मातृभाषाओं की अनदेखी कर विकास की उम्मीद करना एक बड़ी भूल है

Posted by Joga Virk in Education, Hindi, Society
August 30, 2017

भारतीय जीवन के बहुत ही महत्वपूर्ण क्षेत्रों में अंग्रेज़ी भाषा के दखल से भारत को बहुत भारी नुकसान हो रहे हैं। इस दखल का सबसे बड़ा कारण कुछ भ्रम हैं जो हमारे दिलो-दिमाग में बस गए हैं, या बसा दिए गए हैं। ये भ्रम हैं:-

1. अंग्रेज़ी ही ज्ञान-विज्ञान, तकनीक और उच्चतर ज्ञान की भाषा है।
2. अंग्रेज़ी ही अंतर्राष्ट्रीय आदान-प्रदान और कारोबार की भाषा है।
3. भारतीय भाषाओं में उच्चतर ज्ञान की भाषाऐं बनने का सामर्थ्य नहीं है।

लेकिन तथ्य बताते हैं कि ये धारणाएं केवल एक भ्रम हैं और इनके लिए कोई आकादमिक या व्यवहारिक प्रमाण हासिल नहीं है। इस सम्बन्ध में ये तथ्य विचारणीय हैं-

1. 2016 में विज्ञान की स्कूल स्तर की शिक्षा में पहले 40 स्थान हासिल करने वाले देशों में अंग्रेज़ी में शिक्षा देने वाले देशों के स्थान- पहला (सिंगापुर), सातवां (कनाडा), बारहवां (न्यूज़ीलैंड), चौदहवां (आस्ट्रेलिया), उन्नीसवां (आयरलैंड) और पच्चीसवां (अमेरिका) थे। इन अंग्रेज़ी भाषी देशों में भी शिक्षा अंग्रेज़ी के साथ-साथ दूसरी मातृभाषाओं में दी जाती है। 2002, 2006, 2009 और 2012 के भी कुछ यही रुझान थे।

2. एशिया के प्रथम पचास सर्वोतम विश्वविद्यालयों में एकाध ही ऐसा है जहां शिक्षा अंग्रेज़ी माध्यम में दी जाती है और भारत का एक भी विश्वविद्यालय इन पचास में नहीं आता है।

3. 17वीं सदी में (जब शायद ही कोई भारतीय अंग्रेज़ी जानता रहा होगा) दुनिया के सकल उत्पाद में भारत का हिस्सा 25% था। 1950 में दुनिया के व्यापर में भारत का हिस्सा 1.78% जो अब केवल 1.5% है। प्रति व्यक्ति निर्यात में दुनिया में भारत का स्थान 150वां है।

4. दुनिया भर के भाषा और शिक्षा विशेषज्ञों की राय और तजुर्बा भी यही दर्शाता है कि शिक्षा सफलतापूर्वक केवल और केवल मातृभाषा में ही दी जा सकती है।

5. चिकित्सा विज्ञान के कुछ अंग्रेज़ी शब्द और इनके हिंदी समतुल्य यह स्पष्ट कर देंगे कि ज्ञान-विज्ञान के किसी भी क्षेत्र के लिए हमारी भाषाओं में शब्द हासिल हैं या आसानी से प्राप्त हो सकते हैं: Haem – रक्त; Haemacyte – रक्त-कोशिका; Haemagogue – रक्त-प्रेरक; Haemal – रक्तीय; Haemalopia – रक्तीय-नेत्र; Haemngiectasis – रक्तवाहिनी-पासार; Haemangioma – रक्त-मस्सा; Haemarthrosis – रक्तजोड़-विकार; Haematemesis – रक्त-वामन; Haematin – लौहरकतीय; Haematinic – रक्तवर्धक; Haematinuria – रक्तमूत्र; Haematocele – रक्त-ग्रन्थि/सूजन; Haematocolpos – रक्त-मासधर्मरोध; Haematogenesis – रक्त-उत्पादन; Haematoid – रक्तरूप; Haematology – रक्त-विज्ञान; Haematolysis – रक्त-ह्रास; Haematoma – रक्त-ग्रन्थि।

भारतीय शिक्षा संस्थाओं का दयनीय दर्जा, विश्व व्यापार में भारत का लगातार कम हो रहा हिस्सा, भाषा के मामलों में विशेषज्ञों की राय और वर्तमान अंतर्राष्ट्रीय भाषा व्यवहार और स्थिति इस बात के पक्के सबूत हैं कि मातृभाषाओं के क्षेत्र अंग्रेज़ी के हवाले कर देने से अभी तक हमें बहुत भारी नुकसान हुए हैं। इससे ना तो हमें अभी तक कोई लाभ हुआ है और ना ही होने वाला है। भारत का दक्षिण कोरिया, जापान, चीन जैसे देशों से पीछे रह जाने का एक बड़ा कारण भारतीय शिक्षा और दूसरे क्षेत्रों में अंग्रेज़ी भाषा का दखल है।

यह सही है कि वर्तमान समय में विदेशी भाषाओं का ज्ञान आवश्यक है। पर यहां भी तजुर्बा और खोज यही साबित करते हैं कि मातृभाषा के माध्यम से शिक्षा हासिल करने वाला और विदेशी भाषा को एक विषय के रूप मे पढ़ने वाला विद्यार्थी, विदेशी भाषा भी उस विद्यार्थी से बेहतर सीखता है जिसे आरम्भ से ही विदेशी भाषा माध्यम में शिक्षा दी जाती है। इस संदर्भ में यूनेस्को की 2008 में छपी पुस्तक (Improving the Quality of Mother Tongue-based Literacy and Learning, पेज 12) का यह हिस्सा बहुत महत्वपूर्ण है:

“हमारे रास्ते में बड़ी रुकावट भाषा एवं शिक्षा के बारे में कुछ अंधविश्वास हैं और लोगों की आंखें खोलने के लिए इन अंधविश्वासों का भंडा फोड़ना चाहिए। ऐसा ही एक अन्धविश्वाश यह है कि विदेशी भाषा सीखने का अच्छा तरीका इसका शिक्षा के माध्यम के रूप में प्रयोग है (दरअसल, अन्य भाषा को एक विषय के रूप में पढ़ना ज़्यादा कारगर होता है)। दूसरा अंधविश्वास यह है कि विदेशी भाषा सीखना जितनी जल्दी शुरू किया जाए उतना बेहतर है (जल्दी शुरू करने से लहज़ा तो बेहतर हो सकता है पर लाभ की स्थिति में वह सीखने वाला होता है जो मातृभाषा में अच्छी महारत हासिल कर चुका हो)। तीसरा अंधविश्वास यह है कि मातृभाषा विदेशी भाषा सीखने के राह में रुकावट है (मातृभाषा में मजबूत नींव से विदेशी भाषा बेहतर सीखी जा सकती है)। स्पष्ट है कि ये अंधविश्वास हैं और सत्य नहीं। लेकिन फिर भी यह अंधविश्वास नीतिकारों की इस प्रश्न पर अगुवाई करते हैं कि प्रभुत्वशाली (हमारे संदर्भ में अंग्रेज़ी ) भाषा कैसे सीखी जाए।”

भाषा के मामले में यह तथ्य भी बहुत प्रसंगिक हैं:

1. आज के युग में किसी भाषा के ज़िंदा रहने और उसके विकास के लिए उस भाषा का शिक्षा के माध्यम के रूप मे प्रयोग आवश्यक है। वही भाषा जिंदा रह सकती है जिसका जीवन के विभिन्न क्षेत्रों में प्रयोग होता रहे (भाषा के ख़त्म होने का खतरा कब होता है, इसके बारे में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)

2. अंग्रेज़ी माध्यम की वजह से एक ऐसी पीढ़ी तैयार हो रही है जिसका ना अपनी भाषा और ना अंग्रेज़ी में कोई अच्छा सामर्थ्य है। ना ही यह अपनी संस्कृति, परम्परा , इतिहास और अपने लोगों के साथ कोई गहन आत्मीयता बना सकती है

3. भारतीय संविधान (जो स्वतंत्रता सैनानियों की समझ का परिणाम है) प्रत्येक भारतीय को यह अधिकार देता है कि वह अपनी मातृभाषा में शिक्षा और सेवाएं हासिल करे।

4. लगभग हर देश में विदेशी भाषा बच्चे की 10 साल कि उम्र के बाद पढ़ाई जाती है और इन बच्चों की विदेशी भाषा कि महारत भारतीय बच्चों से कम नहीं है। इन देशों को अंग्रेज़ी की ज़रूरत भारत जितनी ही है और ये देश शिक्षा के मामले में भारत से समझदार हैं और विकास में भी आगे हैं।

5. पिछले दिनों इंग्लैंड में एक रिपोर्ट छपी है कि यूरोपीय बैंक इंग्लैंड वालों को इसलिए नौकरी नहीं दे रहे हैं, क्योंकि उन्हें अंग्रेज़ी के अलावा कोई भाषा नहीं आती और कोई और भाषा ना आने के कारण इंग्लैंड को व्यापार में 48 बिलियन पाउंड का घाटा उठाना पड़ रहा है।

उपरोक्त्त तथ्यों को देखते हुए भारतीय लोग वर्तमान भाषागत स्थिति के बारे में गहन सोच-विचार करें ताकि सही और वैज्ञानिक भाषा नीति व्यवहार में लाई जा सके। इसमें पहले ही बहुत देर हो चुकी है और भारी नुकसान हो चुके हैं। यदि वर्तमान व्यवहार ऐसे ही चलता रहा तो भारत की और भी बड़ी तबाही तय है।

भाषा के मामलों के बारे में दुनिया भर की खोज, विषेशज्ञों की राय और दुनिया की भाषागत स्थिति के बारे मे विस्तार में जानने के लिए भाषा नीति के बारे में अंतर्राष्ट्रीय खोज: मातृभाषा खोलती है शिक्षा’, ‘ज्ञान और अंग्रेज़ी सीखने के दरवाज़े‘ के दस्तावेज़ हिंदी, पंजाबी, तामिल, तेलुगू, कन्नड़, डोगरी, मैथिली, ऊर्दू, नेपाली और अंग्रेज़ी में यहां पर  पढ़ा जा सकता है।

डा.जोगा सिंह
[email protected]
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