हमारी ब्रा स्ट्रैप से आपकी संस्कृति की सांस क्यों फूलने लगती है?

Posted by Pooja Prasad in Hindi, Society
August 13, 2017

जाने कितने ही लोगों ने की बातें वो बातें जो ज़रूरी है, महत्वपूर्ण है और साथ ही साथ सतही भी है। जाने कितने ही लोगों ने लिखा बेबाक होकर बिलकुल खुल कर पर हुआ कुछ भी नहीं समाज वहीं है उसकी सोच वहीं है। जहां कितने ही सालो से वो सड़-गल कर बदबू दे रही है और उस बदबू से सभी का पाला पड़ता है, मेरा-तुम्हारा हम सब का।

दो दिन पहले की बात है शाम कुछ आठ बजे की। मैं बस से घर जा रही थी। बस से उतरने के बाद मैं अपनी धुन मे घर की तरफ बढ़ रही थी, शाम थोड़ी ज्यादा हो गयी थी तो मैं जल्दी से जल्दी घर पहुंचना चाह रही थी। एक लड़का जो शायद बस से मेरे ही साथ उतरा था वो भी मेरे पीछे-पीछे चलने लगा। कभी मेरे आगे चलता तो कभी मेरे पीछे। कभी आगे चलकर रुक जाता तो कभी बगल मे आकर मुझे देखता। मुझे कुछ अजीब लग रहा था उसे देखकर, थोड़ा सा डर भी लगा। खैर इस सब को देख कर मैं उसे अनदेखा कर रही थी और हम सब ही ज्यादातर ऐसा ही कुछ करते हैं। अक्सर लड़कियों का पीछा करना, उनपर छिंटाकशी करना इतना आम और स्वीकार है समाज में कि हमें बचपन से ही इन चीजों को नजरअंदाज करना सीखाया जाता रहा है।

थोड़ी देर बाद वही लड़का पास आकर मुझे रोकता है और कुछ इशारे से कहता है। पहले थोड़ा सा समझ नहीं पाई। फिर मैंने पूछा कि क्या कोई बात है ?

तो वो चुप रह कर बस इशारा ही करता रहा। मैं रुक गई और इस बार मैं उसका इशारा समझने की कोशिश करने लगी और समझी भी। दरअसल वो मुझे मेरे बांए कंधे से मेरी ब्रा का स्ट्रैप दिखा रहा था जो मेरे कुर्ते से बाहर दिख रहा था। और ये बात बताते समय उसके चेहरे पर अजीब सी हँसी थी। ऐसा लग रहा था  जैसे वो कोई जंग जीता हो या उसने मेरी लुटती हुई इज़्जत बचाई हो या फिर उसने कोई बहुत ही सराहना वाला काम किया हो।

मैं असहज हो गयी। मुझे मंजूर नहीं उसकी ये मुस्कान जो उसने उस वक्त मुझे देख कर दी। मैंने अपनी ब्रा को ठीक नहीं किया जैसे थी वैसे ही रहने दिया और पूछा क्या तुम्हें कोई परेशानी है मेरी ब्रा से? या कोई दिक्कत? अब वो गुस्से में मुझे देखने लगा और धीरे से निकल गया। मैंने उसको पलटकर सवाल किया जिससे मैं थोड़ी ठीक महसूस करने लगी।

ये कोई पहली घटना नहीं है। हमारे घरों में, हमारे दोस्तों के बीच हर जगह देखती हूं कि ब्रा के स्ट्रैप निकले हैं, क्लिवेज दिख रहे हैं, आँचल ठीक कर लो जैसे कमेंट हम सभी लड़कियों को सुनाया ही जाता रहा है।

क्या ज़रूरी है कि आपको अपने ही कपड़ों के लिए बताया जाए और वो भी वो कपड़े जो साधारण हैं और कपड़ों की ही तरह मैं ठुकराती हूं ऐसे लोगों को जो साधारण को साधारण नहीं रहने देते। तुम मुझे रोक कर मुझे बता रहे हो मुझे मेरी ब्रा के बारे मे तुम कोई हक नहीं रखते।

तुम से सवाल है- अगर तुम इतने ही समझदार और शरीफ हो तो बोलो मेरे कंधों के पास क्यों ही नज़रें थी तुम्हारी? लड़कियों के ये साधारण कपड़े धूप में खुले सूखाये नहीं जाते, एक अजीब सा छिपाव दिखता है। दुकानों में आप साधारण तरीके से ये कपड़े खरीद नहीं पाते।

अपने कॉलेज के दिनों में हमने एक नाटक किया था अनसिविलाइज्ड डॉटर्स। उसमें हमने बताने कि कोशिश की थी कि लड़कियों के अंदरुनी कपड़ों को लेकर सहज होने की ज़रूरत है। इन कपड़ों से समाज की सभ्यता और संस्कृति को कोई खतरा नहीं है।

उन सभी मर्दों के लिये, उस समाज के लिये जो इन कपड़े के टुकड़ों से असहज हो जाते हैं, उनकी संस्कृति की सांस फूलने लग जाती है के लिये कुछ लिखा है-

मेरे अंदरुनी कपड़ों,

हां तुम्हें उतार कर फेंका जाऐगा बिना झिझक के एक दिन और सजाया जाएगा घर की दिवारों पर या उन बाल्कनियों पर जहां केवल सजाए जाते हैं कुछ पुराने खाली पिंजरे, जहां सजाए जाते हैं कुछ बेजान प्लास्टिक के पेड़ और कुछ फूल, तुम्हें बरसों से छुपाया जा रहा कभी अपनी गीली सलवार के नीचे तो कभी अपनी कमीज के नीचे, तुम रहे हो हर घर में हर उस अलमारी  के कोने मे जहां अंधेरा ज़्यादा था तुम्हें छुपाया गया है हर उस इंसान से जो तुम्हारे बारे मे जानने को इच्छुक था, क्या हमेशा से केवल तुम्हें छुपाया ही जाऐगा? मैं चाहती हूं तुम भी औरों की तरह यहां वहां पड़े रहो बिना हिचक के और रहो औरों की तरह साधारण जिसे देख रहस्य सा महसूस ना हो।

तुम्हें भी ज़रूरत है धूप की तुम्हें ज़रूरत है साधारण होने की, केवल साधारण

मेरे रहस्यमय कपड़े मेरे अंदरूनी कपड़े !

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