वे 9 मुद्दें जिनपर आपने जुलाई में YKA पर बेझिझक कही अपनी बात

Posted by Prashant Jha in Hindi, Staff Picks
August 4, 2017

हर वो बात जिससे आपका सरोकार है उसपर ज़रूरी है आपकी राय। Youth Ki Awaaz में हम जानते हैं कि जब आप कहते हैं तो बात पहुंचती है और लोग सुनते हैं।

जुलाई का महीना Youth Ki Awaaz हिंदी के लिए इसलिए भी खास था क्योंकि इस महीने हमसे बहुत सारे फर्स्ट टाइम यूज़र जुड़ें और बेबाकी से अपनी बात कही। हम उनमें से छांट कर लाए हैं वो 9 मुद्दे जो बेहद ज़रूरी हैं और जिनपर आपने बेझिझक कही अपनी बात

देश की संस्कृती बनता वंशवाद-

वंशवाद जिसे इंग्लिश में  नेपोटिज़्म कहते हैं उसे हमारे देश में ऐसी स्वीकृति मिली कि हम में से बहुतों को इसमें कुछ भी गलत नहीं नज़र आता। इस मुद्दे पर देश फिर से तब बहस करने लगा जब IIFA अवॉर्ड्स के दौरान सैफ अली खान, करण जौहर और वरुण धवन ने स्टेज से कंगना का मज़ाक उड़ाया और नेपोटिज़्म रॉक्स के नारे लगाए। कंगना ने जवाब दिया और ज़बरदस्त जवाब दिया और नेपोटिज़्म के हिमायतियों को आईना दिखाया।

इस मुद्दे पर प्रीति परिवर्तन ने कंगना के पक्ष से अपनी बात रखते हुए, नेपोटिज़्म की खिलाफत की। अपने एक लेख में उन्होंने बताया कि जो लोग चांदी की चमची लेकर पैदा नहीं होते उनकी सफलता कितनी अलग होती है। प्रीति ने अपने लेख में बेहद ही गंभीरता से ये बात समझाने की कोशिश की कि कैसे हमारे देश में हर क्षेत्र में परिवारों के घराने बने हैं जो किसी भी नए इंसान को जो इन परंपराओं को तोड़कर खुद अपनी पहचान बनाना चाहते हैं उसे रोकते हैं।

क्योंकि कंगना ने कभी नहीं कहा, ‘जानता है मेरा बाप कौन है’

राजनीति से लेकर सिनेमा तक हर जगह चर्चा बस परिवारवाद की ही है। राजनीति में परिवारवाद पर कई बार सवाल उठे हैं, आए दिन चर्चाएं भी होती हैं, भले ही वो बेनतीजा रही हो। लेकिन बॉलीवुड में परिवारवाद पर इस रूप में चर्चा पहली बार हुई। आइफा अवार्ड के दौरान


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अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ते सारंडा के आदिवासी

झारखंड के सारंडा इलाके के आदिवासी कुपोषण और खराब पानी की समस्या से लगातार जूझ रहे हैं। इलाके के ज़्यादातर बच्चे कुपोषित हैं जिसकी पुष्टी यूनिसेफ भी कर चुका है। समस्या ये है कि सरकारें आती जाती रहती हैं लेकिन जो नहीं बदलता वो है इन आदिवासियों की लगातार खराब होती हालत। सुविधा के नाम पर इतना ही मयस्सर है इस गांव के लोगों को कि वो आज भी कीड़े खाने के मज़बूर हैं। खराब पानी की वजह से लोगों के नाखूनों तक में संक्रमण हो चुका है।

संजय मेहता जो एक LLB छात्र हैं उन्होंने इलाके की ग्राउंड रिपोर्ट सामने लाने की ठानी और अकेले ही सारंडा और आसपास के इलाकों के आदिवासियों से मिलने जा पहुंचे। संजय तस्वीरों और रिपोर्ट्स के माध्यम से इलाके में स्कूल, अस्पताल, खाद्य सामाग्री जैसी चीज़ों की पूरी तरह से अनुपलब्धता को सामने लाते हैं। संजय लगातार इस इलाके को लोगों से  मिल रहे हैं और ग्राउंडरिपोर्ट्स YKA पर पब्लिश कर रहे हैं।

ज़िंदा रहने की लड़ाई लड़ते झारखंड के सारंडा के आदिवासी

झारखंड के कोल्हान क्षेत्र के अंतर्गत सारंडा एवं आस-पास के क्षेत्रों में आदिवासियों की हालत चिंताजनक है। आदिवासियों की स्थिति को नज़दीक से जानने-समझने के लिए मैं इन दिनों झारखंड के नक्सल प्रभावित सारंडा वन क्षेत्र में हूं। मैं यहां गांव-गांव जाकर आदिवासियों के बीच समय बिताकर उनकी स्थितियों का


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अगर अयोध्या और अखलाक ना हुआ होता तो हम क्या डिस्कस करते?

किसी ने कभी आपसे सवाल किया है कि 89 से 95 का दौर आपको किस चीज़ के लिए याद है? अधिकतर जो जवाब मिलता है वो बाबरी मस्जिद और राम मंदिर विवाद का ही मिलता है। या आपसे कोई पूछे कि दादरी को किन वजहों से जाना जाए तो अखलाक के सिवा कोई वजह याद नहीं आती। जबकि 90 से 92 के दौर में ही भारत आर्थिक उदारीकरण यानी कि लिबरलाइजेशन के दौर से गुज़र रहा था। दादरी को भी हमने तब जाना जब भीड़ ने अखलाक की हत्या कर दी, हमने कभी वहां के किसानों के साझा विद्रोह की कहानियां पढ़ी ही नहीं।

मसूद रीज़वी ने ऐसी तमाम घटनाओं को अपने लेख में समेट कर एक समानांतर तस्वीर दिखाने की कोशिश की है। मसूद आपसे सवाल भी करते  हैं और आपके सवालों का जवाब भी देते हैं। मसूद ने इस ओर भी आशंका ज़ाहिर कि क्या हर बार ज़रूरी मुद्दों से ध्यान भटकाने के लिए ही तो नहीं इस तरह की घटनाएं प्रायोजित करवाई जाती है? सोचने लायक बात ये है कि अगर हमारा देश इन बिखराव वाली घटनाओं की चपेट में ना आता तो शायद इस देश का युवा उन मुद्दों पर बहस कर रहा होता जो शायद इस देश की मौजूदा बहस को बदल सकता था।

जुनैद, अयोध्या या अखलाक, मुद्दे नहीं बनते तो हम क्या चर्चा कर रहे होते?

रविवार 9 जुलाई 2017, हम लखनऊ के अनुराग लाइब्रेरी हॉल में सईद अख्तर मिर्ज़ा द्वारा निर्देशित 1989 की फिल्म, ” सलीम लंगड़े पे मत रो ” देख रहे थे। अभी कुछ ही दिनों पहले रेलगाड़ी में भीड़ द्वारा जुनैद की निर्मम हत्या की खबर आई थी और सारे देश में


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राजनीति में यंग ऑप्शन ढूंढ रहा है यंग इंडिया

हमारे देश में युवा नेता का ज़िक्र आते ही आज भी पहला नाम राहुल गांधी का आता है, अखिलेश भी खुद को युवा नेता बताते हैं और तीसरा नाम शायद आप गिन भी ना पाएं। हालांकि इसका ये मतलब नहीं कि हमारे पास विकल्प नहीं। दिक्कत ये है कि जो विकल्प है उसे हमारा सिस्टम हमें स्वीकारने नहीं देता। किसी भी काम में नई सोच के साथ बदलाव नहीं लाना उस काम के महत्व को खत्म कर देता है। यही स्थिति हमारी राजनीति पर भी लागू है। किसी भी पार्टी में युवा नेताओं का महत्व एक चेहरा मात्र से ज़्यादा नहीं दिखता, और वो चेहरे भी किसी बड़े चेहरे के वंशज ही होते हैं।

अजय पंवार अपने आर्टिकल में कन्हैया का उदाहरण देकर यही स्पष्ट करने की कोशिश कर रहे हैं। अजय का कहना है कि कन्हैया जैसे युवा नेता जो छात्रों के बीच से निकले हैं और ज़मीनी स्तर पर काम करके, खुद के संघर्ष से आगे आए हैं वो राजनीति के दिग्गज कहे जाने वाले कई नेताओं से बेहतर नज़रिया रखते हैं। युवा नेताओं के आने से राजनीतिक माहौल कैसे बदल सकता है अजय ने ये भी अपने लेख में बखूबी बताया है।

राजनीति में धृतराष्ट्र बन चुके नेताओं से बेहतर हैं कन्हैया कुमार

“First they ignore you, then they laugh at you, then they fight you, then you win.”


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कुछ फिल्में आज भी समाज का आईना हैं

कुछ ही फिल्में आती हैं जो इस देश की महिलाओं की कामनाओं और इच्छाओं को जगह देती है। जब ऐसा होता है तो उस फिल्म पर चर्चा होना भी लाज़मी है। लिप्सिटिक अंडर माय बुर्का ऐसी ही एक फिल्म आई। फिल्म में समझाया गया कि सेक्स मर्दों की बपौती नहीं है कि जब चाहा जैसे चाहा उसपर बात की और अगर किसी महिला को इसपर बात करते सुना तो उसको चरित्रहीन बता दिया। खैर फिल्म का इसलिए भी इंतज़ार था क्योंकि सेंसर बोर्ड इसे असंस्कारी बता चुका था। और असंस्कारी भी इसलिए क्योंकि एक महिला प्रधान फिल्म कैसे बना दी गई और महिलाओं की फैंटसी को कैसे दिखा दिया गया।

निलेश ने फिल्म को समाज से जोड़ते हुए बेहतरीन समीक्षा की। निलेश आपसे कहते हैं कि फर्ज़ करिए कि फिल्म में वो तमाम किरदार जिनके इर्द गिर्द फिल्म चलती है वो पुरुष होतें तो फिर कितने आराम से ये फिल्म रिलीज़ भी हो जाती और ना कोई विवाद होता। ज़ाहिर है इस देश में सेक्शुअल आज़ादी तो सिर्फ पुरुषों को ही है उस बीच ऐसी फिल्म आना जो महिलाओं की डिज़ायर्स की बात करता है उसका विवादों में आना तो तय था ही। लेकिन इस फिल्म और ऐसी सब्जेक्ट के लिए इस फिल्म निर्माण से जुड़ा हर शख्स बधाई के पात्र हैं।

ओ माई गॉड! बुर्के के अंदर लिपस्टिक वाली औरतें तो बड़ी बेशरम निकलीं!

अच्छा तो एक माहौल सोचिए। एक 50 पार कर चुके बुढ़ऊ हैं। जवानी से ही फंतासी वाली किताबें (अश्लील साहित्य) पढ़ने का शौक है और पत्नी के स्वर्ग सिधारने के बाद 26 साल की एक लड़की को पसंद करते हैं। इसमें कौन सी बुरी बात है? कुछ खास नहीं न?


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इस देश में महिला होकर राजनीति में आना क्या होता है

कई दफा जो दिखता है वो होता नहीं है। ये मान लेना लाज़मी है कि जो महिलाएं राजनीति में हैं वो सशक्त हैं। लेकिन साहब राजनीति भी समाज का ही हिस्सा है और जिस देश का समाज महिलाओं को महज़ दोयम दर्ज़ा देता हो वो राजनीति में उसे सशक्त कैसे होने देगा? महिलाओं का चरित्र हनन करना शायद इस देश के पुरुषों की आदत में शामिल है।

पंखुड़ी भी इससे अछूती नहीं हैं। उनका निजी अनुभव रहा है जब पिछले साल ही BJP नेता प्रेम शुक्ला ने पंखुड़ी पर आपत्तिजनक टिप्पणी की थी। समाजवादी पार्टी प्रवक्ता पंखुड़ी पाठक ने अपने निजी अनुभवों को समेटते हुए बताया है कि राजनीति में महिला होना कितना मुश्किल होता है। पंखुड़ी ने उस पुरुष प्रधान सोच को भी सामने रखा जो किसी भी महिला को किसी बड़े ओहदे पर देखना स्वीकार नहीं कर सकता। एक सोच जो बड़ी ही आम सी हो गई है इस देश के पुरुषों में चाहे वो स्कूल जाने वाला एक बच्चा हो या राजनीति के दिग्गज खिलाड़ी कि अगर कोई महिला आगे बढ़ी है तो कहीं ना कहीं तो समझौता किया होगा, पंखुड़ी का ये लेख उस सोच को भी लानत भेजता है।

बेहद मुश्किल है राजनीति में एक महिला होना: मेरा अनुभव

महिला आरक्षण बिल सालों से सदन में धूल खाते-खाते कालातीत हो चुका है। सच तो यह है कि इसको पारित कराने में ना ही राजनीतिक पार्टियों को दिलचस्पी है और ना ही समाज के बड़े तबके को। पंचायत में आरक्षण के बाद महिलाओं के सशक्तिकरण और अच्छे प्रदर्शन के कई


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पीरियड्स छी…छी…

पीरियड्स पर हाल के दिनों में काफी लिखा जान लगा है। YKA के साथ साथ कई अन्य वेबसाइट्स ने पीरियड्स पर चुप्पी तोड़ने और पीरियड्स पर चर्चाओं को सहज बनाने के लिए मुहिम चलाई। पीरियड्स या माहवारी हमारे देश के कुछ उन मुद्दों में अभी भी बना हुआ है जिसे डिस्कस करना गंदी बात समझा जाता है।

श्रुति गौतम ने अपने पहले पीरियड की कहानी बताते हुए लिखा कि कैसे उनके पहले पीरियड के दौरान किसी ने उन्हें सहजता से इसके बारे में नहीं बताया और वो यही सोचती रहीं कि ये कोई बीमारी है। श्रुति ने ये भी बताया कि कैसे कोई जानकारी नहीं होने की वजह से उन्हें लगा कि पीरियड्स उनकी गलती है और वो अपराधबोध से भर गईं। इस लेख में इस बात का भी ज़िक्र है कि कैसे इस दौरान एक लड़की शारीरिक और भावनात्मक बदलाव के दौर से गुज़र रही होती है और अगर कोई बेहद ही प्यार और सहजता से पीरियड्स के बारे में, हेल्थ के बारे में बात करे तो कितना बेहतर हो सकता है। श्रुति बताती हैंं कि बजाए बात करने के लोग महज़ अंधविश्वासों को बढ़ावा देते हैं जैसे कि पीरियड्स के दौरान पुरुषों को नहीं छूना, खाना नहीं बनाना, अचार नहीं छूना वगैरह। श्रुति का यह निजी बयां पढ़ा जाना चाहिए और समझा जाना चाहिए कि किसी प्राकृतिक शारिरिक प्रक्रिया को लेकर इतनी वर्जनाएं हमें एक समाज के तौर पर कितना पिछड़ा हुआ साबित करती है।

और इस तरह मेरे पहले पीरियड की कहानी अपराधबोध भरी थी

आज भी हमारे छोटे से कस्बे में पीरियड्स खुसुर-पुसुर करने वाला ही विषय है। आज भी लड़कियों को इन दिनों के दौरान शारीरिक तकलीफों के साथ-साथ मानसिक तकलीफों से गुजरना पड़ता है। आज भी घर जाकर हम बता दें कि पीरियड्स चल रहे हैं तो हमारा सोने के बिस्तर से


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मध्यप्रदेश से अजब-गजब पुलिसिया कार्रवाई कि ग्राउंड रिपोर्ट

कभी किसी अपराध की सज़ा, अपराधी का घर तोड़ना सुना है क्या? इंदौर में ऐसा ही हो रहा है। इंदौर पुलिस ने अपराधियों को आर्थिक रूप से कमज़ोर करने के लिए एक मुहिम चलाया है जिसमें अगर कोई लगातार अपराध करने वाला शख्स है तो नगर निगम और पुलिस मिलकर उसका घर ढाह रही है।

अंकित ने इस रिपोर्ट के ज़रिए इस इंदौर पुलिस के इस नए मुहिम की जानकारी दी। अंकित ने इस मुहिम में जिनके घर तोड़े गए हैं उन लोगों से भी बात की और उनके पक्ष को भी जाना। लेख में पुलिस के ऐसे कदम को गैरज़रूरी और गैरकानूनी बताया गया है। अपराध की सज़ा के तौर पर अपराधी का घर तोड़ना शायद ही किसी कानून में है। हालांकि जब YKA ने इस बात की तस्दीक करने के लिए मुहिम शुरू करने वाले DIG इंदौर हरिनारायणचारी मिश्रा से बात की। उन्होंने बताया कि नगर निगम और पुलिस उन्हीं अपराधियों का घर ढाह रही है जिन्होंने सरकारी ज़मीन पर गैरकानूनी तरीके से कब्ज़ा किया है और उन्हीं अपराधियों के घर तोड़े जा रहे हैं जो लगातार अपराध में लिप्त हैं और अपने घर से भी ड्रग्स बेचने जैसे अपराधों को अंजाम दे रहे हैं।

अपराधियों को सज़ा देना था तो ढहा दिए उनके घर, इंदौर में ये कैसा इंसाफ?

एडिटर्स नोट- इस मसले पर Youth Ki Awaaz ने DIG इंदौर, हरिनारायणचारी मिश्रा से बात की। उन्होंने बताया कि नगर निगम और पुलिस उन्हीं अपराधियों का घर ढाह रही है जिन्होंने सरकारी ज़मीन पर गैरकानूनी तरीके से कब्ज़ा किया है और उन्हीं अपराधियों के घर तोड़े जा रहे हैं जो


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हाय राम ये समाज क्या कहेगा, वाली हदों को तोड़ती शारदा दहिया

अपने देश में अभी भी बेटी के जन्म लेने पर एक बड़े वर्ग की चिंता यही होती है कि किसी तरह शादी हो जाए, या पढ़-लिख कर क्या करना है शादी ही करवा देंगे। भले ही शहरी क्षेत्र में रहकर ये बातें सुनने में भी अजीब लगे लेकिन ग्रामीण भारत में आज भी तस्वीर बदली नहीं है।

शारदा दहिया ने YKA पर अपने पहले आर्टिकल में समाज को और उन मांओं को खुली चुनौती दी जो समाज क्या कहेगा वाले इस कॉन्सेप्ट को अपनाते हैं। शारदा के इस निजी बयां में उन तमाम लड़कियों के लिए एक संदेश भी है जिनकी इच्छाओं को हर रोज़ समाज का डर दिखा दिखा कर दबा दिया जाता है। शारदा ललकार कर कहती हैं कि एक दिन ये पिंजरा टूटेगा और आर्थिक सशक्तता की ओर कदम रखते हीं ये समाज क्या कहेगा वाले ढकोसले को लड़कियां पटखनी दे देंगी।

देखना माँ, एक दिन ‘लोग क्या कहेंगे’ वाले तुम्हारे समाज को छोड़ उड़ जाउंगी

हर कहानी के कुछ किरदार होते हैं, उनके रूप की, रंगत की पहचान होती है। जैसे वो डायन की हंसी वाली या वो गऊ सरीखी या वो मोहिनी फलां-फलां। हमारी मिडिल क्लास फैमिली में कहानी के किरदार तो होते हैं, मगर उनके अक्स नहीं होते। हर तीर चुभेगा ज़रूर मगर


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