बुलेट ट्रेन से ज़्यादा ज़रूरी है रोज़ 2.30 करोड़ यात्रियों की जान की सुरक्षा

भारत में सबसे पहले रेल 1853 में दौड़ी थी, जबकि चीन में इसके 23 साल बाद यानी 1876 में। जब भारत आज़ाद हुआ तो भारत में रेल नेटवर्क की कुल लंबाई लगभग 55 हज़ार किमी थी, जबकि 1949 में चीन का रेल नेटवर्क सिर्फ 22,000 किमी ही था। लेकिन चीन आज भारत से काफी आगे निकल गया है।

दुनिया की सबसे तेज़ रफ्तार से चलने वाली रेलगाड़ी भी शंघाई मागलेव, चीन की है जिसकी अधिकतम रफ्तार 430 किलोमीटर प्रति घंटा दर्ज की गई। औसतन यह रेलगाड़ी 299 किलोमीटर प्रति घंटा तो दौड़ती ही है। हालांकि यह रेल बिना पहियों की है जो चुंबकीय ट्रैक पर चलती है। दूसरी तेज़ रेलगाड़ी भी चीन में ही चलती है। इसका नाम हार्मनी सीआरएच 380 ए है, जो बीजिंग से शंघाई के बीच चलती है। इसकी औसत रफ्तार 275 किलोमीटर है।

हाल ही में चीन ने बिना ड्राइवर के अपनी ट्रेन सफलतापूर्वक चलाकर दुनिया को चौंका दिया।  चीन की तुलना में भारत की रेलगाड़ियों की गति बेहद कम है। भारत ने अपनी सबसे तेज़ ट्रेन गतिमान एक्सप्रेस को 160 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार से दौड़ाया है। देश की दूसरी सबसे तेज़ चलने वाली ट्रेन भोपाल शताब्दी है जोकि 150 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार से दौड़ी है लेकिन औसतन 91 किलोमीटर प्रति घंटे की तेज़ी से चलती है। फिलहाल भारतीय रेल गाड़ियों को 200 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार से चलाने की योजना पर काम कर रहा है।

यह तो बात हुई तेज़ गति की लेकिन भारतीय रेल प्रणाली सुरक्षा के सिलसिले में भी बेहद लचर दिखाई देती है। इसकी जांच कोई भी नागरिक रेलवे स्टेशन जाकर कर सकता है। यहां कई टिकट खिड़कियां दिखाई देती हैं। लेकिन उनमें से कुछ खिड़कियों के पीछे ही कर्मचारी मौजूद होते हैं बाकी खिड़कियों के मुंह पर बंद होने का गत्ता लगा होता है। असल में ज़्यादा खिड़कियां आम जनता की सहूलियत के लिए शुरू की गईं। ताकि टिकट के लिए लंबी लाइने न लगें। लोग फ्रस्टेट न हों। कई बार लाइन इतनी लंबी होती है कि लोग बेटिकट यात्रा को मुफीद समझते हैं। खिड़की के पीछे बैठा मुलाजिम भी काम के दबाव  से बेहद तनाव में होता है और रूखा व्यवहार करता है। लोग इसको सीधा कामचोरी समझते हैं। ठीक ऐसे ही कई बार ऐसा होता कि आपकी पूरी यात्रा के दरमियान टिकट निरीक्षक एक बार भी नहीं आता। ट्रेन में चोरी की बढ़ती वारदातों के पीछे रेलवे पुलिस बल में संख्या का अभाव है।

असल में एशिया का दूसरा सबसे बड़ा और दुनिया का चौथा बड़ा रेल नेटवर्क कर्मचारियों की भीषण कमी से जूझ रहा है। इसकी वजह से 2 करोड़ 30 लाख प्रतिदिन यात्रा करने वालों की जान जोख़िम में रहती है। बहुत सारे पद रिक्त चल रहे हैं। यात्रियों की संख्या बढ़ रही है लेकिन रेल में मुलाज़िमों की संख्या दिनों दिन घट रही है।

संसदीय समिति ने भी रेल मंत्री सुरेश प्रभु के सामने रेलवे में यात्रियों की सुरक्षा के साथ हो रहे खिलवाड़ को लेकर पिछले साल दिसंबर में नाराज़गी जताई थी। सुरक्षा से जुड़े करीब 1 लाख 25 हजार पद जिनमें गैंगमैन, पॉइंटमैन, पैट्रोलमैन, तकनीशियन और स्टेशन मास्टरों के खाली चल रहे हैं। इसका परिणाम यह हुआ कि 2016 में रेल के 67 बार पटरी से ही उतर गई। वहीं 2015 में 52 बार रेल बेपटरी हुई।  जिससे सैकड़ों लोग बेमौत मारे गए। हाल ही में उत्कल एक्सप्रेस मुज़फ़्फरनगर के पास हादसे का शिकार हो गई जिसमें 20 से ज़्यादा लोगों की मौत हो गई जबकि करीब 150 लोग घायल हो गए।

रेल किराए में कई बार कई तरह की बढ़ोत्तरी हुई है। टिकट रद्द कराने से लेकर प्लेटफॉर्म टिकट तक के दाम बढ़ाए गए हैं। लेकिन ट्रेनों की लेट लतीफी का आलम बरकरार है। कई रेल परियोजनाएं मंद गति से चलती हुई दम तोड़ रहीं हैं। चीन से लगती सीमा के पास कई रेल परियोजनाएं अधर में लटकी हैं जोकि सामरिक दृष्टि से भारत लिए नुकसान की स्थिति पैदा कर सकती हैं। युद्ध की स्थिति में चीन अपने बेजोड़ रेल नेटवर्क के ज़रिए सेना तक ज़रूरी साजोसमान पहुंचाने की स्थिति में है।  रेल मंत्रालय का कहना है कि हमारे पास फंड नहीं है। पिछले साल रेल मंत्री ने 1 लाख 20 हजार करोड़ रुपए की मांग वित्त मंत्रालय से की थी।

कुल मिलाकर भारतीय रेल को मुनाफे में लाने की सारी क़वायदें इसको गर्त में लेकर जा रही हैं। बेहतर होगा कि सरकार लोक कल्याणकारी राज्य की तरह व्यवहार करते हुए पहले तो रेल से लाभ कमाने का खयाल त्यागे। बल्कि अपनी प्रणाली को चीन के समकक्ष लाने के तेज़ी से प्रयास करे। तत्काल रिक्त पदों को भरा जाए। स्टाफ़ को ज़रूरी प्रशिक्षण दिया जाए। भारत का मेट्रो रेल मॉडल रेलवे में ज़रूरत के हिसाब से अपनाया जाए। लटकी परियोजनाओं को एक निश्चित समय-सीमा के भीतर पूरा किया जाए ताकि हम अपनी रेल प्रणाली पर शर्मिंदा होने की जगह गर्व कर सकें। आखिर भारतीय रेल देश की अर्थव्यवस्था की जीवन रेखा है।

कमाल की बात तो ये है कि 15 सितंबर को पीएम नरेंद्र मोदी और जापानी पीएम शिंजो आबे ने मिलकर भारत में पहले बुलेट ट्रेन नेटवर्क के निर्माण कार्य का शिलान्यास भी कर दिया। ये ट्रेन अहमदाबाद से मुंबई के बीच दौड़गी। लेकिन, सवाल उठता है कि क्या भारत अभी बुलेट ट्रेन चलाने के लिए तैयार है।

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