समाज के छुआ-छूत से छुटकारा पाने डेरों से जुड़ते हैं मेरे गांव के लोग

25 अगस्त, 2017 का अध्याय अब खत्म हो चुका है, बाबा राम रहीम जेल में हैं और सी.बी.आई. की विशेष अदालत ने बाबा को दो घोर अपराध के चलते अलग-अलग 10 साल की सज़ा सुनाई। बाबा को 20 साल अब जेल में रहना होगा, लेकिन हमारा मीडिया खासकर कि टीवी मीडिया, उस खबर की हर परत खोलता और उधेड़ता है जिस खबर पर देश और समाज की पैनी नज़र हो। इसी सिलसिले में अब मीडिया का कैमरा पंचकुला की उन गलियों और सड़कों में घूम रहा है, जहां बाबा के समर्थकों ने उपद्रव मचाया था। और इसी कहानी को आगे बढ़ाते हुए, पंचकुला के बड़े-बड़े मकानों में रहने वाले लोगों से उनके अनुभव का जायज़ा लिया जा रहा है।

मैं व्यक्तिगत रूप से डेरा प्रेमी नहीं हूं और ना ही किसी डेरे से जुड़ा हूं, लेकिन लोगों की प्रतिक्रिया सुनकर काफी हैरान हूं। 24 अगस्त को जब डेरा प्रेमियों का हुजूम पंचकुला की सड़कों को अपना अस्थाई ठिकाना बना चुका था, हरे भरे इस शहर के बाग़ बगीचों में चहल पहल बढ़ गई थी, तब सुनने में आ रहा था की शहर में ब्रेड और दूध जैसी रोज़ाना की चीज़ों की कमी हो गई है। वहीं 25 तारीख के उपद्रव के बाद स्थानीय लोग, ये शिकायत भी कर रहे थे कि जगह-जगह शौच की बदबू आ रही है और ये मानव मल पूरे शहर में बिखरा पड़ा है। कहीं खुले मैदानों में तो कहीं किसी घर की दीवार के साथ।

अब ज़रा सोचने की ज़रूरत है कि समाज का नागरिक समाज को वही वापस करता है, जो उसे समाज से मिलता है। हमें यहां इस पर भी सोचने की ज़रूरत है कि क्या भारत में दो भारत बसते हैं। एक अमीर और एक गरीब। अगर थोड़े समय के लिये डेरा विवाद को भूल जाएं और सोचे कि समाज का ये गरीब, पिछड़ा वर्ग जो सदियों से गरीब है, अगर शहर की ओर एक हजूम के रूप में रुख करे तो क्या हालात होंगे?

हरियाणा, राजस्थान और पंजाब के कई ऐसे इलाके हैं जो आज भी विकसित भारत से बहुत दूर हैं। दिल्ली से सटे बहादुरगढ़ के बाद रोहतक, जींद, संगरूर, मानसा, सिरसा, डबवाली, फरीदकोट, फिरोज़पुर, तरनतारन, आदि जैसे कई कस्बे, शहर और गांव हैं, जहां शिक्षा के बहुत कम संस्थान हैं, वहीं मुख्य व्यवसाय बस खेती ही है। गांवों में ज़्यादातर ज़मीनों पर कब्ज़ा ऊंची जातियों का ही है। बाकी लोग मुख्यतः खेती से जुड़े काम से ही जीविका कमाते हैं, मसलन खेतों की जुताई, फसलों की कटाई, मशीनरी का काम, अनाज मंडी में मज़दूरी आदि। भारत के अन्य इलाकों की तरह ये क्षेत्र भी जात-पात और छुआछूत जैसी बुराइयों से अछूते नहीं हैं।

अगर मैं मेरे गांव की ही बात करूं तो, मुख्य शहर से जोड़ने के लिए पूरे दिन में एक ही बस आती है। यही हाल कई दूसरे गांवों का भी है। उच्च शिक्षा के लिए कॉलेज मेरे गांव से लगभग 50 किलोमीटर दूर है। गांव की आबादी मुख्यतः सिख है, सैद्धांतिक रूप से सिख धर्म में किसी भी तरह से कोई भेदभाव नहीं है। यही वजह है कि सिख धर्मस्थल यानि कि गुरुद्वारे में चारों दिशाओं में चार दरवाज़े होते है, जिसका अर्थ है कि कोई भी, किसी भी दिशा से किसी भी वर्ग या जाति का हो, गुरुद्वारा साहिब आ सकता है, यहां सभी का एक समान स्वागत है।

लेकिन सिख समाज में भी जात-पात मौजूद है, खासतौर पर ग्रामीण क्षेत्रों की आबादी का एक बड़ा हिस्सा, इस जात-पात की भेंट चढ़ रहा है। यहां ज़िंदगी आसान नहीं है। छोटे-छोटे कच्चे घर, संकरी गलियां, इन्हीं से गुज़रती गन्दे पानी की नालियां, जो किसी भी ‘शहरी’ नागरिक को बीमार कर सकती हैं। कई घरों में पीने के पानी का हैंडपंप भी नहीं है, हां गांव की टंकी से दो टाइम पानी ज़रूर मिल जाता है। ज़्यादातर घरों में शौचालय नहीं हैं और खुले में ही लोग शौच के लिए जाते हैं।

गांव के इस हिस्से के मर्द, बड़े किसान के खेतों में या किसी और तरीके की मज़दूरी करते हैं और महिलाऐं किसान के घर में गोबर हटाने और बाकी घर के काम से अपना रोज़गार जुटाती हैं। स्कूलों में पढ़ाई नाममात्र की ही है, बड़े किसान के बच्चे तो किसी प्राइवेट स्कूल में दाखिला ले लेंगे, लेकिन ये गरीब वर्ग जो सदियों से जात-पात के बोझ के नीचे दबा है, दो वक़्त की रोटी का जुगाड़ भी बड़ी मुश्किल से कर पाता है। उसके लिये पढ़ाई मायने नहीं रखती। इस बात को भी सोचने की ज़रूरत है कि देश की सरकारें बस एक आरक्षण देकर ही खुद को पाक-साफ नहीं बता सकती। आज़ादी के 70 सालों के बाद भी इन इलाकों में शिक्षा, स्वास्थ्य, रोज़गार, पीने का साफ़ पानी आदि जैसी मूलभूत सुविधाएं नहीं हैं।

जब गांव का ये तबका बाहर निकलता है, चाहे वो बस के सफर में हो या सरकारी अस्पताल की लाइन में। जात-पात की वो पहचान कहीं धुल सी जाती है। यहीं से जन्म होता है डेरों का, जहां वो अपनी दमित पहचान को पीछे छोड़ने में कामयाब होते हैं। वो बाकी लोगों से जुड़ते हैं और एक समूह के रूप में खुद की पहचान और सुरक्षा को निर्धारित करते हैं। ये डेरे इन्हें संरक्षण देने का काम करते हैं साथ ही अपनी नई पहचान से ये खुद को मुक्त और आज़ाद पाते हैं और डेरा ही इनके लिये सबकुछ बन जाता है। देश की व्यवस्था जिसने कभी भी ईमानदारी से इनकी पैरवी नहीं की, ये उसके खिलाफ समय आने पर विरोध का बिगुल भी बजा सकते हैं। इनका यही गुस्सा डेरों का संरक्षण करता है और बाबाओं की ढाल भी बनता है।

भारत के इस रूप के सिवाय एक विकसित भारत और भी है, जो चंडीगढ़, पंचकुला, मोहाली आदि इलाकों में आबाद है। गांव के किसी व्यक्ति का चंडीगढ़ या उसके आस-पास रहना एक सामाजिक रुतबे की बात होती है। लेकिन चंडीगढ़, पंचकुला भी वही आ सकता है जिसकी कमाई अच्छी हो। लेकिन, जब डेरा संत्संग के नाम पर मुफ्त यात्रा करवाएगा तो हज़ारों की तादाद में ये श्रद्धालु ज़रूर चंडीगढ़ या पंचकुला आएंगे। इनमें कई ऐसे भी होंगे जो पहली बार डेरे से इसलिए जुड़े होंगे रहे होंगे ताकि चंडीगढ़, पंचकुला जैसे शहरों को देख सकें।

यह तो तय है कि बाबा द्वारा जमा की गयी भीड़ का बड़ा हिस्सा इसी गरीब और उपेक्षित तबके से था। वह सही मायनों में अपनी रूखी-सूखी ज़िंदगी से थोड़े समय के लिये ही सही पर निज़ात पाना चाहता होगा। जहां वह मुफ्त में यात्रा कर सके और अच्छा खाना खा सके। ऐसे में समाज का ये गरीब और पिछड़ा वर्ग क्यों नहीं आएगा?

बाबा राम रहीम की सज़ा के दौरान और भी बहुत सी घटनाएं हुई। सिद्धार्थ मलहोत्रा की फिल्म नहीं चल पाई, डोकलाम के मुद्दे पर भारत और चीन दोनों पीछे हट गए और इसे अपनी-अपनी जीत बता रहे हैं। बिहार में लाखों लोग बाढ़ से प्रभावित हैं, यहां भी वही गरीब और पिछड़ा वर्ग मुख्य रूप से पीड़ित है। लेकिन हमारा मीडिया, बाबा राम रहीम को दिखाकर पूरे महीने की टीआरपी को बटरोने में लगा हुआ है। ये तो तय है कि बाबा दोषी है और डेरे के प्रेमियों में कुछ उपद्रवी भी शामिल थे। लेकिन इनमें अधिकांश लोग निर्दोष थे और बाबा जी के बहाने, अमीर भारत को देखने आए थे। ये लोग जाते-जाते अपनी गरीबी की निशानी भी इस अमीर भारत को दे गए, जिसे अमीर समाज स्वीकार नहीं कर रहा है। हमारा बिखरा हुआ समाज, जहां अमीर और गरीब में ज़मीन-आसमान का फर्क है।

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