कुछ यूं बने भारत-पाकिस्तान बंटवारे के हालात (भाग-2)

1946 के चुनाव हो चुके थे, पंजाब में किसी भी पार्टी को पूर्ण बहुमत ना मिलने के कारण कॉंग्रेस और दूसरी पार्टियों की एक मिलीजुली सरकार अस्तित्व में आई। ख़ास बात ये थी कि अॉल इंडिया मुस्लिम लीग (AIML) सबसे ज़्यादा सीटें जीतने के बाद भी विपक्ष में थी। लेकिन बंगाल में AIML को पूर्ण बहुमत मिला और उन्होंने वहां सरकार बनाई। वहीं केंद्र में सरकार बनाने के लिये अंग्रेज़ हकूमत की ओर से लार्ड वावेल ने नेहरू और जिन्ना को पत्र लिखा और एक मिली जुली सरकार यानि कि इंटरिम गवर्नमेंट बनाने की पेशकश की।

लार्ड वावेल ने सरकार के गठन के लिये एक फॉर्मूला सुझाया कि कैबिनेट में कुल 14 मंत्री होंगे जिनमें कॉंग्रेस की तरफ से 6, मुस्लिम लीग की तरफ से 5 और बाकी 3 मंत्री अन्य अल्पसंख्यंक समुदाय मसलन सिख, ईसाई, जैन, बुद्ध, पारसी इत्यादि से हो सकते हैं। आगे लार्ड वावेल ने लिखा कि किसी भी पार्टी द्वारा सुझाए गये मंत्रीपद के उम्मीदवार का दूसरे दल विरोध नहीं करेंगे। सभी मंत्रालयों को समान रूप से कॉंग्रेस और AIML में बांटा जाएगा। लेकिन इस फार्मूला पर कॉंग्रेस और AIML दोनों ही ने अपनी असहमती जताई, नेहरू और जिन्ना ने इस फार्मूले को अस्वीकार कर दिया।

इस असमहती को तोड़ने के लिए अंग्रेज़ सरकार द्वारा कई असफल प्रयास किये गए और अंत में 06 अगस्त 1946 को नेहरू को सरकार बनाने के लिये आमंत्रित किया गया। AIML और जिन्ना को दरकिनार कर दिया गया था, इस सिलसिले में नेहरू ने वावेल से कहा कि उन्हे मुस्लिम लीग के लिए तय 5 मंत्रियों की जगह कॉंग्रेस के मुस्लिम नेताओं के नाम पेश करने का मौका दिया जाए। लेकिन वावेल ने इन 5 जगहों को खाली रखने का आग्रह किया।

24 अगस्त को ये सार्वजनिक किया गया कि 2 सितम्बर को अंतरिम सरकार बना दी जाएगी। 2 सितम्बर को कॉंग्रेस ने नेहरू के नेतृत्व में कैबिनेट का गठन किया जिसमें कॉंग्रेस की तरफ से 6 हिंदू नेताओं के नाम दिए गए। सरदार बलदेव सिंह को 3 अल्पसंख्यंक नेताओं में जगह दी गयी और 5 प्रस्तावित मुस्लिम लीग के नेताओं की जगह कॉंग्रेस के 3 मुस्लिम नेताओं को जगह दी गयी और बाकी दो मंत्री पद AIML के लिये खाली छोड़ दिये गए।

लॉर्ड वावेल के प्रस्ताव को ठुकराने के बाद जिन्ना और AIML ने पाकिस्तान की मांग को लेकर अंग्रेज़ सरकार पर दबाव डालने के लिए, डायरेक्ट एक्शन के आंदोलन को स्वीकृति दी। 29 जुलाई 1946 के दिन जिन्ना ने 16 अगस्त 1946 को डायरेक्ट एक्शन डे के रूप में मनाने की घोषणा की। जिन्ना ने देश के मुसलमानों से इस दिन सारे व्यापार और बाज़ारों को पूर्णरूप से बंद करने की अपील की, ताकि अंग्रेज़ सरकार पर पाकिस्तान की मांग को लेकर असरदार तरीके से दबाव बनाया जा सके।

इसी सिलसिले में मुस्लिम लीग ने कलकत्ता में एक रैली का आयोजन किया। इस दौरान बंगाल में मुस्लिम आबादी बहुसंख्यक थी, सरकार भी मुस्लिम लीग की थी लेकिन व्यपार और आर्थिक संसाधनों पर हिंदू समुदाय का अधिपत्य था। 16 अगस्त के दिन सुबह से ही कलकत्ता के लोगों में बेचैनी थी, इसका एक कारण यह भी था कि बंगाल में हिंदू और मुसलमान के बीच सांप्रदायिक दंगो का इतिहास बहुत पुराना और दिल दहलाने वाला है।

16 अगस्त के दिन मुस्लिम समुदाय सभी व्यापारिक संस्थानों को बंद रखने की कोशिश में था, वही हिंदू समुदाय अपनी दुकानें और दफ्तर खुले रखने की पुरज़ोर कोशिश में था। नतीजन शुक्रवार की सुबह जुम्मे की नमाज़ के बाद शहर में साम्प्रदायिक दंगे भड़क गए, 16 और 17 अगस्त 1946 को भड़की इस हिंसा में हज़ारों लोगो की जानें चली गई और कई हज़ार लोग घायल हुए।

इन्ही दंगो ने बाद में अक्टूबर-नवम्बर 1946 में ईस्ट बंगाल के नोआखाली और टिप्परा के साम्प्रदायिक दंगों की ज़मीन तैयार की। मुस्लिम समुदाय द्वारा इन दंगों में हिंदू समुदाय को बहुत ज़्यादा जान और माल का नुकसान पहुंचाया गया जिसके जवाब में इसी दौरान बिहार में हिन्दुओं ने मुस्लिमों को बहुत ज़्यादा नुकसान पहुंचाया। धर्म के नाम पर लगी ये आग अब रुकने का नाम ही नहीं ले रही थी।

02 सितंबर 1946 को नेहरू द्वारा अंतरिम सरकार के गठन और इसमें मुस्लिम लीग की अनदेखी के कारण AIML ने इस दिन को ब्लैक डे के रूप में मनाने की घोषणा कर दी। अंतरिम सरकार अस्तित्व में तो आ चुकी थी लेकिन धीरे-धीरे अंग्रेज़ सरकार को एहसास हो रहा था कि बिना मुस्लिम लीग के इस सरकार को अंतरिम सरकार नहीं कहा जा सकता।

दूसरे विश्वयुद्ध के बाद इंग्लैंड में आर्थिक मंदी चरम पर थी, लिहाज़ा अंग्रेज़ सरकार अपने अधीन तमाम देशों को आज़ाद करना चाहती। इसी के तहत यह नीति बन रही थी कि भारत को भी आज़ाद कर इस देश की बागडोर अंतरिम सरकार को सौंप दी जाए। इसलिए शांतिपूर्ण माहौल तैयार करने के लिए अंग्रेज़ हकूमत ने मुस्लिम लीग को भी इस अंतरिम सरकार में आने की पेशकश एक बार फिर की, जिसे जिन्ना ने मान लिया। जिन्ना ने पांच नाम सुझाए जो मंत्री परिषद में शामिल होंगे, उनमे एक जे.एन.मंडल भी थे जो एक हिंदू थे। इससे पहले कॉंग्रेस ने भी अपने 6 मंत्रियों में एक मुस्लिम को जगह दी जिनका नाम आसफ अली था।

अंतरिम सरकार में मुस्लिम लीग के शामिल हो जाने से राजनीतिक उठापटक का दौर शुरू हो गया था। ऐसा कहा जाता है कि नेहरू इस तरह मुस्लिम लीग का समावेश करने से खुश नहीं थे, वहीं जिन्ना भी यही कहते थे कि उनके मंत्री अंग्रेज़ सरकार के लिए जबावदेह हैं, ना कि नेहरू के लिए। बहरहाल कॉंग्रेस और मुस्लिम लीग के एक साथ आ जाने से ये कयास लग रहे थे कि आज़ाद भारत एक सम्पूर्ण भारत हो सकता है, लेकिन हिन्दुस्तान और पाकिस्तान के भविष्य को लेकर शंका अभी भी बनी हुई थी।

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