सिविल कोड पर शुरू हुआ डिबेट हिंदू-मुस्लिम पर क्यों खत्म होता है

भारत देश में अब तक किसी कानून को पारित करने में इतना विवाद नहीं हुआ जितना समान नागरिक संहिता पर हुआ जिसने हिन्दू व मुस्लिम धार्मिक संप्रदाय को सदैव आमने – सामने लाकर खड़ा किया है। समान नागरिक संहिता का नाम आते ही विवाद की स्थिति बनती हैं परन्तु यह मामला विमर्श का है। इस मुद्दे के केंद्र में हमेशा महिला रही है , उसने भेदभाव सहा है। यह सामाजिक सुधार से जुड़ा मुद्दा है , परन्तु इसकी विडंबना यह रही है कि इसे जहां एक ओर ‘इस्लाम धर्म पर अतिक्रमण’, ‘अल्पसंख्यक अधिकार’ खतरे में हैं , के रूप में पेश किया जाता है , वहीं दूसरी ओर राष्ट्रीय एकता के साथ जोड़ दिया जाता है।

विवाह , तलाक , संपत्ति , गोद लेने और भरण – पोषण जैसे मामलों में कुछ समुदायों के अपने पर्सनल लॉ हैं जिन्हें वे न सिर्फ धार्मिक आस्था से जोड़कर देखते है , बल्कि वे इसे अपना संवैधानिक अधिकार मानते हैं। समान नागरिक संहिता के विरोध में मुस्लिम समुदाय की तरफ से जो तीव्र प्रक्रियांए यह आती हैं कि हम भारत के संविधान में आस्था रखते हैं लेकिन विवाह और तलाक हमारा धार्मिक मामला है , इस मामले में हम शरियत के कानून से ही संचालित होंगे, इसमें राज्य हस्तक्षेप ना करें क्योंकि संविधान के अनुच्छेद -25 के तहत धार्मिक स्वतंत्रता का अधिकार हमें प्राप्त है।

यदि मुस्लिम समुदाय का अपने बचाव के पक्ष में यह तर्क है तो हमें अन्य पक्ष पर भी नज़र डालने की ज़रूरत है। क्या यह स्वतंत्रता सिर्फ एक ही धर्म के लिए है ? अगर मुस्लिम समुदायों को लगता है कि ये आपके धर्म में हस्तक्षेप है तो यह सवाल कभी पारसी समुदाय ने क्यों नहीं खड़ा किया, वे तो और भी ज़्यादा अल्पसंख्या में है। 2011 की जनगणना के अनुसार भारत में क्रिश्चन जनसंख्या लगभग 2% है और मुसलमानों की जनसंख्या लगभग 14% तो अब सवाल है कि वास्तविक अल्पसंख्यक कौन हैं?

यह धर्म से जुड़ा मामला नहीं है जिसे के . एम . मुंशी ने संविधान सभा बहस में तार्किक रूप से स्पष्ट किया था और जिस पर्सनल लॉ का वो पालन कर रहे हैं वो दैवीय कानून नहीं है , अपितु मनुष्य द्वारा निर्मित कानून है। यह सिर्फ़ लॉ है और इस लॉ में समय के अनुसार तब्दीली हो सकती है। निजी कानून किसी समाज विशेष को संचालित करने वाली नियमावली होती है जिससे समाज में बदलाव के साथ – साथ परिवर्धन और परिवर्तन होता रहता है। यदि ऐसा नहीं किया जाता है तो विधि और समाज के मध्य जो तारतम्यता होती है , वह समाप्त हो जाती है।

कोई कानून बनाने से किसी समुदाय के रीति – रिवाज ख़त्म हो जायेंगे ऐसा नहीं है रिवाज़ों को ख़त्म करने के लिए कानून नहीं बनाया जा रहा है बल्कि भेदभाव व शोषण को समाप्त करने के लिये कानून बनाया जा रहा है।

समान नागरिक संहिता मात्र सबके लिए समान कानूनों के निर्माण तक सीमित नहीं है अपितु यह एक उपकरण साबित हो सकता है, महिलाओं को सशक्त बनाने में, उन्हें उनके रूढ़िवादी कानूनों की बेड़ियों से आज़ाद कराने में।

अत: इस मुद्दे को हिन्दू कानून आरोपित करने के दायरे से निकालकर समाज सुधार के दायरे में रखकर युक्तिसंगत तर्क – वितर्क करने की आवश्यकता है। इसको लैंगिक न्याय के रूप में लिया जाना चाहियें और समान नागरिक संहिता का मतलब ये नहीं है कि किसी के ऊपर हिन्दू कोड बिल लागू किया जा रहा है। इस कानून का मतलब किसी धार्मिक संप्रदाय की जीवन शैली, व्यवहार में बदलाव नहीं है, मौलवी की भूमिका भी वही रहेगी, चर्च में ही शादी होगी। निजी कानून में यदि कोई ऐसा नियम विद्यमान है जिससे सामाजिक व्यवस्था में अराजकता व्याप्त है तो उसमें सुधार किया जा सकता है।

किसी बात को धर्म का आवरण नहीं पहना देना चाहिये, बल्कि उसकी बुराई को समाप्त कर देना चाहिए। समान नागरिक संहिता में यह भी हो सकता है कि मुस्लिम लॉ एवं क्रिश्चियन लॉ की जो भी अच्छी बातें हो, वे सब उसमें शामिल हो।

यूनिफॉर्म सिविल कोड क्या है ? अभी उसका कोई प्रारूप ही नहीं है। हाल में ही केंद्र सरकार ने लॉ कमीशन से इस मुद्दे पर रिपोर्ट देने को कहा था जिसके लिये 16 प्रश्नों की प्रशनावली विधि आयोग की तरफ से तैयार की गई थी। यह जानने के लिये कि नागरिक संहिता के लिये समाज तैयार है या नहीं। यह जो समस्या है वो केवल अल्पसंख्यक समुदाय की महिला की नहीं है। जब उस महिला के साथ मुस्लिम पहचान जोड़ दी जाती है तब यह प्रॉब्लेमेटिक हो जाता है।

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