झूठे वादों को भूल, आदिवासी समुदाय को खुद ही लड़नी होगी हक की लड़ाई

Posted by Raju Murmu in Hindi, Society
August 26, 2017

भारत में सदियों से विभिन्न जनजातियां निवास करती हैं और इन जनजातियों की अपनी रीती -रिवाज़ ,परम्पराएं, पहनावे और भाषाएं हैं। प्रकृति प्रेमी और सरल स्वभाव के होने के कारण ये शहरी वातावरण में खुद को सहज महसूस नहीं करते हैं , अतः ये जनजाति समुदाय अपने कबीलाई क्षेत्रों में , वन क्षेत्रों और ग्रामीण परिवेश में रहना ज़्यादा पसंद करते हैं। यही कारण है कि भारत के सभ्य कहे जाने वाले समाज के लोगों को भारतीय जनजाति समुदाय के बारे में ज्यादा नहीं पता। जिस प्रकार से जंगल सिमटते जा रहे हैं , औद्योगीकरण बड़ी तेज़ी से हो रहा है, खनन व्यवसाय में तेज़ी आ रही है इससे जनजाति समुदाय बुरी तरह प्रभावित हो रहा है।

देश में ‘विकास’ तो हो रहा है लेकिन इसकी कीमत जनजाति समुदाय को विस्थापित होकर चुकानी पड़ रही है।

विकास के इस बयार में सभी ‘ जनजाति समाज ‘ स्वयं को व्यवस्थित करने की पुरज़ोर कोशिश कर रहा है। आदिवासी समाज प्रारम्भ से ही ‘कृषक समाज’ रहा है इस कारण व्यवसायिक और तकनीकी अनुभवों की कमी आदिवासी के आर्थिक विकास में रोड़ा साबित हो रही है। अब आदिवासी समाज को ‘प्रॉफिट’ और ‘लॉस’ के सिद्धांत को समझना बहुत ज़रूरी हो गया है। अतः अब नई पीढ़ियों के युवाओं को व्यवसायिक क्षेत्र और नए तकनीक को अपनाकर अपने समाज की ‘आर्थिक व्यवस्था ‘ को मज़बूत करना होगा।

पारम्परिक खेती और जंगलों पर आश्रित एवं अपने सीमित साधनो से संतुष्ट रहने वाले जीवट जीवन शैली जीने वाले जनजाति समुदायों को अब अपने कदम आगे बढ़ाने होंगे। सदियों से आदिवासी समाज के पास जल जंगल और जमीन का अधिकार रहा है लेकिन उनसे मिलने वाले लाभ से हमेशा ही वंचित रहे हैं। आज इनके पुरखों के धरोहर पर बाहरी लोगों का हस्तक्षेप बढ़ता ही चला जा रहा है।

आदिवासी समुदायों को अब भाषा और संस्कृति से भारत के लोगों को परिचय खुद कराना पड़ेगा और भारत के प्राचीन निवासी के रूप में अपने सम्मान और अस्तित्व की लड़ाई अब स्वयं करनी पड़ेगी। देश की सरकार जनजातियों की समस्या से अंजान नहीं है। लेकिन कोई ठोस कदम नहीं उठाने के कारण भारत के कुछ प्राचीन जनजाति समुदाय विलुप्तता के कगार पर हैं।

देश में एक तरफ जहां तेज़ी से जनसंख्या का बढ़ना जारी है वहीं देश की कई आदिम जनजातियां विलुप्त होने की कगार पर खड़ी हैं। स्थिति यह है कि आदिवासियों के नाम पर साल 2000 में बनने वाले झारखंड और छत्तीसगढ़ जैसे राज्यों में निवास करने वाली माल पहाड़िया, सौरिया पहाड़िया, असुर, बिरहोर और बिरिजिया, बैगा और कोरबा जैसी आदिम जनजातियों के अस्तित्व पर खतरा मंडरा रहा है। इसको लेकर मानवशास्त्रियों ने चिंता व्यक्त की है।

स्वास्थ्य सुविधाओं के अभाव, गरीबी, अशिक्षा, शिशु मृत्यु दर और प्रसव के दौरान महिलाओं की मौत के कारण झारखंड में निवास करने वाली माल पहाड़िया, सौरिया पहाड़िया, असुर, बिरहोर और बिरिजिया और छत्तीसगढ़ की बैगा, कोरबा और बिरहोर जैसी आदिम जनजातियों की जनसंख्या में गिरावट आ रही है।

केन्द्र सरकार द्वारा ” राष्ट्रिय जनजाति आयोग “ का गठन इसी उद्देश्य से किया गया था ताकि आयोग द्वारा जनजाति समुदाय के विकास और हक की रक्षा की जा सके। जिस प्रकार महाराष्ट्र, छत्तीसगढ़, मध्यप्रदेश, ओडिशा, झारखण्ड, जैसे जनजाति बहुल क्षेत्रों में आये दिन अखबारों में खबरे आती है वो बहुत दुखद है कि सभ्य कहे जाने वाले समाज के बुद्धिजीवी और प्रतिष्ठित लोग भारत के ‘जनजाति समुदाय ‘ पर होने वाली अमानवीयता पर चुप्पी साध लेते हैं। टीवी मीडिया अपने कर्तव्य से मुंह मोड़ कर केवल अपने मतलब के विज्ञापन और निर्थक खबरे निरंतर दिखाते रहता है।

अब मीडिया पर भरोसा करने की ज़रूरत नहीं बल्कि खुद आदिवासी समाज को अपना मिडिया खड़ा करने की ज़रूरत है। ताकि अपनी बात देश के एक-एक आवाम तक पहुंचा सके। आए दिन आदिवासी समाज के लोगों पर हो रहे अत्याचार को भारत की जनता तक पहुंचाया जा सके और सरकार से उनके नैतिक कर्तव्यों के प्रति ज़िम्मेवारी को याद दिलाया जा सके। भारत के दोनों सदनों द्वारा देश का भविष्य तय होता है तो माननीय ‘लोकसभा’ और ‘राज्यसभा’ के गणमान्य सदस्यों को देश की जनता के प्रति उनके कर्तव्यों को स्मरण दिलाया जा सके।

अनुसूचित क्षेत्रों के प्रति ज़िम्मेवारी प्रदेश के राज्यपाल और देश के प्रथम नागरिक “राष्ट्रपति “महोदय को आदिवासी क्षेत्र के विकास की ज़िम्मेवारी सौपी गई थी। लेकिन किसी भी राजनितिक दलों ने अपने अजेंडे में कभी आदिवासियों के विकास का मुद्दा नहीं रखाो। आदिवासी समुदाय के अपने विशेष क्षेत्र होने के बावजूद उनकी स्थिति किसी यायावर समाज की तरह हो गई * छत्तीसगढ़ राज्य के बस्तर क्षेत्र उसका उदाहरण है *

अब आदिवासी समाज को राज्य सरकार की मंशा स्पष्ट समझ मे आ रही है कि सरकार उनकी ज़मीन की रक्षा कतई करना नहीं चाहती है, क्योंकि जितनी भी भूमि का अधिग्रहण जिन भी कारणों से या मकसद से किया गया उसमें सबसे ज़्यादा आदिवासियों की भूमियों पर अधिग्रहण किया गया जिसमें विभिन्न व्यवसायिक कंपनियों को सरकार खुद ज़मीन मुहैया कर रही है।

यानी यह मान लिया जाए कि अब देश की सरकार भी आदिवासियों को उनके क्षेत्र से उजाड़ देना चाहती है ताकि उन ज़मीन के अंदर पाए जाने वाले कीमती प्राकृतिक संसाधनों पर कब्ज़ा कर सके। क्या यह संभव नहीं था कि आदिवासियों को उनके ज़मीन से निकलने वाले संसाधनों पर हिस्सेदारी बना कर उनके आर्थिक विकास का मार्गप्रस्थ किया जा सकता था।

यह कहां का न्याय है कि नई सभ्यता को बनाने के लिए किसी पुरानी सभ्यता को समूल नष्ट कर दिया जाए। यह तो क्रूरता की परिकाष्ठा होगी और गैरलोकतांत्रिक भी ।

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