पहलू जैसे लोग मारे नहीं जाते वो तो बस मर जाते हैं

Posted by Prashant Pratyush in Hindi, Society
September 18, 2017

फिल्म ‘मेरा साया’ का गाना ‘आपके पहलू में आकर रो दिए’ पहलू खान के इंसाफ नहीं मिल पाने पर फिट बैठता है ‘कानून के पहलू में आकर रो दिए।’

पहलू खान के मामले में सभी आरोपियों के बरी होने जाने से सारा देश बहुत अंचभित और हैरान नहीं है। यह उम्मीद कमोबेश सभी को थी कि इस मामले में इसी तरह से पर्दा गिरेगा। लेकिन हकीकत यह भी है कि इस मामले में उन घिनौनी चीज़ों से भी पर्दा उठा दिया, जिन्हें बड़े जतन से छुपा दिया जाता है। किसी भी मामले में गवाहों को कमज़ोर बनाकर आरोपियों को रिहा कराने की कीमत उन्मादी लोगों का दबाव भी हो सकता है, ये मौजूदा मामले की नई नज़ीर है।

भारतीय आवाम की याददाश्त काफी कमज़ोर है, इसलिए याद दिलाने के लिए बताना ज़रूरी है कि अलवर (राजस्थान) से गाड़ियों में गाय लेकर हरियाणा आ रहे पहलू खान और उसके साथियों के साथ कथित गौ रक्षकों ने एक अप्रैल को बहरोड़ में मारपीट की थी। इसमें गंभीर रूप से घायल हुए पहलू खान ने तीन अप्रैल को दम तोड़ दिया था। इस मामले में रोचक पहलू यह सामने आया कि राजस्थान पुलिस ने पहलू खान की हत्या के मामले में उन छह आरोपियों को क्लीन चिट दे दी है, जिनका नाम उन्होंने मौत से पहले पुलिस को बताया था।

पहलू खान ने अपने बयान में हमला करने वालों में हुकुम चंद, नवीन शर्मा, जगमात यादव, ओम प्रकाश, सुधीर और राहुल सैनी का नाम लिया था। पुलिस ने इन सभी को अपनी जांच में निर्दोष पाया है और छह आरोपियों पर घोषित 5 हज़ार रूपये का ईनाम वापस ले लिया है। पुलिस ने जांच में आरोपियों के मोबाइल लोकेशन को आधार बनाया है कि घटना के समय सभी घटना स्थल से चार किलोमीटर दूर थे। हरियाणा के नूह के रहने वाले पहलू खान डेयरी का काम करते थे और अप्रैल में जयपुर से गाय लेकर अपने गांव जा रहे थे। पहलू खान के हत्या के बाद गौरक्षकों की हिंसा की बहसों और चौतरफा राजनीतिक दबाव के बाद जांच शुरू की गई और अब पुलिस ने आरोपियों को क्लीन चिट भी दे दी है।

खुले आसमान के नीचे भीड़ भरे सड़क में कोई हत्या ‘मर्डर मिस्ट्री’ कैसे बनाई जाती है, पहलू खान का मामला इसका ताज़ा उदहारण है। हालांकि यह अपने आप में कोई पहला मामला नहीं है। जैसे कभी जेसिका लाल के लिए कहा गया था, वैसे ही पहलू खान को भी किसी ने नहीं मारा। अब इस तरह के कई मामलों में भी ऐसी ही रिपोर्ट आनी बाकी है।

मौजूदा मामले में अब सारी बातें ऊल-जलूल-फिज़ूल हैं। खुले आसमान में कई लोगों के सामने पहलू खान को पीटा गया। अगर डर या किसी दबाव के आगे चश्मदीद गवाह सामने आने को तैयार नहीं है, तो परिस्थिति के हिसाब से साक्ष्यों का उपयोग क्यों नहीं किया गया? यह कहना भी समझ में नहीं आता है कि हत्या के गवाह पेश ना होने से आरोप सिद्ध करना असंभव है। इस आधार पर तो हर हत्यारा निर्दोष बना रह सकता है। ऐसे तो चश्मदीद गवाही के अभाव या साक्ष्य नहीं जुटा पाने के स्थिति में सभी आरोपी मुक्त होते रहेंगे।

जब तक नाकारा और भष्ट तफतीश के लिए ज़िम्मेदार पुलिस दंडित नहीं होती और न्याय व्यवस्था इस मामले की संगीन तबीयत पर ध्यान नहीं देगी, पहलू खान जैसे सभी मामलों में कातिल तो रहेंगे ही पर सवाल का जवाब वही होगा… कानून के पहलू में आकर रो दिए।

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