर उनके खिलाफ ऐसी कार्रवाई की जाएगी जिससे नज़ीर कायम हो। लेकिन योगी सरकार अब इससे मुंह चुरा रही है। अगर उसे शिवपाल सिंह के अंदर बहुत गुण दिखने लगे हैं तो फिर उसे बताना होगा कि कब्ज़ा कराने वाले माफियाओं की शिनाख्त करने की उसकी परिभाषा क्या है?

मुलायम सिंह जब पहली बार मुख्यमंत्री बने थे तो अपने गृह राज्य में अपनी ही पसंद के एसएसपी बृजलाल को उन्होंने किस कारण से निलंबित किया था, यह किस्सा लोगों को अभी भी याद होगा। तब ज़मीन कब्ज़े का ही मामला था, जिसमें शिवपाल के इनवॉल्व होने की बात सामने आयी थी। छपा था कि कब्ज़ा करने वाले शिवपाल समर्थकों को जब पुलिस ने बंद किया तो शिवपाल हवालात से उन्हें जबरन छुड़ाकर ले गए। इसके बाद जब शिवपाल पर बृजलाल ने कार्रवाई करने का इरादा जताया तो उनको उन्हें नौकरी से मंसूख करने के साथ-साथ उनके ज़िंदगी के सफर को रोकने का ताना-बाना भी बुना गया।

बृजलाल आज बीजेपी में हैं और चुनाव के पहले ही बीजेपी में शामिल हो गए थे। तब सपा से त्रस्त होने के कारण भाजपा नेता उद्वेलित थे और बृजलाल को हीरो के रूप में पेश कर रहे थे। लेकिन आज भाजपाइयों के हीरो शिवपाल हैं और अपने हीरो को दुखी ना करने के लिए उन्होंने बृजलाल को हाशिए पर धकेल रखा है। एकाध प्लॉट पर कब्ज़ा जमाने को आधार बनाकर लोग माफिया के रूप में चिन्हित किए जा रहे हैं ताकि आंकड़ों की बाज़ीगरी से अपने वायदे के अमल में ईमानदारी का दिखावा भाजपा कर सके। क्या यह बात लोगों की निगाह से ओझल है।

भाजपा अव्यक्त तौर पर जनमानस में यह स्थापित कर रही है कि साफ-सुथरी व्यवस्था के लिए दोटूक लड़ाई लड़ने का हौंसला असम्भव है, इसलिए लोग भाजपा से अपेक्षा ना करें। भाजपा ने लोगों से दूसरे वरदानों का वायदा किया है, वे अपना ध्यान उन्हीं वरदानों में केंद्रित करें। इन वरदानों में भारत को अमुक संप्रदायमुक्त बनाना और आरक्षण के दंश से निजात दिलाना शामिल है। यह काम हो सके इसके लिए भाजपा को सत्ता में बनाए रखना ज़रूरी है और जिसके लिए भाजपा जो भी स्याह-सफेद करे, लोग उसके बारे में आलोचकों की प्रतिकूल टिप्पणी को कोई तवज्जो ना दें।

इसीलिए तमाम सरकारी एजेंसियों और संस्थाओं की सत्ता को बनाए रखने के लिए दुरुपयोग को लेकर भाजपा जो आलोचना करती थी, आज सत्ता में आने पर वह उसी नीति को अमल में ला रही है। बिहार में गठबंधन तुड़वाने के लिए मीसा और तेजस्वी के ठिकानों पर ताबड़तोड़ छापेमारी कराई गई, लेकिन जैसे ही नीतीश भाजपा शरणम गच्छामि हुए उसके बाद इस मामले में उत्साह को फना कर दिया गया। इस सीरियल के गुजरात एपीसोड के बाद भाजपा का असल चेहरा और ज़्यादा उभरकर सामने आया है।

कोई देश और कौम जो लंबे समय तक गुलाम रहती है, आज़ाद होने के बाद भी उसकी गुलामी से जुड़ी ग्रंथियां खत्म नहीं हो पातीं। भाजपा ने जनमानस की इसी कमज़ोर नब्ज़ पर हाथ रखकर अपनी सफलता का ताना-बाना बुना है। सुशासन और अच्छे काम के चक्कर में पड़ने के बजाय भाजपा मनोवैज्ञानिक तरीके से लोगों को अपने समर्थन के लिए बाध्य करने का परिवेश रच रही है। एक ज़माने में कॉंग्रेस ने भी यही किया था कि उसको हराया नहीं जा सकता, इसलिए कई दशकों तक उसने राज किया। भाजपा भी साम, दाम, दंड, भेद से अपने को ऐसी ही करिश्माई पार्टी के रूप में पेश करने में लगी है, जिसे हराया नहीं जा सकता।

भाजपा को अभी 50 प्रतिशत से बहुत कम लोगों का समर्थन हासिल है, इसलिए अगर विपक्ष एकजुट होकर उसका मुकाबला करे तो भाजपा के पैर उखड़ सकते हैं। भाजपा यह सम्भव ना होने देने के लिए अपनी पूरी ऊर्जा विपक्षी एकता को छिन्न-भिन्न करने में लगा रही है। उसने सरकारी एजेंसियों के दुरुपयोग को इस स्वार्थ साधन का सबसे बड़ा औज़ार बनाया है।

इसी का नतीजा है कि मायावती अब विपक्ष के महागठबंधन से कतराने की मुद्रा अपना चुकी हैं। पटना में इस महीने के अंत में लालू द्वारा बुलाई गई विपक्ष की संयुक्त रैली में भाग लेने से अनमनापन दिखाकर उन्होंने ज़ाहिर कर दिया कि वे किस कदर भाजपा के दबाव में हैं। इसके पहले शरद यादव द्वारा दिल्ली के कांस्टीट्यूशन क्लब में आयोजित भारत बचाओ सेमिनार में भी वे नदारद रही थी, जबकि उक्त सेमिनार में राहुल गांधी ने बहुत समय बाद लाजवाब भाषण दिया था। उन्होंने कहा था कि इस देश में दो तरह के लोग हैं। एक भाजपा के लोग, जो कहते हैं कि यह देश हमारा है इसलिए मुसलमान, दलित इस देश से भाग जाएं। दूसरे हम लोग हैं जो कहते हैं कि हम इस देश के हैं इसलिए देश को एकजुट बनाये रखने के लिए वे जितनी भी ज़रूरत होगी उतना ज़्यादा झुकने में कोई कोताही नहीं बरतेंगे।

मायावती ही नहीं, कई और विपक्षी दल भी महागठबंधन की उक्त कवायद से नदारद रहे थे। इससे मीडिया को यह कहने का मौका मिल गया कि भाजपा इतनी अदम्य हो चुकी है कि उसका मुकाबला अब कई वर्षों तक सम्भव नहीं है। यहां तक कि उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी भी इस मामले में ढुलमुल है। मुलायम सिंह और शिवपाल तो परोक्ष रूप में भाजपा का हितसाधन कर ही रहे हैं, अखिलेश भी कहीं न कहीं नरम हो गए हैं। शायद उन्हें अपने पिता की समझाइश हो, जो इतने कलाकार हैं कि ऊपरी तौर पर उनके खिलाफ अपने भाई को निभा रहे हैं लेकिन दरअसल वे अपनी दूसरी पत्नी, उनके पुत्र और अखिलेश को आय से अधिक संपत्ति जैसी किसी भी जांच की आंच से मुक्त रखने के लिए बहुत सचेत हैं। उन्होंने इसी मकसद से बुक्कल नवाब, यशवंत सिंह, सरोजनी अग्रवाल और अशोक वाजपेयी को भाजपा में निर्यात किया है, जबकि भाजपा में बाहरी नेताओं की आमद से समस्याएं पैदा हो रही हैं। उन्हें ज़्यादा भाव मिलने से गर्दिश के दिनों के भाजपाई कुंठा का अनुभव कर रहे हैं।

कुल मिलाकर यह तरीके गलत हैं। वीपी सिंह के आंदोलन के बाद भाजपा को अवसर देकर साफ-सुथरी राजनीतिक व्यवस्था की बाट एक बार फिर लोगों ने देखी थी, लेकिन भाजपा उसे पूरा करने में खरी साबित नहीं हो पा रही है। इसलिए अपराजेयता के आतंक से लोगों का समर्थन कबाड़ने की रणनीति पर उसका अमल है, जिससे लोगों का जल्द ही मोहभंग होना लाज़मी है।

Youth Ki Awaaz is an open platform where anybody can publish. This post does not necessarily represent the platform's views and opinions.

[mc4wp_form id="185350"]