लड़कियां चांद पर ही क्यों ना पहुंच जाए, बिना मां बने तो उसे सेटल माना ही नहीं जाता

कितना अनसेटलिंग सा सवाल है ना?

मेरी एक सहेली है – सुहाना। दिल्ली के एक लैंग्वेज स्कूल में हम पहली बार मिले और फिर अच्छे दोस्त बन गए। दोस्ती अभी भी बरकरार है, पर मुलाकात नहीं हो पाती क्योंकि दोनों अब अलग-अलग शहरों में रहते हैं। सुहाना तीस साल की है, सॉफ्टवेयर इंजीनियर है, शादी हो चुकी है, बेहद हंसमुख और अपनी ज़िंदगी से बेहद खुश। पर कभी-कभी उलझ जाती है, सवालों में। खुद के नहीं, दुनिया वालों के…

“सेटल कब हो रही हो, सुहाना?”

“मैं पढ़ाई पूरी कर चुकी हूं। इंजीनियरिंग कर चुकी हूं, एमबीए कर चुकी हूं और अच्छी खासी नौकरी कर रही हूं। और तो और शादी भी कर ली है। अच्छी खुशहाल ज़िंदगी जी रही हूं और लोगों को लगता है कि अभी भी सेटल नहीं हूं!”

सुहाना की ये बात सच में सोचने पर मजबूर करती है कि आखिर ये सेटल होना होता क्या है? इस सवाल के पीछे क्या तर्क, क्या विज्ञान और क्या अर्थशास्त्र है? शायद सुहाना अभी मां नहीं बनी, इसलिए उससे पूछा जाता है कि वो सेटल कब हो रही है। पर क्या मां या पेरेंट बनना सेटल होने का आखिरी पड़ाव है?

सुहाना कहती है कि जब शादी नहीं हुई थी, तब भी लोग यही पूछते थे, “सुहाना, सेटल कब हो रही हो?” और अब तो शादी हुए तीन साल बीत चुके हैं, सवाल वही है, पुराना, घिसा-पिटा कि “सेटल कब हो रही हो?”

हां, सुहाना मानती है कि लोगों का इशारा है उसी तरफ। पहले शादी, फिर बच्चा – एक के बाद एक पड़ाव। पर अगर वो अभी मां नहीं बनना चाहती, या कभी भी मां नहीं बनना चाहती, किसी भी कारणवश, तो उसे सेटल्ड ना माना जाए? सच में, बड़ा ही बेचैन करने वाला मसला है।

सुहाना पूछती है कि आखिर लोगों को उसकी ज़िंदगी में इतनी दिलचस्पी क्यों है? असल में सुहाना अकेली नहीं है जिससे ये सवाल हज़ारों बार, कुरेद-कुरेद कर पूछा गया हो। ये सवाल हर इंसान से पूछा जाता है; पर लड़कियां इस सवाल की चपेट में ज़्यादा आती हैं। हमारी मानसिकता और सामाजिक संरचना ही ऐसी है कि लड़की ISRO या NASA या फिर चांद पर ही क्यों ना पहुंच जाए, बिना शादी या बिना मां बने उसे कमतर ही समझा जाता है। बदलाव हो रहा है, धीरे-धीरे, कछुए की चाल से भी धीरे, पर दुनिया में बाकी बदलाव तो खरगोश की गति से हो रहे हैं। तो टकराव तो होगा ही – कछुए और खरगोश की गति में। तेज़ी से आगे बढ़ती सुहाना और लड़की को पहले मासिकधर्म के अगले ही दिन से “सेटल” कर देने वाली मानसिकता वाली दुनिया में बैर तो होगा ही।

पर समस्या इतनी भी गंभीर नहीं है। क्योंकि ये सवाल कभी गंभीरता से नहीं पूछा जाता। ऐसे सवाल पूछे नहीं फेंके जाते हैं। पूछने वाला कभी आपके बारे में या आपके हित में नहीं सोच रहा होता। अगर सच में लोग एक-दूसरे के बारे में इतना सोचते, इतनी चिंता करते तो इस दुनिया के कुछ और ही रंग होते। किसी से कोई बैर नहीं, कोई मतभेद नहीं, हर तरफ एक दूसरे से लगाव, प्यार और भाईचारा। पर असल में सब उल्टा है। है ना?

फिर ये सवाल क्यों पूछा जाता है? अरे, बस यूं ही। बातचीत शुरू करने या कायम रखने के लिए। एक बात बताइए, दिन-भर सास-बहु की पॉलिटिक्स वाले टीवी सीरियल देखने वाले लोग आपसे क्वांटम फिज़िक्स या रॉकेट साइंस के सवाल तो नहीं पूछेंगे ना? शादी कब हो रही है, बच्चे कब हो रहे हैं, बच्चों की शादी कब हो रही है, वगैरह, वगैरह। ऐसे ही सवाल पूछे जाएंगे। साठ साल की बूढ़ी महिला से भी तो पूछा जाता है, “और, दादी कब बन रही हो?”

तो मैंने सुहाना से कहा है कि वो ऐसी बातें एक कान से सुने और दूसरे कान से निकाले। क्योंकि इंसान तो मर कर ही सेटल होता है, अपनी कब्र में।

मेरी एक दोस्त का कहना है कि कुछ लोग मर कर भी सेटल नहीं होते, वो भूत बन कर यहां-वहां मंडराते रहते हैं। सच है, वो भूत-प्रेत बन कर ऐसे लोगों को सताते और डराते हैं जो उनसे बार-बार “सेटल कब हो रहे हो” जैसे अनसेटलिंग से सवाल पूछते थे।

आप तो ऐसे सवाल नहीं पूछते ना किसी से?

फोटो प्रतीकात्मक है।

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