आखिर आज मीडिया पर हमले क्यों हो रहे है ?

Self-Published

1984 के लोकसभा चुनाव के बाद, कई ऐसे लोकसभा चुनाव हुये जँहा किसी भी पार्टी को पूर्ण बहुमत नही मिला और इसी के कारण NDA और UPA जैसे राजनीतिक पार्टी के गठजोड़ हकीकत में आये जँहा बड़ी राजनीतिक पार्टी के साथ कई क्षेत्रीय राजनीतिक पार्टियां जुड गयी और एक साँझा चुनावी घोषणा पत्र जारी करके राजनीतिक गठजोड़ की बुनियाद पर चुनाव लड़े भी गये और इसी तर्ज पर सरकार का गठन भी हुआ जँहा अमूमन हर गठजोड़ में शामिल हर पार्टी का नुमाइंदा मंत्रिमंडल में बतोर मंत्री भी शामिल हुआ, यँहा जिस राजनीतिक पार्टी के पास जितने विजयी सांसद थे उसी अनुपात में उसके।मंत्री बनाये गये, लेकिन साल 2014 के ऐतिहासिक चुनाव जो इन्ही NDA और UPA गठजोड़ के बीच लड़ा गया और जीत NDA की हुयी लेकिन NDA में शामिल सबसे बड़ी पार्टी भाजपा ने जादुई बहुमत का आंकड़ा अपने दम पर हाशिल कर लिया जँहा बीजेपी इतनी मजबूत स्थीति में आ गयी की ये अपने दम पर केंद्र में सरकार बना सकती थी. वही दूसरे नंबर पर रही कांग्रेस को 50 से भी कम सीट मिली ये संख्या इतनी कम थी की नियमो के चलते ये विपक्ष के नेता का पद भार अदिग्रहन भी नही कर सकी, मसलन 2014 में भारत के इतिहास में एक ऐसी सरकार की रचना हुई जँहा एक तरह से विपक्ष नदारद था.

लेकिन उन कारणों का अध्ध्यन करना बहुत आवयश्क है की ऐसे क्या हालात बन गये जिसकी वजह से साल 2014 में बीजेपी को नरेंद्र मोदी के रूप में इतनी बड़ी जीत हाशिल हुई वही दूसरी सबसे बड़ी पार्टी कोंग्रेस सदन की कुल सीट के अनुपात के आधार पर भी 10% सीट लेने में भी नाकामयाब रही, इसके लिये साल 2008 से हालात और हुई घटनाओं का जायजा लेना बहुत जरूरी है और इसी के अंतर्गत भारतीय मीडिया भी एक मजबूत माध्यम के रूप में उभर कर आती है जो इतना शक्तिशाली है की सरकार को बचा भी सकता है और इसका तख्ता।भी पलट सकता है, साल 2008 से लेकर साल 2009 के लोकसभा चुनावों के परिणाम आने तक 4 घटनाये ऐसी होती है जिसने देश के हर नागरिक को सोचने के लिये मजबूर कर दिया था और कटघरे में थी UPA की सरकार और विपक्षी दल बीजेपी, सबसे पहले साल 2008 में आयी विश्व स्तरी आर्थिक मंदी जँहा भारत भी इस से बच नही पाया लेकिन उस समय के प्रधानमंत्री श्री मनमोहन सिंह जो जाने माने अर्थशास्त्री भी है इनके प्रयासों से भारत पर इस आर्थिक मंदी का ज्यादा बुरा प्रभाव नही पड़ा, इसके बाद पाकिस्तान समर्थक आंतकवादी हमला जिसने।मुंबई को दहला दिया और टीवी मीडिया ने इस हमले को हर कोण से दिखाया, यँहा तीन दिन के लिये मीडिया ने भारत देश को रोक दिया था और कटघरे में थी उस वक़्त।की मनमोहन सरकार जिस की आलोचना आम नागरिक से लेकिन विपक्षी दल भी कर रहे थे और इसमे मीडिया सबसे ज्यादा प्रभावी हमला बोल रहा था.

इसी बीच 2009 के लोकसभा चुनाव का आगाज हो गया और इस चुनाव में UPA ने अपने प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार सरदार मनमोहन सिंह को बनाया और NDA ने बीजेपी के नेता श्री लालकृष्ण आडवाणी जी के नाम पर और इन्ही के नेतृत्व में इस चुनाव को लड़ने का फैसला किया, चुनाव के दरम्यान दो घटनाये होती है, एक जगह कांग्रेस की प्रेस कांफ्रेंस में 1984 के दंगों में नामजत आरोपी सज्जन कुमार और जगदीश टाइटलर को कांग्रेस द्वारा टिकिट दिये जाने के रोष।में एक सिख पत्रकार ने कांग्रेस के वरिष्ठ नेता श्री चिंदबरम की तरफ अपना जूता उछाल दिया, ये खबर लगातार कई घँटों तक टीवी मीडिया पर छाई रही फलस्वरूप कांग्रेस ने इन सभी विवादित व्यक्ति को टिकिट ना देने का फैसला किया, वही इसी चुनाव के दरम्यान उत्तरप्रदेश की एक संसदीय सीट पर बीजेपी के उम्मीदवार और गांधी परिवार के सदस्य पर ये आरोप लगे की उन्होंने पीलीभीत में एक चुनावी सभा के दौरान अल्पसंख्यंक समुदाय के विरोध में विवादित बयान दिया है इसकी एक सीडी भी टीवी चैनल।पर दिखाई जा रही थी जँहा तस्वीर और आवाज उलझी हुई तस्वीर को पेश कर रहे थे, ये सीडी इस चुनाव में पूरी तरह से छाई रही.

खेर यँहा।चुनावी नतीजो ने चुनावी पंडितो की सभी भविष्य वाणियो को गलत साबित कर दिया, सरदार मनमोहन सिंह के रूप में UPA और कांग्रेस को जीत हाशिल हुई यँहा UPA, खासकर कांग्रेस के सांसदों की संख्या साल 2004 चुनाव से भी ज्यादा थी, वही अक्सर आडवाणी जी द्वारा कमजोर प्रधानमंत्री कहे जाने वाले मनमोहन सिंह से हुई करारी हार से, आडवाणी जी का राजनीतिक कद भाजपा और आरएसएस दोनों जगह कम हो रहा था, जँहा कांग्रेस सरकार की रचना की रुपरेखा तैयार कर रही थी वही भाजपा नेताओं के चक्कर आरएसएस के दरबार में बहुत ज्यादा लग रहे थे, यँहा सरदार मनमोहन सिंह।लगातार दूसरी बार भारत देश के प्रधानमंत्री के रूप में विराजमान हो रहे थे वही आडवाणी जी सदन में विपक्षी दल के नेता का मान भी खो चुके थे.

जंहा साल 2004 से 2009 के कार्यकाल में मीडिया के हाथ कोई ऐसा ठोस मुद्दा नही लगा जिससे UPA के इस कार्यकाल पर कोई सवाल उठाया जा सके लेकिन साल 2009 से 2014 तक, इस कार्यकाल में ऐसे कई अवसर आये जँहा देश का मीडिया, खासकर टीवी का पत्रकार और कैमरा, अपनी।मौजूदगी का एहसास पूर्ण रूप से करवा रहा था, साल 2010 से लेकर 2012 तक तीन आंदोलन हुये जिसने भारत की राजनीती का एक नया अध्याय लिखा, जन लोकपाल से गांधीवादी समाज सेवी अन्ना ने अपनी पहचान पूरे भारत देश में करवाई वही इसी आंदोलन से अरविंद केजरीवाल से भी देश की जनता रूबरू हुई, जन लोकपाल का कानून बनाने के लिये की गयी इस अहिंसक मुहीम में ज्यादा तर लोगो को इस कानून के बारे में पता भी नही था लेकिन मीडिया द्वारा की गयी इसकी कवरेज से देश का हर नागरिक इससे जुड़ रहा था, ये मीडिया की ही ताकत थी जो जनलोकपाल का आंदोलन जंतर मंतर से लेकर लाल किले तक अपनी ताकत मनवा रहा था, देश की जनता खासकर नोजवान हाथ में तिरंगा लेकर जन लोकोपाल की अहिंसक लड़ाई में मोर्चा संभाल रहा था, वही मनमोहन सिंह की UPA सरकार राजनीतिक ब्यान बाजी से ज्यादा कुछ करने में असमर्थ थी. मसलन ये पहला मौका था जब सरकार की किरकरी आम जनता में होना शुरू हो गयी थी.

इसी के बाद लाल किले से बाबा रामदेव ने काले धन के खिलाफ आंदोलन किया जिसे UPA सरकार ने बल पूर्वक निपटा, यँहा भी मीडिया मौजूद था और यही मीडिया था जो कैद में लिये गये बाबा राम देव को सलवार शूट के पहनावे की तस्वीर को एक आम नागरिक तक पहुंचा रहा था, बाबा को इस हालात में UPA सरकार द्वारा हवाई जहाज से उत्तराखंड छोड़ा गया, यँहा भी मीडिया के माध्यम से UPA सरकार की बहुत ज्यादा निंदा हुई खासकर बाबा रामदेव के साथ जिस तरह UPA सरकार पेश आयी, ये कही ना कही एक आम नागरीक को रास नही आ रहा था.

इसी के पश्चात, एक ऐसी शर्मनाक घटना दिल्ली की सड़क पर चलती हुई बस में अंजाम दी गयी, जिस से सारा देश दहल गया था, निर्भया के साथ हुये इस ब्लातकार ने दिल्ली की सड़कों पर एक बार फिर समाज का गुस्सा दिखाई दिया,इस वक़्त दिल्ली में भी कांग्रेस की सरकार होने से, एक आम नागरिक कांग्रेस से मुह फेर रहा था और अपनी सुरक्षा के प्रति सरकार को दोषी मान रहा था, निर्भया कांड से सरकार पर चौतरफा शब्दो के हमले हो रहे थे और इसमें सबसे ज्यादा मीडिया ही था जो सरकार को जनता के कटघरे में खड़ा कर रहा था.

इस समय दौरान 2जी से लेकर कॉमन वेल्थ गेम के आयोजन में केंद्र और दिल्ली की कांग्रेस सरकार पर भर्ष्टाचार के बहुत ज्यादा गंभीर आरोप लगे जिनकी पक्की निशानदेही हमारा।मीडिया ही कर रहा था, इसी बीच।मुजफ्फरनगर में हुई जातीय हिंसा जँहा अल्पसंख्यक समुदाय का बहुत ज्यादा जान माल का नुकशान हुआ, मसलन 2009 से लेकर 2014 के कार्यकाल में मनमोहन सिंह की UPA सरकार पूर्ण रूल से मीडिया के निशाने पर रही, यही वजह थी की एक आम नागरीक इस बार अपनी वोट से UPA सरकार को ध्वस्त करने का मन बना चुका था, इसी बीच भाजपा ने 2014 के लोकसभा चुनाव के सिलसिले में श्री नरेंद्र भाई मोदी को अपना उम्मीदवार घोषित कर दिया, यँहा।चुनावी सभा में मीडिया का कैमरा मोदी जी को हर कोण से दिखा रहा था और इनके द्वारा किये जा रहे सुनहरे दिन के वादे जँहा सुरक्षा, शिक्षा, रोजगार, इत्यादि हर तरह से समाज को लुभाया जा रहा था.

अगर ध्यान से देखै तो मीडिया ही एक वजह थी जिसने इतनी बड़ी संख्या में मोदी जी के रूप में भाजपा को विजयी बनाया और कांग्रेस हाशिये पर चली गयी लेकिन अगर वोट का अनुपात देखे तो  NDA और UPA में ज्यादा फर्क नही था, इस अनुपात का थोड़ा सा भी कम होना NDA के लिये राजनीतिक समीकरण बदल भी सकती थी.

साल 2014 में प्रधानमंत्री के रूप में शपथ लेने के बाद एक तरह से ये साल मोदी जी के नाम ही रहा, ये मोदी का ही जादू था की कांग्रेस के गढ़ कहे जाने वाले राज्य हरियाणा के विधान सभा चुनाव में भी भाजपा की विजय हो गयी, इसी साल।मोदी जी ने विश्व भृमण की तर्ज पर मुख्यतः सभी देशों की राजनीतिक यात्रा की और वँहा भारतीय मूल के लोगो को सम्भोधित किया,।मीडिया के माध्यम से भारत देश में टीवी।के सामने बैठा एक।आम नागरीक भी मोदी जी के इस जयजय कार को देख रहा था, इसी साल गंगा को साफ़ करने,।बुलेट ट्रेन को चलाना, स्मार्ट।सिटी को बनाना इत्यादि योजनाओं की नींव रखी गयी.

लेकिन साल 2015 में पहले दिल्ली और फिर बिहार के विधान सभा।चुनाव।में भाजपा की करारी हार हुई, अब मीडिया इसी हार से भाजपा और।मोदी।जी पर निशाना साध रहा था, इसी बीच देशप्रेम, राष्ट्रप्रेम जैसे कई शब्द मीडिया के कुछ चैनलो में गुजनै लगे, इसी साल 2015 में दादरी में एक अल्पसंख्यक के परिवार पर भीड़ ने हमला कर दिया और परिवार के मुखिया की जान लै ली गयी, इल्जाम लगा की यँहा गऊ हत्या की गयी थी, इसी  साल पंजाब में सिख धर्म के पावन गुरु ग्रंथ साहिब के पेज को गलियों में बिखेरा गया, जंहा पूरा पंजाब इस घटना के खिलाफ  खड़ा हो गया वही बाकी देश में भी अल्पसंख्यक और दलित समुदाय पर भीड़ द्वारा किये जा रहे हमलों की संख्या बढ़ रही थी, मीडिया का एक तबक्का इन खबरों को पूरी ईमान दारी से बता रहा था वही दूसरा तबक्का देश प्रेम की नयी भाषा की रचना कर रहा था, मीडिया पर प्राइम टाइम की बहस एक अखाडे में तब्दील हो रही थी, पहले सोशल मीडिया पर मैन स्ट्रीम मीडिया।की खबर प्रकाशित होती थी अब सोशल।मीडिया के जरिये मैन स्ट्रीम में खबरे बन रही थी और इसका सबसे बड़ा हथियार था सोशल।मीडिया पर किया जा रहा ट्रोल जँहा कोई भी व्यक्ति एक फेक आईडी बनाकर भद्दी शब्दावली में किसी को भी गाली देना अपना हक और।समान समझ रहा था. ये वक़्त था जब सरकार ताकतवर थी विपक्ष कमजोर था और मीडिया ने सरकार की बजाय मीडिया को जनता के कटघरे में खड़ा कर दिया था, ये दौर था जब धड़ले से फेक न्यूज़ का व्यपार बढ़ रहा था और व्हात्सप्प सोशल मीडिया के जरिये बिना रोक टोक इसको प्रसार भी किया जा रहा था.

इसी बीच साल 2016 की शुरुआत में ही एक न्यूज़ चैनल नै जेएनयू में देश विरोधी नारों का हवाला देकर देश की धरोहर विद्यार्थियों पर ही देश द्रोह का इल्जाम लगा दिया, यँहा किसी नै जरूरी नही समझा की क्या सच में ऐसा हुआ था और अगर हुआ था तो क्यों हुआ था, मीडिया अपनी परिभाषित देश प्रेम और देश द्रोह की नयी परिभाषा से खुद ही अदालत बन गया था और खुद ही सजा का ऐलान कर रहा था, ये पहला मौका था जब देश का आम नागरिक और विद्यार्थी जेएनयू के विद्यार्थियों के साथ खड़ा हुआ और यही एक मोड़ था जब एक आम नागरिक मीडिया की विश्वनीयता पर सवालिया चिन्ह लगा रहा था. 

लेकिन साल 2016 के अंत तक, नोटबंदी, पकिस्तान के खिलाफ की गयी सर्जिकल स्ट्राइक, के साथ मोदी सरकार अपनी खोयी हुई विश्वनीयता को पाने की एक बार फिर कोशिश कर रही थी यँहा भी मीडिया दो तबक्को में बटा हुआ दिखाई दिया एक जो नये नोट में चिप के लगे होने की पुष्टि कर रहा था वही दूसरा तबक्का इस से होने वाले आर्थिक नुकसान का मातम मना रहा था, लेकिन एक आम नागरिक के रूप में मोदी जी एक बार फिर शिखर पर थे और इसी के कारण साल 2017 की शुरुआत में हुये पांच राज्य चुनावो में उत्तरप्रदेश, गोवा, उत्तराखण्ड, आसाम में भाजपा विजयी रही वही कांग्रेस सिर्फ।पंजाब तक ही सीमित रह गयी. इसी के बाद अल्पसंख्यक समुदाय पर अचानक से भीड़ द्वारा किये जा रहे हमलों में बहुत तेजी आ गयी, बुजर्ग पहलू खान से लेकर नाबालिक जुनेद की हत्या कर दी गयी, इसी के पश्च्यात नॉट इन माय नेम के तहत मुहीम का आगाज हुआ जँहा सारा देश भीड़ द्वारा किये जा रहे अलपसंख्यक समुदाय पर किये जा रहे हमले के विरोध।में एक जुट होकर खड़ा हो गया और नागरिक के सुरक्षा के प्रति मोदी सरकार सवालो के घेरे।में थी. यँहा मीडिया का एक बड़ा हिस्सा मोदी सरकार को जनता की आवाज और गुस्सा दिखा रहा था. ये मीडिया मैन स्ट्रीम मीडिया से हटकर अब स्वतंत्र वेब साइट और फेस बुक लाइव के जरिये दिखा रहा था.

अगर पिछले कुछ समय में नजर करे तो गोरखपुर के अस्पताल में ऑक्सीजन की कमी से बच्चो की हत्या, बाबा राम रहीम के संदर्भ में भड़की पंचकूला की हिंसा जँहा हाई कोर्ट ने राज्य और केंद्र सरकार को खरी खरी सुनाई, सुरक्षा चरमरा गयी, एक आम नागरीक किसी भी तरह की सरकारी व्यवस्था की उपस्थति नही देख पा रहा, वही ताजा तरीन आरबीआई द्वारा नोटबंदी के फलस्वरूप बैंक में वापस आये पुराने 500 और 1000 के नोटों का आंकड़ा जारी कर दिया जिससे नोटबंदी के समय किये गये वादे कही भी खरे उतरते नही दिखाई दे रहे, लेकिन नोटबंदी और जीएसटी के लागू होने से देश की जीडीपी चरमरा गयी है, रोजगार कम हो रहे है, गंगा को साफ़ करना, स्मार्ट सिटी का निर्माण कही भी कार्यरत होता नही दिख रहा. वही अल्पसंख्यक और।दलित समुदाय अपनी सुरक्षा के प्रति चिंता में है.

इस निराशा के समय जब 2019।के लोकसभा चुनाव में कुछ 20।महीनों का समय।रह गया है ऐसे।में मीडिया।द्वारा मोदी।सरकार।पर किया जा रहा हमला खासकर वह मीडिया जो मनमोहन सरकार के खिलाफ खड़ा हुआ था और UPA की हार की वजह बना था ऐसे में मीडिया का ये कड़ा रुख।मोदी सरकार को 2019।में परेशान कर सकता है, लेकिन मीडिया इन्ही दिनों मिडिया पर हो रहे हमले, खासकर जान लेवा हमले भी कई सवाल पैदा कर रहे है, ये तो तफ्तीश से पता चलेगा की इन हमलों।के पीछे कौन से कारण जिमेदार है लेकिन मीडिया को डराने की और कमजोर करने की साजिश।जरूर की जा रही है और ये साजिश सफल भी हो रही है, इसकी कई वजह हो सकती है लेकिन सबसे गंभीर वजह मीडिया का बटा होना है जँहा आज मीडिया, मीडिया पर ही सवाल उठा रहा है, इस तरह का गैरजिमेदारं मीडिया का व्यवहार।मीडिया की साख को तो खतरे में डाल ही रहा है वही।लोकतंत्र की जड़ को भी कमजोर।कर रहा है, अगर हम वास्तव में एक अमीर समाज चाहते है तो उसके लिये निष्पक्ष और निडर मीडिया का समाज में होना जरूरी है.

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