कविता : उजाले वाले दिन का सच

Posted by सूरज सिंह बाघेल
September 28, 2017

Self-Published

इस कविता की कोई भूमिका नहीं है क्यूँकि भूमिका आपको स्वयं रचनी है कि इस कविता के माध्यम से आप अपना और इस मानव जाति, दुनिया का भविष्य कहाँ देखते हैं-

हम सब अंधेरे की ओर बढ़ रहे हैं,
धीरे-धीरे, बोलते हुए, आपस में बतियाते हुए, 
लोगों को गले लगाते हुए,
चीख़ते और चिल्लाते हुए,
सीगटों की तरह हूँआ-हूँआ करते हुए
उजली धूप ज़िंदाबाद के नारे लगाते हुए
बुला रहें हैं अँधेरों को
आओ, छा जाओ, तुम्हीं से सुबह है हमारी
क्यूँकि तुम ही हमारी उजली धूप हो
जिसमें हम सिर्फ़ ख़ुद को
सिर्फ़ ख़ुद को ही देख पाते है,
अच्छा-बुरा सब गौण हो जाते हैं इस धूप में
कल सुना था मैंने दोपहर में
एक आदमी को कहते हुए
उजाले भरे दिन आ रहें है,
क्यूँकि हमने अंधकार को पीछे धकेलना शुरू कर दिया है,
एक तरफ़ा हाँ कहना सीख लिया है,
हमने एक रंग की चादरें ओढ़ ली हैं
अब हम एक हैं, एक से सारे कौवे हैं,
इसलिए आने वाले हैं उजालों के दिन
ऐसे उजालों भरे दिन आने पर मैं मारा जाऊँगा
क्यूँकि उस उजाले भरे दिन की कीमत
मैं रोज़ चुकाने को मजबूर हूँ
क्यूँकि रंग-बिरंगी दुनिया का आशिक़ मैं
उस एकरंगी दुनिया में दम तोड़ तोड़ दूँगा
मैं मरूँगा, मेरी जैसी तमाम नस्लें मर जाएँगी
इसलिए उस क्षणिक उजाले दिन के पीछे वाले
अँधियारे से
बचने को नहीं कहूँगा,
मैं कहूँगा कि उठो, और चलो
आकाश के उस सूरज का
अपहरण कर लो
बाँध लो उसे
पटक दो धरती पर
नहीं तो आने वाली नस्लें
अंधकार में हीं दम तोड़ देंगी
और नहीं देख सकेंगी
यह खूबसूरत दुनिया।

तस्वीर- इंटरनेट

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