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वाकई तेजस्वी का भाषण कमाल है या मीडिया कन्हैया जैसे विकल्प दिखाता नहीं?

Posted by Sumant in Hindi, Politics
August 1, 2017

नेता प्रतिपक्ष के रूप में लालू के बेटे तेजस्वी यादव के बिहार विधानसभा में दिये भाषण की आम तौर पर और मीडिया के लोगों में भी खूब प्रशंसा हो रही है। लोग उसकी तुलना राहुल गांधी के भाषणों से करते हुए तेजस्वी को 100 में 100 देने को उतावले हो रहे हैं। इसमें अच्छे खासे बुद्धिजीवी भी शामिल हैं।

मैं हैरान हूं लोगों की इस समझ पर। मेरी समझ से यह प्रवृत्ति ठीक उस राजतंत्र वाले बीते समय की गुलाम मानसिकता का प्रतीक है जब लोगों की सोच आमतौर पर राजपरिवार या राजकुमारों की केलि-क्रीडाओं के इर्दगिर्द ही घूमा करती थी। तेजस्वी हो या राहुल ये दोनों ही आज के समय में किन्हीं राजकुमारों से कम हैसियत रखते हैं क्या ? तो ये तुलना तो दो राजकुमारों के बीच की हुई न जिन्हें वाकई मुंह में चांदी का चम्मच लेकर पैदा होने का सुख प्राप्त है।  मगर, हम आज जबकि एक परिपक्व लोकतंत्र में रह रहे हैं तो कम से कम हमारा मानस तो लोकतांत्रिक सोच और समझ के अनुरूप विकसित होना चाहिए। मगर, दुर्भाग्य कि ढेर सारे मामलों में आज ऐसा होता दिख नहीं रहा है।

इन दोनों युवा राजकुमारों के अलावा आज देश में ऐसे कई युवा नेता राजनीतिक फलक पर सितारे की तरह उभरे हैं जिन्होंने गहरे अभाव और अथक संघर्षों के बीच से अपने लिए शानदार जगह बनाई है।

वे अपने तर्कपूर्ण भाषणों से श्रोताओं को आंदोलित करने की ज़बर्दस्त क्षमता रखते हैं। उनमें निश्चय ही सर्वाधिक चर्चित नाम हैं – कन्हैया, जिग्नेश, शेहला, राहिला, चंद्रशेखर आदि। अब यदि तुलना ही करनी है तो तेजस्वी के भाषण के सामने कन्हैया या इनमें से किसी अन्य के भाषण को रख कर क्यों नहीं की जानी चाहिए ? इसलिए कि ये आधुनिक राजघरानों के लाल नहीं हैं ? ये सत्ता के या पूंजी के दलाल भी नहीं हैं बल्कि इनका व्यक्तित्व निर्मित ही हुआ है आवारा पूंजी की दलाली में प्रत्यक्षतः काम करने वाली सत्ता को चुनौती देते हुए।

इसलिए यह आज की आक्रामक आवारा पूंजी तथा केंद्र की सत्ता के लिए भी बहुत ज़रूरी है कि वह राजनीति में अपना प्रतिपक्ष भी उन्हीं आधुनिक राजघरानों के तेज़तर्रार युवाओं में से तैयार करें जो सत्ता-मोह से आगे किसी बुनियादी परिवर्तन के लक्ष्य की ओर तनिक झांके भी नहीं। इसके लिए उनका विशालकाय गुलाम मीडिया-तंत्र जनता के बीच एक मनोवैज्ञानिक-छलावे के निर्माण में अनवरत लगा रहता है कि देखो, यदि तुम्हें प्रतिपक्ष के लिए भी नेता चाहिए तो लो ये रहे तुम्हारे नेता। ये तेजस्वी या राहुल क्या हैं – उन्हीं के तो मोहरे हैं। और, इनके एजेंडे में क्या है – सत्ता-भोग ; और, किसी कारण सत्ता यदि खो गयी तो पुनः उसकी प्राप्ति के लिए युद्ध जैसे छद्म वातावरण के निर्माण की परिस्थितियां तैयार करना।

आज हम ठीक यही सब घटित होते देख रहे हैं। कल तक सत्ता-सुख भोग रहा और भ्रष्टाचार के आरोपों में घिरा तेजस्वी आज प्रतिपक्ष के नायक की क्या शानदार भूमिका में नज़र आ रहा है। और, उसकी यह छवि गढने में राहुल गांधी की राजनीतिक-नाकाबिलियत को भी कितनी सफ़ाई से भुनाया जा रहा है ? गुलाम मीडिया-तंत्र के इस खेल में जनता का एक बड़ा हिस्सा और सुविधाभोगी बुद्धिजीवी- वर्ग भी क्या मज़े से गोते लगा रहा है ! इस पूरे परिदृश्य में आज की परिवर्तनकामी राजनीति के नायकों को मानो किसी तिलस्मी खोह में तिरोहित कर दिया गया है।

तेजस्वी की तुलना में राहुल को खड़ा करने का खेल खेलने वाले जानते हैं कि भूले से भी तेजस्वी के सामने यदि कन्हैया या उस जैसे अन्य परिवर्तनकामी युवा नेताओं को खड़ा करने की ज़रा भी इच्छा जनता के मन में जगी तो तेजस्वी का तेज़ उसी क्षण बालू की रेत की तरह ढह जाएगा।

इसीलिए, तेजस्वी की तथाकथित तेज़ तर्रार छवि गढ़ने के लिए राहुल की नाकाबिलियत का ढिंढोरा जितनी तेज़ी से पीटा जा सके, मीडिया उस दिशा में अपनी सारी ताकत झोंकने में रातदिन लगा हुआ है। आज हमारे सामने यही घटित हो रहा है। और, हम देख रहे हैं कि जनता का एक बड़ा हिस्सा फिलहाल इस बीहड़ मनोवैज्ञानिक-छलावे में अपना विवेक खोता जा रहा है।

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