रेपिस्टों को सज़ा दिलाने सड़क पर उतरी छत्तीसगढ़ की महिलाएं खबर क्यों नहीं हैं

Posted by Saurabh Raj in Hindi, Sexism And Patriarchy
August 21, 2017

राष्ट्रीय मीडिया गायों की मौत की गिनती गिन रहा है। छत्तीसगढ़ के धमधा में एक भाजपा नेता द्वारा संचालित गौशालाओं में अब तक लगभग 290 गायों की मौत की पुष्टि की जा चुकी है। राजनीतिक गलियारों में बयानबाज़ी जारी है, भाजपा और संघ बैकफुट पर हैं। दावा ये भी किया जाता है कि यह संख्या 500 तक पहुंच सकती है, गायों की हत्या का शोर अब प्राइम टाइम तक पहुंच चुका है। ट्विटर पर ट्रोल्स अपने-अपने पक्षों के लिए काम पर लग चुके हैं। इस शोर के बीच धमधा से महज़ 40 किमी दूर छत्तीसगढ़ के बेमेतरा ज़िले में एक क्रूर बलात्कार की घटना सामने आई है।

घटना 9 अगस्त की है, उक्त महिला अपने देवर के साथ बाइक पर गांव जा रही थी। गांव जाते समय दो बदमाशों ने महिला को बंधक बना लिया। बाइक, मोबाइल, नगद पैसे सहित महिला का अन्य कीमती सामान लूट लिया। दोनो बदमाशों ने महिला को बंधक बनाकर देर रात तक उसके साथ बलात्कार किया। बदमाशों ने उसका वीडियो बनाया और उसे मानसिक रूप से भी प्रताड़ित करने में कोई कसर नहीं छोड़ी। महिला को डराने के लिए दोनों ने एक कुत्ते को तलवार से उसके सामने काट दिया और तस्वीर वायरल कर दी, ताकि महिला इस घटना की किसी से शिकायत ना करे। तब से महिला सदमे में है।

यह सिर्फ एक घटना नहीं है। इसी गांव में महीने भर पहले एक नाबालिग लड़की के साथ भी बलात्कार का मामला प्रकाश में आया था, जिसे पुलिस एवं प्रभावशाली व्यक्तियों के दबाव में दबा दिया गया। वहीं, दंतेवाड़ा में सीआरपीएफ के जवानों द्वारा छेड़खानी यौन उत्पीड़न का मामला सुर्खियों में रहा था। ऐसे कई मामले ना सिर्फ बस्तर में बल्कि छत्तीसगढ़ के अन्य शहरों-कस्बों में भी होते रहते हैं। यहां हर रोज़ एक निर्भया पैदा होती है, जिसकी आवाज़ को प्रशासनिक आतंकवाद दफ़न कर देता है।

पिछले दो वर्षों से छत्तीसगढ़ में बलात्कार की घटनाएं काफी बढ़ी हैं। विधानसभा में गृह मंत्री रामसेवक पैकरा ने एक सवाल के लिखित जवाब में बताया था कि राज्य में पिछले दो वर्षों में लगभग 3094 बलात्कार के मामले थानों में दर्ज हुए हैं। वहीं 2015 की एनसीआरबी की रिपोर्ट के मुताबिक आदिवासी महिलाओं के साथ बलात्कार के मामले में छत्तीसगढ़, देश में दूसरे नंबर पर है। ब्यूरो ने छत्तीसगढ़ को महिला सुरक्षा के लिहाज़ से देश में सबसे असुरक्षित करार दिया है। इसके पीछे स्वाभाविक कारण भी हैं। राज्य के गृहमंत्री कहते हैं कि रेपिस्ट सत्संग सुनें कुछ इसी तरह का बयान निर्भया मामले के समय (फिलहाल यौन उत्पीड़न के आरोप में जेल में बंद) आसाराम ने दिया था, जिस पर तब पूरी दिल्ली सड़क पर उतर आई थी और देशव्यापी विरोध हुआ था।

लेकिन नेताओं के ऊल जलूल बयानों के बीच बेरला की इस रेप सर्वाइवर महिला ने चुप ना रहने का फैसला किया। दिल दहला देने वाली इस हैवानियत के कारण गांव वाले और आसपास के लोग आक्रोश में आ गए। 16 अगस्त तक जब आरोपी को पुलिस हिरासत में नहीं लिया गया, तो हज़ारों की संख्या में ग्रामीण सड़क पर उतर आए। स्थानीय थानेदार ने मिलने और ज्ञापन लेने से मना कर दिया। थाने में उक्त महिला को बुलाकर एक लाख रुपये लेकर मामले को रफा-दफा करने का दवाब बनाया गया। इन सब कारणों से प्रदर्शनकारी ग्रामीण बेकाबू हो गए, खासकर महिलाएं सड़कों पर आ गई। इन्साफ और न्याय की गुहार लगाते ग्रामीणों पर पुलिस ने लाठीचार्ज किया और क्षेत्र में धारा 144 लगा दी गई। लगभग सौ से भी ज़्यादा लोगों को गिरफ्तार कर लिया गया।

हमारे देश में नारीवाद की परिभाषा सिर्फ बड़े शहरों में ही गढ़ी जाती है। छत्तीसगढ़ की यह महिला भी समाज के दवाब में चुप रह सकती थी, जैसा कि हम मजबूर कर देते हैं अक्सर ऐसे हालातो में लेकिन गांव-समाज की सोच के विपरीत इस महिला ने एक साहसिक कदम उठाया है। इस महिला ने ना सिर्फ तमाम महिलाओं को न्याय के लिए लड़ने की प्रेरणा दी है, बल्कि राज्य में हो रहे प्रशासनिक आतंकवाद का भी पर्दाफाश कर दिया है। गायों के लिए राज्य ही नहीं देशभर में विरोध-प्रदर्शन का दौर जारी है, लेकिन इस घटना पर सभी खामोश हैं।

इस मुद्दे पर सबकी खामोशी भयावह है। मीडिया की सुर्खियों से भी ये गायब है, क्योंकि यह किसी रसूखदार परिवार से नहीं है और ना ही इसे दिल्ली के तथाकथित नारीवादियों का कोई समर्थन है। महिलाओं और भारतीय संस्कृति की सुरक्षा के ठेकेदारों को सांप सूंघ गया है। केंद्र और राज्य की सरकार जश्न मनाने में व्यस्त है।

हालांकि ये कहना अतिश्योक्ति नहीं होगी कि इस महिला के हौसले और साहस ने, ऐसी तमाम महिलाओं को हिम्मत दी है अपनी आवाज़ उठाने कि लिए सच के लिए, न्याय के लिए और नारिवादिता की मूल परिभाषा को स्थापित करने के लिए।

 

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