आपकी हर परेशानी के लिए ज़िम्मेदार नहीं है देश का मुस्लिम समुदाय

Posted by Abhishek Naman in Hindi, Sexism And Patriarchy, Society
August 24, 2017

तीन तलाक पर सुप्रीम कोर्ट का फैसला आया। फैसला खुशी देने वाला है, क्योंकि इस तुरंत दिए जाने वाले तीन तलाक को गलत ठहराकर सुप्रीम कोर्ट ने मुस्लिम महिलाओं को एक अन्यायपूर्ण व्यवस्था से आज़ादी दिला दी। ये लाज़मी है कि इस फैसले से लोग खुश होंगे, लेकिन एक बात है जो स्वाभाविक नहीं है! क्या इस फैसले पर खुशियां मनाने वाला हर शख्स बराबरी के सिद्धांत में यकीन रखता है? क्या हर ऐसा शख्स स्त्री-पुरुष की एकता को मानता है? क्या हर एक ऐसा शख्स अपनी निजी ज़िंदगी में औरतों की आज़ादी में बाधा नहीं डालता है? क्या जो हिन्दू मर्द इस फैसले पर जश्न मना रहे हैं, उन्हें वाकई मुस्लिम महिलाओं से और उनकी मुसीबतों के प्रति चिंता है या फिर इस जश्न की वजह धार्मिक विद्वेष ही है?

दरअसल हिन्दू समाज के एक बड़े वर्ग में ऐसी भावना कूट-कूट कर भर दी गई है, जिससे वे मुसलमानों को अपना वर्ग शत्रु समझें। मर्दवादी सोच की प्रधानता वाले हमारे देश में सुप्रीम कोर्ट का तीन तलाक पर आया फैसला भी हिन्दू मर्द की मुस्लिम मर्द पर विजय के तौर पर ही प्रचारित किया जा रहा है। और अगर आपको लगता है कि ऐसा नहीं है तो इस तीन तलाक के खिलाफ झंडा उठाए लोगों की पहली पंक्ति में आपको ऐसे लोग मिल जाएंगे जिनके मंच से सार्वजनिक तौर पर मुस्लिम औरतों के खिलाफ दोयम दर्जे की बयानबाज़ी हुई थी।

ऐसा माहौल बनाने की कोशिश हुई है कि जैसे मुस्लिम पुरुष ही सबसे ज़ालिम होते हैं और अपनी पत्नियों के साथ अमानवीय व्यवहार करते हैं। जबकि हिन्दू धर्म की महिलाओं की स्थिति कहीं से भी कम चुनौतीपूर्ण नहीं है। अक्सर राजनीतिक दल ध्रुवीकरण के लिए जनता को दो भागों में बांटने का काम करते हैं और इन्हें एक-दूसरे के खिलाफ खड़ा कर दिया जाता है। सभी महिलाओं के हित एक समान हैं, अब ऐसा तो है नहीं कि गरिमा और सम्मान से जीने का अधिकार केवल मुस्लिम महिलाओं को ही है और हिन्दू महिलाओं को नहीं!

जो भी लोग सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बहाने एक धर्म विशेष के प्रति नफरत फैलाने का काम कर रहे हैं, उनसे ये सवाल पूछे जाने की ज़रूरत है कि भाई तुमने महिलाओं की स्वतंत्रता को सुनिश्चित करने के लिए क्या किया है? या फिर तुम अपने जीवन में उतने ही स्त्रीवादी हो जितना इस मुद्दे पर हो? यकीन मानिए अगर ऐसे सारे लोग हकीकत में महिलाओं के अधिकारों के लिए इतने चिंतित होते तो आज ये मुल्क सही में महिलाओं के लिए जन्नत बन चुका होता।

ताज्जुब तो  ये है कि मेरे ऐसे दोस्त जो स्कर्ट तो छोड़िए, जींस पहनने को भी संस्कृति पर हमला मानते हैं और लड़कियों का एक से ज़्यादा मर्द से बात करना स्वीकार नहीं करते, वे भी तीन तलाक के मुद्दे पर नारीवादी हुए जा रहे हैं। एक सज्जन तो ऐसे भी मिले जो सती प्रथा को गौरवशाली अतीत मानते हैं और तीन तलाक पर बधाई बांट रहे थे।

हमें ये समझने की ज़रूरत है कि अगर आज हमारे देश में समस्याएं हैं तो ये किसी एक धर्म विशेष के लोगों की वजह से नहीं हैं। साफ लफ़्ज़ों में मुसलमान आपके हर मसले की जड़ नहीं हैं। इस सन्दर्भ में आजकल खूब शेयर किए जा रहे उस वीडियो का ज़िक्र बेहतर रहेगा, जिसे अमेरिका के युद्ध विभाग ने 1943 में हिटलर के खिलाफ प्रचार के लिए जारी किया था। इस वीडियो में हिटलर का उदाहरण देते हुए ये बताने की कोशिश की गई है कि कैसे कुछ लोग अपने फायदे के लिए जनता को बांट देते हैं। ये लोग जनता के एक वर्ग को ये बताने की कोशिश करते हैं कि देखो तुम्हारी सारी समस्याओं की जड़ वो दूसरा वर्ग है, हिटलर ने ऐसा ही यहूदियों के लिए कहा था। आज ट्रम्प अमेरिका में दूसरे देशों से आकर बसे हुए लोगों के लिए भी यही कह रहे हैं और भारत में मुस्लिमों के लिए भी ऐसा ही कहा जा रहा है।

एक आम हिन्दू के जीवन में तीन तलाक के खारिज होने से शायद रत्ती भर भी परिवर्तन ना हो, इससे उसके रोज़गार की संभावनाएं नहीं बदल जाएंगी लेकिन फिर भी वह उन्माद में चूर है, मानो उसे कोई खज़ाना मिल गया हो। महिलाओं की स्वतंत्रता के लिए प्रतिबद्धता काबिले तारीफ होती है, लेकिन यह भी ज़रूरी है कि नीयत साफ हो।

Youth Ki Awaaz is an open platform where anybody can publish. This post does not necessarily represent the platform's views and opinions.

हर हफ्ते Youth Ki Awaaz हिंदी की बेहतरीन स्टोरीज़ अपने मेल में पाने के लिए यहां सब्सक्राइब करें।