आरक्षण की आग में जल रहा पूरा देश

Posted by Vikas Kumar Giri
September 3, 2017

NOTE: This post has been self-published by the author. Anyone can write on Youth Ki Awaaz.

 

आजादी के 70 साल बाद भारत के लोगो में बहुत बदलाब आया है, हर चीज़ में खाने पीने से लेकर, रहन सहन और

लाइफ स्टाइल तक अब पूरा देश चाह रहा कि आरक्षण हमारे देश से खत्म हो, सरकार को वक्त की मांग के हिसाब से चलना चाहिए, बदलते देश में जो पुराने घिसे-पिटे कानून है वो बदल देनी चाहिए हमारे देश में कई ऐसे कानून है जो 1858-1860  में अंग्रेजो ने अपने फायदे के लिए बनाए थे, इनमे से कुछ कानूनों के बारे में आपको बताने जा रहा हूँ 1857 की जब क्रांति हुई थी तब अंग्रेज़ो को समझ में नहीं आ रहा था की क्या करे

तो उसने इंडियन पुलिस एक्ट जैसे कानून बना दिया,उसमे ये था की जहाँ कही भी 4 लोग इकट्ठे दिखाई दिए तो पुलिस को अधिकार दे दिया गया भले वो निहथे हो या शान्ति पूर्ण से अपनी बात रख रहा हो, उनपे लाठियां बरसा दिया जाय कोई उनसे नहीं पूछेगा और आज भी वो लागु है, हमारे देश के स्कूल में डंडे का प्रयोग करने पर पाबन्दी लगा दिया गया और न जाने कितने ऐसे कानून है उनमें से एक आरक्षण भी है, उदाहरण के लिए मैं अपने क्लास की आप बीती बताने जरा हूँ, “मेरा किसी को ठेस पहुंचाने का इरादा नहीं है” जब मैं पढ़ता था तो मेरे क्लास में एक सहपाठी था, जो छोटे जाती से थे, उनके पिताजी एजुकेशन मिनिस्टर के ऑफिस में सरकारी नौकरी के पद पर काम करते थे, और उनके बच्चे  को कोई स्कूल और परीक्षा फीस नहीं लगती थी और वो घर से भी इसके पैसे लेकर फालतू में उडाता था, और मेरे क्लास में एक और मेरे ही सहपाठी थे, जिनके पिताजी नहीं थे और उसकी माँ बड़ी मुश्किल से अपने बेटे का फीस दे पाती थी, ऐसे आरक्षण का क्या फायदा जो गरीब और आर्थिक रूप से कमजोर और पिछड़े वर्गो के लोगो को कोई फायदा न हो|

मै और मेरे जैसे बहुत लोग चाहते कि आरक्षण आर्थिक सिथिति के हिसाब लागू कर देनी चाहिए, जिससे सभी वर्गों के गरीब और आर्थिक रूप से कमजोर लोगो को फायदा पहुंचे|

सरकार को इस विषय को गंभीरता से लेना चाहिए और इसको खत्म कर या संशोधन कर आर्थिक स्थित के हिसाब से लोगो के हित में नया कानून लागू कर देनी चाहिए|

~विकास कुमार गिरि

Youth Ki Awaaz is an open platform where anybody can publish. This post does not necessarily represent the platform's views and opinions.