भूटान में भी एक कड़वी हकीकत है महिलाओं के साथ हिंसा और यौन शोषण

यह लेख भूटान में महिलाओं के खिलाफ होने वाले लैंगिक भेदभाव पर आधारित है, जो भूटान के सर्वांगीण विकास की प्रक्रिया में उनकी स्थिति पर रौशनी डालता है। भूटान में महिलाओं की कुल संख्या वहां की आबादी का लगभग आधा हिस्सा है जो कि भेदभाव और शोषण से उपेक्षित है। भूटान में अधिकतर महिलाएं व्यापार तक पहुंच सहित कई अवसरों से वंचित हैं। उद्योग, लाभदायक रोज़गार, कौशल संसाधन, राजनीतिक प्रक्रिया और निर्णय लेने वाली संस्थाओं में उनका प्रतिनिधित्व ना के बराबर है।

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सरकारी पदों पर भूटानी महिलाओं की नियुक्ती बहुत सीमित है और अगर है भी तो क्लर्क, टाइपिस्ट या रिसेप्शनिस्ट जैसे बहुत छोटे पदों पर। दुनिया के अन्य देशों की महिलाओं की तरह वे भी यौन हिंसा और शोषण का सामना कर रही हैं। एशियाई देशों में भूटान में यौन शोषण की दर सबसे ऊंची है। महिलाओं के प्रति सामाजिक व्यवहार, पारंपरिक प्रथाओं और दृष्टिकोण ने महिलाओं के शोषण में सबसे ज़्यादा योगदान दिया है। कई महिलाओं को ऐसा लगता है कि हिंसा के पैदा होने की कुछ जटिल स्थितियां होती हैं, जो महिलाओं के काम की भागीदारी से जुड़ी होती हैं। इस कारण भूटानी महिलाओं में अपने दैनिक जीवन में आमतौर पर खुद को प्रभावित करने वाले मुद्दों से निपटने के विश्वास में कमी आई है।

भूटान अभी भी एक सामंती और निष्ठावान समाज है, इसलिए एक या अन्य रूप में महिलाओं के खिलाफ लैंगिक भेदभाव और शोषण की उपस्थिति, भूटान के सामंती समाज की मुख्य विशेषताएं है। यह लेख उस पितृसत्ता को उजागर करता है जो भूटानी समाज में मौजूद है। भूटान के चौथे राजा जिग्मे सिंग्ये वांगचुक ने भूटान के संविधान में राष्ट्रीय महिला एसोसिएशन की स्थापना की, जिसमें उन्होंने महिलाओं को समानता का अधिकार दिया।

भूटान की राजनीतिक प्रक्रिया में महिला तथा पुरुषों को समान माना जाता है। ऐसा अक्सर कहा जाता है, लेकिन तथ्य कुछ और ही कहते हैं। भूटान में राजनीतिक सहभागिता के रूप में महिलाओं की स्थिति काफी कमज़ोर है। 2010 में भूटान के कॉलेज में जेंडर और नेतृत्व को लेकर एक सर्वे हुआ जिसमें यह पाया गया कि 29% पुरुष, महिलाओं के प्रति होने वाले भेदभाव को महसूस करते हैं। इसी तरह भूटान के समाचार पत्र कुएन्सेल के अनुसार भी महिलाओं की निर्णय-निर्माण प्रक्रिया में सहभागिता ना के बराबर थी। ज़ाहिर है कि भूटान में लोकतंत्र की स्थापना के बावजूद भी महिलाओं को उच्च प्रतिनिधित्व नहीं मिल पाया है।

यदपि देखा जाए तो भूटान में अभी भी उन बुराईयों का प्रवेश नहीं हुआ है जैसा कि अन्य देशों में देखने को मिलता है। भूटान में महिला संगठनों का गठन क्रांति या अव्यवस्था फैलाने के लिए नहीं हुआ है अपितु उनके जीवन स्तर को ऊंचा करने के लिए हुआ है। भूटान में महिलाओं के ह्रदय व मन में पुरुषों के प्रति प्रतिशोध या आक्रोश का भाव उस तरह नहीं है, जैसा भारत में देखा जा रहा है। भूटान की महिलाओं में पुरुषों के प्रति प्रतिस्पर्धा का भाव भी नहीं है। वे तो सिर्फ राष्ट्रीय विकास में अपनी भागीदारी तय करना चाहती हैं। इस तरह भूटान में महिलाओं को लिंग आधारित भेदभाव जिसमें तस्करी, हिंसा, उत्पीड़न और कार्यस्थल पर धमकी जैसी समस्याओं का सामना करना पड़ता है। भूटान में यौन दुर्व्यवहार और भेदभाव पर आधारित कानून समान संरक्षण की गारंटी तो देता है, लेकिन स्पष्ट रूप से इस भेदभाव को समाप्त नहीं करता।

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