25 सालों से ज़रूरतमंदों तक खून पहुंचा रहे हैं मुकेश हिसारिया

Posted by Sidharth Bhatt in Hindi, Inspiration, Interviews
August 18, 2017

“जन्म से लेकर मृत्यु तक हर कदम पर हमें समाज के सहयोग की ज़रूरत होती है। जन्म के समय डॉक्टर की, पढ़ाई-लिखाई में शिक्षक की, काम में अपने साथियों, जूनियर्स और सीनियर्स की, मौत के बाद अंतिम संस्कार के लिए भी समाज ही काम आता है। इस समाज का हम पर बड़ा ऋण है जिसे इसी जन्म में चुकता करने का युवा अवस्था ही सही समय है। ब्लड डोनेशन के लिए काम करना, इस ऋण को चुकाने की मेरी एक छोटी सी कोशिश है।”

ये कहना है पटना के मुकेश हिसारिया का, जो देशभर में ब्लड डोनेशन के लिए लगभग तीन दशकों से एक मुहिम चला रहे हैं। हमने मुकेश जी से बात की और उनके इस अभियान के बारे में जानने की कोशिश की।

सिद्धार्थ: अपने बारे में बताइए मुकेश जी, कहां से हैं, कहां पढ़ाई हुई, मतलब जनरल इनफॉर्मेशन?

मुकेश: मेरा जन्म झुमरीतलैय्या में हुआ और परवरिश पटना में हुई। मेरी पढ़ाई राम मोहन राय सेमिनेरी स्कूल से हुई और वहीं के डिग्री कॉलेज से मैंने बी. कॉम पार्ट-2 तक की पढ़ाई की, घर की आर्थिक स्थिति ठीक नहीं थी इसलिए 1989 से मैंने नौकरी करना शुरू कर दिया था।

सिद्धार्थ: मुकेश जी ये पटना में ब्लड डोनेशन को लेकर अभियान चलाने का ख़याल आपको कैसे आया?  

मुकेश: 1991 में मां की तबियत खराब हुई तो उनके इलाज के लिए मुझे वेल्लोर जाना पड़ा। मां के इलाज के लिए मुझे वहां 1 महीने तक रुकना पड़ा, उसी दौरान मैंने वहां देखा कि लोगों की स्थिति काफी खराब थी। खून की कमी के कारण कई लोग मेरे सामने ही चल बसे। यह सब देखने के बाद लगता था कि कुछ करना चाहिए।

कुछ समय बाद मां के तबियत ठीक हो गयी तो हम पटना वापस आ गए। लेकिन ये ब्लड डोनेशन वाली बात मन से निकली नहीं थी, तो अपने सर्किल में ही लोगों से बात कर उन्हें ब्लड डोनेट करने के लिए कहना शुरू किया। बस धीरे-धीरे लोग इसी तरह जुड़ते गए।ऑपरेशन के बाद मां बेड पर थी और मेरे पास काफी खाली वक्त होता था। वहीं पास की जैन धर्मशाला में मेरे ठहरने का इंतज़ाम था और उसके पास ही एक राशन की दुकान थी, जहां से सारा खाने पीने का सामान लिया जाता था। बस वहीं से कुछ 20-25 लोगों से इकठ्ठा कर उनसे मैंने ब्लड डोनेट करने की बात की, जिससे ज़रूरतमंद लोगों के लिए ब्लड का इंतज़ाम किया जा सके। अस्पताल से जो लोग ट्रीटमेंट करवा कर जा रहे होते थे उनके साथ आए लोगों को भी हमने कन्विंस करके ब्लड डोनेट करवाना चालू किया।

सिद्धार्थ: कोई एक घटना वेल्लोर के उस अस्पताल की जिसने आपको इतनी बड़ी मुहिम शुरू करने के लिए तैयार किया?

मुकेश: वेल्लोर में उसी हॉस्पिटल में एक बंगाली दंपत्ति आए हुए थे, अपने 3 महीने के बच्चे के इलाज के लिए। वो उनका इकलौता बच्चा था और खून की उपलब्धता ना होने के कारण उस बच्चे की मौत हो गयी। इस घटना ने मुझे झकझोर कर रख दिया था, यह देखने के बाद मैं इतना व्यथित था कि उस रात खाना भी नहीं खा पाया। यही घटना थी जिसके कारण मैंने आज यहां तक का सफ़र तय किया है।

सिद्धार्थ: तब से लेकर अब तक क्या फर्क नज़र आता है आपको, खासतौर पर जब ब्लड डोनेट करने को लेकर लोग अक्सर संकोच करते हैं? ये भी बताइए कि लोगों को आपने ब्लड डोनेट करने के लिए कैसे प्रोत्साहित किया?

मुकेश: पिछले 10 सालों में स्थितियों में काफी बदलाव आया है। अब ऐसा कम ही देखने में मिलता है कि ब्लड ना मिलने के कारण किसी की मौत हो जाए। सोशल मीडिया के साथ-साथ और भी कई कारणों से अब पहले जैसे हालत नहीं रहे। लोग जागरूक हुए हैं और वो जानते हैं कि ब्लड डोनेट करने से उनको कोई नुकसान नहीं होगा। मैं अपनी ही बात करूं तो मैं 1987 से ब्लड डोनेट कर रहा हूं, तब मेरा वज़न 40 किलो था, आज मेरा वज़न 80 किलो है और मैं साल में नियमित रूप से 2 से 3 बार ब्लड डोनेट करता हूं। हां गांव देहात में अभी भी थोड़ी परेशानी है, लेकिन उनको भी हम लोग मोटीवेट करके उनसे ब्लड डोनेट करवा रहे हैं। हम उनसे पूछते है कि कभी ब्लड डोनेट किया है, और उनसे कहते हैं कि एक बार आप डोनेट कीजिये या हम आपके सामने ही ब्लड डोनेट करते हैं। इस तरह से लोगों में भरोसा बनता है कि हाँ हम भी ब्लड डोनेट कर सकते हैं। इससे काफी सहायता मिलती है।

जब भी कोई ब्लड डोनेशन के लिए पूछता था तो हम कहते थे कि अगर किसी ज़रूरतमंद का पता चला तो हम आपको सूचित करेंगे। दूसरा तरीका ये है कि जब कोई कैंप में कोई ब्लड डोनेट करता है तो उसे एक डोनर कार्ड मिलता है जिससे वो साल में एक बार सरकारी ब्लड बैंक से ब्लड ले सकते हैं। अब मान लीजिए किसी को ब्लड की ज़रूरत है तो हम जो ब्लड डोनेट कर चुके हैं उन्हें कॉल करके बताते हैं कि फलां जगह एक पेशेंट को ब्लड की ज़रूरत है। आपके कार्ड का इस्तेमाल कर उन्हें ब्लड दिलवा दीजिये। हमारी मुहिम के सफल होने का ये भी एक कारण है। अब लॉयंस क्लब या रोटरी क्लब वाले यही डोनर कार्ड अपने पास ही रख लेते थे और उनके माध्यम से ही ज़रुरतमंदों तक ब्लड पहुंचता था। लेकिन हमने ये कार्ड डोनर को ही दे दिए ताकि उसके कार्ड से किसी को आगे फायदा हो तो उसे भी लगे कि एक बार फिर उसने अच्छा काम किया है।

सिद्धार्थ: आपकी इस मुहिम में सोशल मीडिया के योगदान के बारे में कुछ बताइए?

मुकेश: ऑरकुट के ज़माने से ही ब्लड डोनेशन को बढ़ावा देने के लिए मैंने सोशल मीडिया का उपयोग करना शुरू किया था। तब हैदराबाद के कुछ लड़कों को देखकर मुझे ये आईडिया आया था। वो लोग जिसे भी ज़रूरत होती उसकी पूरी डीटेल्स पोस्ट कर देते थे, मैंने उन्हीं को फॉलो किया। जो काम वो लोग हैदराबाद में कर रहे थे, मैंने वही बिहार में करना शुरू किया। ये कोई मेरा अपना नया आईडिया नहीं था, इन लड़कों से सीखकर मैंने एक प्रयोग के तौर पर मेरे जानकार लोगों में जिसको ज़रूरत होती उनकी डीटेल्स पोस्ट करना शुरू किया। और इसका तुरंत इम्पैक्ट भी हुआ। इन कोशिशों के बाद जिन्हें ब्लड मिला उनकी और उनके परिवारजनों की मुस्कान और दुआओं ने ही हमें यहां तक पहुंचाया है। ऑरकुट के बाद फिर facebook आया और फिर WhatsApp आया, बस इन्हीं सोशल मीडिया के माध्यमों से हम अपने आप को बढ़ाते चले गए और नेटवर्क बढ़ता चला गया।

इस नेटवर्क के माध्यम से हम ऐसे कई लोगों से मिले जिनकी तमन्ना थी कि ब्लड डोनेट करे। हमने उन लोगों को मोमेंटो देकर या उनकी कोई फोटो सोशल मीडिया पर डालकर और ब्लड डोनेशन का सर्टिफिकेट देकर एप्रिशिएट किया। अब ये सब उनके दफ्तर में या घर पर लगे होते हैं और जब दो चार लोग उन्हें कहते हैं कि अरे! तुमने ब्लड डोनेट किया है तो वो भी प्राउड फील करते हैं। इन सबसे हमें काफी मदद मिली, काफी अवेयरनेस बढ़ी। इसी का नतीजा है कि इसी महीने की 11 तारीख से लेकर 16 तारीख के बीच बिहार में पहली बार 16 ब्लड डोनेशन कैंपों का आयोजन हुआ। इनसे लगभग 1600 यूनिट ब्लड सरकारी ब्लड बैंकों में गया है।

आपको बताना चाहूंगा कि सोशल मीडिया के माध्यम से ऐसे-ऐसे काम हो गए कि कभी-कभी यकीन नहीं हो पाता है। एक बार एक सज्जन ने फोन पर बताया कि वो अपनी पत्नी के साथ वैष्णो देवी जा रहे हैं और उनका बैग ट्रेन में चोरी हो गया है। बैग में उनकी पत्नी की एक दवा भी थी जो बहुत ज़रूरी थी, उन्होंने बताया कि वो 2 घंटे में लुधियाना पहुंचने वाले हैं। मैंने तुरंत facebook पर उनकी सारी जानकारी पोस्ट कर दी, जब वो लुधियाना पहुंचे तो स्टेशन पर 2 लोग उनके लिए दवा लेकर मौजूद थे। तो ये है सोशल मीडिया की उपयोगिता।

सिद्धार्थ: इतनी बड़ी मुहिम में चुनौतियां भी तो बहुत सारी रही होंगी, उनके बारे में कुछ बताइए।    

मुकेश: लोग हंसते थे शुरू में, हमें सीरियसली भी नहीं लेते थे। शुरुआती कैंपों में 8 यूनिट से 10 यूनिट ब्लड ही जमा हो पाता था, आज अगर कोई कैंप लगते हैं तो करीब 100 यूनिट ब्लड जमा हो जाता है। हमें तब सरकारी ब्लड बैंक वाले कहते थे कि ये आपके बस का नहीं है, आपसे नहीं होगा ये काम, आप छोड़ दीजिये। यहां पर जो प्राइवेट ब्लड बैंक वाले हैं, उनसे धमकियां भी मिलती थी। वो लोग 5 हज़ार 10 रुपये प्रति बोतल के हिसाब से बेचते हैं, उनको लगता था उनका रोज़गार खत्म हो रहा है। वो लोग धमकाते थे, कहते थे, “बहुत नेता बन रहे हैं आप लोग, ऐसे ही करते रहे तो बहुत जल्दी चले जाइएगा (जान से मार दिया जाएगा)।” लेकिन हमें लगा कि अगर जाना होगा तो कभी भी जा सकते हैं, और हमने अपना काम जारी रखा। लोगों की दुआएं हमारे साथ थी तो बस आगे बढ़ते चले गए।

सिद्धार्थ: इस दौरान हुए कुछ ऐसे किस्से जिनसे लगा हो कि हां मैं कुछ अच्छा कर रहा हूं। 

मुकेश: पटना की ही एक घटना है, एक छोटी बच्ची पटना के एक हॉस्पिटल में एडमिट थी जिसे ‘ओ’ नेगेटिव ब्लड ग्रुप की ज़रूरत थी। यह एक रेयर ब्लड ग्रुप है। हमने ये मैसेज IBN7 की एंकर ऋचा अनिरुद्ध को भेजा, उन्होंने इसे शेयर किया और इसका असर भी हुआ। सुनील नाम के एक सज्जन जो पटना किसी काम के सिलसिले में आए थे, उन्होंने बच्ची को ब्लड दिया और उसकी जान बच गयी। बाद में उस बच्ची के पिता का मुझे फोन आया और उन्होंने शुक्रिया करते हुए कहा कि “मैं अभी गांधी मैदान में नमाज़ अदा कर रहा हूं आपके लिए, सुनील जी के लिए और उन सभी के लिए जिनकी वजह से मेरी बच्ची की जान बची है।”

ऐसे ही 2013 में जब हम KBC(कौन बनेगा करोड़पति) में गए थे तो अमिताभ बच्चन को बड़ा आश्चर्य हुआ था कि ऐसे भी कोई ब्लड देने आ जाता है क्या आपकी एक आवाज़ पर! उसी तरह से 2016 में शाहरुख खान के फिल्म फैन के प्रमोशन में हमें बुलाया गया था। पूरे भारत से कुल 10 लोग गए थे इस तरह से, उनमें से 9 लोग जब स्टेज पर गए तो शाहरुख के साथ बिल्कुल लिपट गए, फोटो-वोटो खिंचवा रहे थे। मेरी बारी आई तो मैं गया और बस उनसे हाथ मिलाया। ये देखकर शाहरुख बोले कि लगता है आप फोटो खिंचवाने नहीं आए हैं। फिर वो पूछे कि आप किसके फैन हैं? मैंने कहा मैं ब्लड डोनेशन का फैन हूं। फिर उन्होंने कहा कि बताइए मैं ब्लड डोनेशन के लिए मैं क्या कर सकता हूं? मैंने उनसे कहा कि आप ब्लड डोनेट कर सकते हैं। तो वो बोले नहीं वो तो अभी नहीं कर सकते, कुछ और बताइए। मैंने कहा कि आप फिल्म में ब्लड डोनेशन अवेयरनेस के लिए एक मैसेज शामिल कर सकते हैं। फिर वो बोले कि बताइए कि अभी मैं क्या कर सकता हूं? मैंने कहा कि आप अभी ब्लड डोनेशन को लेकर एक मैसेज दे सकते हैं और उन्होंने वो दिया भी।

इस तरह की छोटी-छोटी चीज़ें होती हैं तो अच्छा लगता है, लगता है कि हां कुछ अच्छा काम कर रहे हैं। ये कुछ पल हैं जो यादगार हैं।

सिद्धार्थ: इस दौरान परिवार का रवैय्या कैसा रहा?

मुकेश: परिवार के लोगों का पूरा सहयोग मिला है, उन्हें बस मेरे ब्लड डोनेट करने से दिक्कत है। वो कहते हैं कि बाकी कुछ भी कीजिए कोई दिक्कत नहीं है। उनको मालूम है कि मैं थोड़ा जिद्दी किस्म का हूं, जो ठान लिया वो तो करना ही है। इसलिए मेरी इस मुहिम में उन्होंने पूरी तरह से साथ दिया।

सिद्धार्थ: अंत में हमारे युवा देश के युवाओं को क्या संदेश देना चाहेंगे? 

मुकेश: आप युवा हैं आपके पास उम्र है, उम्र के जिस पड़ाव पर आप हैं वहां ऊर्जा की कमी नहीं है। इसलिए जिस भी चीज़ को आप करना चाहते हैं, उसमें अपना सबकुछ झोक दें। जुनून की हद तक मेहनत करें, सफलता ज़रूर मिलेगी।

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