#100साल50गांधी: हरिओम थियेटर की राग में बच्चों को सिखा रहे ज़िन्दगी की लय

Posted by Iti Sharan in Hindi, Interviews, Society, Specials
August 26, 2017

एडिटर्स नोट- चंपारण सत्याग्रह के शताब्दी वर्ष के मौके पर YKA आपको मिलवा रहा है हमारे-आपके बीच के उन लोगों से जो अपने स्तर पर ला रहे हैं बदलाव। #100साल50गांधी के नाम से चल रहे इस कैंपेन के तहत अगर आपके आस-पास भी है कोई ऐसा जो है हमारे बीच का गांधी तो हम तक पहुंचाइये उनकी बात ।

मध्यप्रदेश के अशोक नगर का एक घर, जहां ढेर सारे बच्चों का मजमा लगता है। ये बच्चे कभी नाटक करते हैं, कभी ढेर सारी मस्ती, तो कभी देश-दुनिया की तमाम चर्चाएं। इन बच्चों की उम्र भले ही छोटी हो मगर साहित्य और देश-दुनिया का ज्ञान तो इन्हें इस कदर है कि बड़े-बड़ों को मात दें। ये घर है हरिओम राजोरिया का। इंडियन पीपुल्स थियेटर (इप्टा) के सक्रिय सदस्य हरिओम और उनकी पत्नी सीमा राजोरिया पिछले कई सालों से अशोक नगर के बच्चों के साथ काम कर रही हैं और इनका आशियाना इन सभी बच्चों का घर बन चुका है।

हरिओम के घर में इन बच्चों के लिए सिर्फ एक कमरा ही नहीं है बल्कि एक सार्वजनिक लाइब्रेरी भी है, जहां कोई भी कला और साहित्य प्रेमी अपना पूरा वक्त गुज़ार सकता है। अशोक नगर के ही इप्टा के एक सदस्य का कहना है कि अगर आप साहित्य या कला प्रेमी हैं तो हरिओम जी का घर आपके लिए हमेशा खुला रहता है। ना सिर्फ नाटक के रिहर्सल के दौरान बल्कि कई बार नाटक करने के बाद भी पूरी मंडली उनके घर पर ही अपना डेरा जमाई रहती है, यहां खाना पीना सब चलता है, पूरा महौल एक परिवार जैसा होता है।

आइए इस बार #100साल50गांधी में मिलते हैं हरिओम राजोरिया से।

हरिओम राजोरिया का कहना है कि जब तक आप अपने परिवार अपने जीवन को शामिल नहीं करेंगे तब तक आप नाटक या कोई भी सामाजिक काम नहीं कर सकते। मेरे लिए इप्टा और ये बच्चे मेरे परिवार ही हैं। जहां तक रही बात मेरे घर के इस कमरे की तो हमने अपना घर बनाते समय उसमें एक हॉल बना दिया और वो अपने आप ही नाटक के लिए इस्तेमाल होने लगा। हमने देखा है, आप जब जनता के लिए नाटक करते हैं तो आपके सामने सबसे बड़ी चुनौती रिहर्सल की जगह की होती है। इन चुनौतियों से हम गुज़र चुके थे इसलिए मेरे घर का एक कोना इन चीज़ों के लिए इस्तेमाल होता है तो ये मेरे लिए खुशी की बात है।

हरिओम अपने घर में सार्वजनिक लाइब्रेरी के बारे में बात करते हुए कहते हैं, “जी हां, मेरे घर में एक लाइब्रेरी भी है। जहां कोई भी कला प्रेमी, साहित्य प्रेमी अपना वक्त गुज़ार सकता है। हम लोगों का मानना है कि किसी भी इंसान के सामाजिक विकास के लिए उसका मानसिक विकास बहुत ज़रूरी है और उसके लिए किताबें सबसे अच्छा साथी है। लेकिन, यह लाइब्रेरी अकेले मेरे या मेरी पत्नी के सहयोग से संभव नहीं हुआ है, बल्कि हमारे कई साथियों के सहयोग से इस लाइब्रेरी में किताबों का संग्रह संभव हो सका।”

इन सबकी शुरुआत के बारे में पूछे जाने पर उन्होंने बताया, “ये वो दौर था जब अशोकनगर का साहित्य या रंगकर्म से कोई वास्ता नहीं हुआ करता था। हम कुछ युवाओं का साहित्य और कला के प्रति काफी रूझान था। हमारे यहां उस वक्त लेखक और कवियों के ग्रुप प्रगीतिशिल लेखक संघ (प्रलेस) की एक इकाई आ चुकी थी। प्रलेस से जुड़ने के बाद हमें इप्टा के बारे में पता चला और हम कुछ युवाओं ने अपने शहर में इप्टा की एक इकाई खोली। इप्टा यानी इंडियन पीपूल्स थियेटर के तहत हम जनगीत, जन-नाटक तैयार करते थे। हम समाज के लिए नाटक करते थे, सामाजिक बदलाव के लिए। इस विचार को आगे बढ़ाने के लिए बच्चों को जोड़ना ज़रूरी था। इसी सोच के साथ हमलोगों ने अशोक नगर के बच्चों के साथ काम करना शुरू किया और 1998 में पहली बार हमलोगों ने बच्चों का शिविर लगाया।”

हरिओम बताते हैं कि ये बच्चे मज़दूर वर्ग, श्रमिक वर्ग से आते हैं। ज़ाहिर सी बात है इन सामाजिक बैकग्राउंड से आने वाले बच्चों के सामने आर्थिक स्थिति एक बड़ी समस्या होती है, जिसका असर उनकी शिक्षा पर भी पूरा पड़ता है। लेकिन, हमलोग इन बच्चों को ना सिर्फ नाटक की शिक्षा देते हैं बल्कि इन बच्चों के लिए लगातार सामाजिक और साहित्यिक माहौल भी बनाते हैं। जिसका फायदा भी सकरात्मक रूप में देखने को मिलता है। हमारे यहां के बच्चे आज देश-विदेश में अपनी प्रतिभा का परचम लहरा रहे हैं।

हरिओम का कहना है कि जब आप इप्टा जैसे सामाजिक संगठन से जुड़े रहते हैं तो खुदबखुद समाज के लिए कुछ करने का भाव आपके अंदर पैदा हो जाता है। शुरुआत से ही जनता के लिए नाटक करने के कारण हमें सामाजिक जीवन जीने की आदत सी हो गई है।

अंत में हरिओम कहते हैं कि कोई भी अकेले हीरो नहीं होता। एक सामूहिक प्रयास से ही कोई उद्देश्य पूरा हो सकता है। आज अगर मैं इन बच्चों के लिए कुछ कर पा रहा तो उसके पीछे मेरे कई साथियों का योगदान है।

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