कोई बच्चा फेल होता है तो सवाल टीचर के पढ़ाने के तरीके पर भी उठाइये

Posted by Rishabh Kumar Mishra in Education, Hindi, Society, Staff Picks
August 25, 2017

आजकल प्राथमिक शिक्षा में ‘नो डिंटेशन पॉलिसी’ को समाप्त करने की बहस ज़ोरों पर है। इसके लिए माध्यमिक कक्षाओं में विद्यार्थियों की असफलता का हवाला दिया जा रहा है। ऐसा बताया जा रहा है कि शिक्षा के अधिकार कानून के कारण विद्यार्थी कक्षा 8 तक प्रत्येक अगली कक्षा में प्रोन्नत किए गए इसलिए ये आधारभूत पठन, लेखन और गणितीय योग्यताओं से हीन हैं। इन्हें पढ़ाना और कक्षा के स्तर तक लाना कठिन कार्य है। इस तर्क के समर्थक समाधान सुझाते हैं कि प्राथमिक स्तर पर ही ऐसे विद्यार्थियों को रोक दिया जाए जिससे माध्यमिक कक्षाओं में शिक्षण की कठिनाई को कम किया जा सके। फेल करने का यह तर्क शिक्षा के अधिकार कानून की आत्मा से मेल नहीं खाता है।

वर्ष 2009 से लागू शिक्षा का अधिकार कानून, 6 से 14 वर्ष के बच्चों की निःशुल्क और अनिवार्य प्राथमिक शिक्षा (कक्षा 8 तक) को मूलाधिकार का दर्जा प्रदान करता है। इस कानून ने कुछ क्रांतिकारी परिकल्पनाओं को साकार रूप दिया। उदाहरण के लिए कक्षा 8 तक बिना किसी को फेल किए अगली कक्षा में स्थानान्तरण, शिक्षकों सहित अन्य संसाधनों की न्यूनतम और अनिवार्य व्यवस्था, उम्र के अनुसार कक्षा में प्रवेश; यदि जिस कक्षा में प्रवेश दिया जा रहा है उसके लिए विद्यार्थी तैयार नहीं है तो उसकी तैयारी की व्यवस्था, प्राइवेट विद्यालयों में 25 प्रतिशत सीटों को आर्थिक दृष्टि से वंचित वर्ग के लिए आरक्षित करना, शिक्षकों के शिक्षणेतर कार्यों को न्यूनतम करना और स्थानीय समुदाय की भागीदारी को सुनिश्चित करना आदि। ये कानूनी व्यवस्थाएं सीखने-सिखाने की एक भिन्न संस्कृति की परिकल्पना को साकार करने की सार्थक मंशा का प्रमाण है।

यह व्यवस्था अनिवार्य प्राथमिक शिक्षा को बाधा मुक्त करती है जिसमें फेल न करने की शर्त एक प्रमुख शर्त है।

इसके दो निहितार्थ हैं। प्रथम, इस शर्त का अर्थ यह नहीं है कि विद्यार्थी सीखेगें नहीं या उन्होंने जो सीखा है उसका आकलन नहीं होगा। आकलन की व्यवस्था है, बस उसका स्वभाव बदला गया। शिक्षा के अधिकार कानून में सतत और व्यापक मूल्यांकन का प्रावधान किया गया। सतत और व्यापक मूल्यांकन अकादमिक और सह अकादमिक गतिविधियों के बहुरूप आकलन का सकल योग होता है जिसमें विद्यार्थी को सुधार के लिए उसी कक्षा और उसी सत्र में न केवल मौका दिया जाता है बल्कि पूरा सहयोग भी प्रदान किया जाता है। द्वितीय, विद्यार्थी को अगली कक्षा में प्रोन्नत करने का अर्थ विद्यालयी शिक्षा के वातावरण से भय, बोझ और व्यवहारवादी शिक्षण को दूर रखना है। न जाने क्यों हमारी व्यवस्था इससे मुक्त नहीं होना चाहती! और परीक्षा के बहाने फेल होने के भय, इसे पास करने के बोझ और इस बोझ को ढोने के लिए व्यवहारवादी शिक्षण के पक्ष में खड़े होना चाहती है।

यदि विद्यार्थी असफल हो रहे हैं तो असफलता का ठीकरा केवल विद्यार्थी के सिर फोड़ना कहां तक न्यायोचित है? यदि 6 से 14 वर्ष के प्रत्येक बच्चे का विद्यालय में पंजीयन है, वह विद्यालय आ रहा है, शिक्षक भी उपस्थित हैं और शिक्षण कार्य संपन्न हो रहा है तो सवाल यह है कि विद्यार्थी असफल कैसे होगा? इसके दो संभावित कारण हो सकते हैं। प्रथम, विद्यार्थी सीखने में असफल रहा हो, द्वितीय उसे सिखाने और पढ़ाने की पद्धति असफल रही।

इसके बरक्स मनोवैज्ञानिक तथ्य है कि अधिकांश जनसंख्या की बुद्धि लब्धि या इस जैसी अन्य संज्ञानात्मक क्षमताएं औसत के इर्द-गिर्द होती है। प्रतिभाशाली या मूढ़ दोनों संख्या कम होती है। अतः माना जा सकता है कि विद्यालय आने वाले ज़्यादातर बच्चे सीखने और जानने के लिए आवश्यक संज्ञानात्मक क्षमता से युक्त होते हैं। इसका प्रमाण विद्यालय के बाहर बच्चों द्वारा की जाने वाली गतिविधियों में देखा जा सकता है। वे खेल, घर के कार्यों में भागीदारी, टी.वी. देखना, विडियो गेम खेलना, माता-पिता के कार्यों में हाथ बंटाने आदि में भाषा, तर्क, समस्या समाधान, विवरण, व्याख्या, विचार संप्रेषित करने आदि की कुशलताओं का प्रयोग करते हैं। अर्थात यदि विद्यालय में ली जाने वाली परीक्षा को छोड़ दें तो ये विद्यार्थी अपने रोज़मर्रा के जीवन में न केवल सक्रिय हैं बल्कि वे उन दक्षताओं से युक्त भी हैं जिसका प्रशिक्षण विद्यालय जैसे संस्थानों में दिया जाता है। फर्क यह है कि ये अपनी मानसिक योग्यताओं का प्रदर्शन उस तरह से नहीं कर सकते हैं जो एक पढ़े-लिखे (साक्षर) से अपेक्षित होती है।

हमारी व्यवस्था अपने मापने के तरीके को संदेह के दायरे में नहीं ला रही है लेकिन विद्यार्थियों की असफलता का ढिंढोरा ज़ोर-ज़ोर से पीट रही है। विद्यार्थी की व्यक्तिगत परिस्थितियां क्या थीं? और उसकी व्यक्तिगत विशिष्टताएं, क्षमताएं और रूचियां क्या थीं? इन प्रश्नों का ज्ञान के मूल्यांकन से महत्वपूर्ण संबंध है लेकिन मापन के तरीकों में इन पक्षों पर सवाल नहीं उठाया जा रहा है।

यदि विद्यार्थी असफल हो रहा है तो यह सवाल भी उठाया जाना चाहिए कि सिखाने वाले ने कैसे सिखाया? माध्यमिक कक्षा तक पहुंचने से पूर्व कोई भी विद्यार्थी कम से कम आठ वर्षों तक प्रोन्नत होता रहा। इस दौरान उसे अलग-अलग विषयों के अनेक शिक्षकों ने पढ़ाया होगा। प्रश्न है कि क्या किसी शिक्षक ने ऐसे विद्यार्थियों की सुध ली या सभी केवल उन्हें अगले स्तर पर भेजकर अपने दायित्व से मुक्त होते रहे। और समस्या का सरलीकरण कर दिया कि नो डिटेंशन के कारण बच्चे नहीं पढ़ते। जबकि रट्टा मारना, प्रश्नों के एक पूर्व निश्चित उत्तर को अंतिम उत्तर मानना, लिखित परीक्षा की प्रधानता, कक्षाकार्य-गृहकार्य के चक्र से सीखना जैसे परंपरागत मान्यताओं को हटाए बिना ‘नो डिटेंशन’ के सकारात्मक पक्ष को कार्यरूप नहीं दिया जा सकता है।

विचारिए कि फेल कौन होता है? विद्यालय तक पहुंच, विद्यालय में बने रहने और विद्यालय छोड़ने से संबंधित आंकड़ों की खोज-बीन की जाए तो ज्ञात होता है कि असफलता ज़्यादातर उन्हीं के हिस्से आती है जो विद्यार्थी वंचित और हाशिए के तबकों से आते हैं। अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति, लड़कियां, अल्पसंख्यक और ग्रामीण क्षेत्र से आने वाले विद्यार्थियों के असफल होने की संभावनाएं सर्वाधिक होती है। इनमें से ज़्यादातर प्रथम पीढ़ी के अधिगमकर्ता होते हैं। यानि कि उनके माता-पिता में औपचारिक विद्यालयी शिक्षा का अभाव होता है। इन विद्यार्थियों का परिवार पढ़ने के लिए अतिरिक्त सुविधा-समय, स्थान और सामग्री आदि नहीं उपलब्ध करा पाता है। शोधकार्य यह भी बताते हैं कि इन विद्यार्थियों के प्रति शिक्षकों का व्यवहार भी पूर्वाग्रह युक्त होता है।

जो विद्यार्थी इस तरह की पृष्ठभूमि से नहीं आते ‘नो डिटेंशन’ नीति के पूर्व भी उनकी असफल होने की दर कम थी। यदि इस नीति को समाप्त करते हैं तो भी इनकी असफलता दर कम रहेगी। लेकिन वे विद्यार्थी जिनके जीवन में विद्यालय आने-जाने की सुविधा ही एक बड़े बदलाव की गुंजाइश बन सकती थी, वह समाप्त हो जाएगी। इसी के साथ शिक्षा एक बार फिर थोड़े से चुने हुए संभ्रान्त लोगों के बीच सीमित रह जाएगी।

इसी तरह यह भी सिद्ध हो जाएगा कि सीखने की अभिप्रेरणा परीक्षा का भय है। सफल और असफल होने का वैयक्तिक उत्तरदायित्व केवल विद्यार्थी का है। सीखना एक श्रमसाध्य प्रक्रिया है जिसका लक्ष्य और परिणाम परीक्षा पास करना है। ये मान्यताएं हमें उसी व्यवस्था की ओर ढकेलती हैं जो मानती है कि ‘यदि छड़ी हटायी तो बालक सीखेगा नहीं।’ इस व्यवस्था के द्वारा विद्यार्थी रूपी व्यक्ति को प्रशिक्षित तो किया जा सकता है, लेकिन उसकी नैसर्गिक प्रतिभा का विकास नहीं किया जा सकता है।

यदि कोई विद्यार्थी फेल होता है तो इसका अर्थ हुआ कि उसने कक्षा विशेष और विषय विशेष में निर्धारित न्यूनतम ज्ञान को ग्रहण नहीं किया। ज्ञान ग्रहण की जो प्रक्रियाएं आयोजित की गयी उसमें तो विद्यार्थी आखिरी छोर पर था। उससे न तो रायशुमारी की गयी न ही शिक्षण के बाद फीडबैक लिया गया। इस व्यवस्था के कर्ताधर्ता पाठ्यचर्या निर्माता, विद्यालय के प्रशासक और शिक्षकगण थे। ऐसी स्थिति में असफलता के लिए केवल विद्यार्थी कैसे उत्तरदायी हो सकता है? उसके साथ उसके अभिभावक, शिक्षकगण, विद्यालयी तंत्र और एक पूरी व्यवस्था असफल होती है। विडंबना देखिये फेल और पास की घटनाएं उस विद्यालय की चहारदीवारी में होने वाली हैं जहां स्वतंत्रता, स्वायत्तता, आत्म विश्वास और विविधता के सम्मान का पाठ सिखाया जाता है!

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